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  • कहीं आप भी तो नहीं: पी रहे मिलावटी दूध? घर पर बस 10 सेकंड में ऐसे करें मिलावट का पता

    कहीं आप भी तो नहीं: पी रहे मिलावटी दूध? घर पर बस 10 सेकंड में ऐसे करें मिलावट का पता

    कहीं आप भी तो नहीं: पी रहे मिलावटी दूध? घर पर बस 10 सेकंड में ऐसे करें मिलावट का पता

    दूध में डिटर्जेंट की मिलावट है या नहीं, इसका पता घर पर आसान टेस्ट से लगाया जा सकता है. जानिए दूध चेक करने का आसान तरीका और खरीदते समय किन बातों का ध्यान रखें.

    दूध हमारी रोजमर्रा की डाइट का अहम हिस्सा है. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर उम्र के लोगों को दूध पीने की सलाह दी जाती है. इसे पोषक तत्वों से भरपूर और संपूर्ण आहार का हिस्सा माना जाता है. ऐसे में अगर दूध में किसी तरह की मिलावट हो तो यह सेहत के लिए चिंता की बात हो सकती है. खासकर दूध में डिटर्जेंट, स्टार्च और दूसरे केमिकल की मिलावट की खबरें समय-समय पर सामने आती रहती हैं.

    मुनाफे के लिए की जाने वाली ऐसी मिलावट से बचने के लिए दूध खरीदते समय सावधानी बरतना जरूरी है. अच्छी बात यह है कि कुछ आसान तरीकों से घर पर भी दूध की जांच की जा सकती है.शेक करके पता करें दूध में डिटर्जेंट है या नहीं FSSAI के अनुसार दूध में डिटर्जेंट की मिलावट जांचने के लिए एक गिलास में करीब 5 से 10ml दूध लें. अब इसे चम्मच की मदद से तेजी से हिलाएं या शेक करें. अगर दूध में बहुत ज्यादा झाग बनते हैं और बुलबुले काफी देर तक बने रहते हैं तो इसमें डिटर्जेंट की मिलावट होने की आशंका हो सकती है. वहीं, सामान्य दूध को हिलाने पर बनने वाले हल्के बुलबुले जल्दी खत्म हो जाते हैं.आयोडीन से भी कर सकते हैं जांच दूध में मिलावट की जांच के लिए आयोडीन टिंचर का इस्तेमाल भी किया जाता है.

    इसके लिए पहले दूध को उबाल लें और फिर उसे पूरी तरह ठंडा होने दें. इसके बाद दूध में आयोडीन टिंचर की कुछ बूंदें डालें. अगर दूध का रंग गहरा नीला होने लगे तो यह स्टार्च जैसी मिलावट का संकेत हो सकता है. हालांकि, किसी एक घरेलू टेस्ट से मिलावट की अंतिम पुष्टि नहीं की जा सकती.दूध खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान पैकेट वाला दूध खरीदते समय पैकेट की स्पेलिंग, ब्रांड नाम और लोगो को ध्यान से देखें. नकली पैकेट कई बार असली ब्रांड से मिलते-जुलते बनाए जा सकते हैं.

    पैकेट पर FSSAI का लोगो और वैध लाइसेंस नंबर भी जरूर चेक करें. साथ ही पैकेट की सील, मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट देखें. लोकल या अनजान ब्रांड का दूध खरीदने से पहले उसकी विश्वसनीयता जरूर जांचें. अगर दूध की गुणवत्ता, गंध, रंग या स्वाद सामान्य से अलग लगे तो उसे इस्तेमाल करने से बचें और जरूरत पड़ने पर संबंधित खाद्य सुरक्षा विभाग को इसकी जानकारी दें.

  • कब्ज से हैं परेशान: गैस्ट्रोलॉजिस्ट से जानिए 4 नेचुरल ड्रिंक और खास तरीके जो पेट पर करेंगे नेचुरल लैक्जेटिव का काम.

    कब्ज से हैं परेशान: गैस्ट्रोलॉजिस्ट से जानिए 4 नेचुरल ड्रिंक और खास तरीके जो पेट पर करेंगे नेचुरल लैक्जेटिव का काम.

    कब्ज से हैं परेशान: गैस्ट्रोलॉजिस्ट से जानिए 4 नेचुरल ड्रिंक और खास तरीके जो पेट पर करेंगे नेचुरल लैक्जेटिव का काम.

    असंतुलित खान-पान, पानी की कमी और सुस्त जीवनशैली के कारण आज कब्ज (Constipation) एक बेहद आम लेकिन परेशान करने वाली समस्या बन चुकी है। पेट साफ न होने पर दिनभर भारीपन, आलस और चिड़चिड़ापन बना रहता है। लोग अक्सर इससे राहत पाने के लिए तुरंत दवाइयों या चूर्ण का सहारा लेते हैं, लेकिन लंबे समय तक इसका सेवन आंतों को नुकसान पहुंचा सकता है। कब्ज एक आम समस्या है, जो किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है। आमतौर पर जब मल त्याग सामान्य से कम हो जाए, मल बहुत सख्त हो या मल त्याग करते समय दर्द और ज्यादा जोर लगाना पड़े, तो इसे कब्ज माना जाता है। हर व्यक्ति की टॉयलेट की आदत अलग होती है, लेकिन सामान्य रूप से दिन में तीन बार से लेकर हफ्ते में तीन बार तक मल त्याग होने को नॉर्मल माना जाता है।

    हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड और एम्स से प्रशिक्षित गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, डॉ. सौरव सेठी ने बताया प्रकृति में कई ऐसे खाद्य पदार्थ मौजूद हैं जो दवाइयों के बजाय एकदम सुरक्षित और प्राकृतिक लैग्जेटिव की तरह काम करते हैं। आपकी रोजमर्रा की कुछ आदते आपके कब्ज का कारण बन सकती हैं इनमें सुधार करना जरूरी है। रोजाना डाइट में कम फाइबर का सेवन करना, पर्याप्त फल-सब्जियां नहीं खाना, शरीर में पानी की कमी और टॉयलेट जाने की इच्छा को बार-बार रोकना कब्ज के आम कारणों में शामिल हैं। हालांकि कई बार कब्ज का कोई स्पष्ट कारण नहीं पता चलता। डॉक्टर सौरव सेठी ने बताया अगर आप लाइफस्टाइल में बदलाव करें, कुछ नेचुरल चीजों का सेवन करें तो आसानी से कब्ज का इलाज कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि कब्ज का नेचुरल इलाज क्या है।

    प्रून जूस का करें सेवन

    द अमेरिकी जर्नल ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और PubMed Central में प्रकाशित क्लिनिकल ट्रायल्स के अनुसार, प्रून जूस क्रोनिक कब्ज के इलाज में काफी प्रभावी है। प्रून यानी सूखे बेर से बने प्रून जूस से है जिसमें सॉर्बिटोल नाम का नेचुरल शुगर अल्कोहल पाया जाता है। यह हल्के लैक्सेटिव की तरह काम कर सकता है और मल त्याग में मदद कर सकता है। हालांकि, ज्यादा मात्रा में लेने पर कुछ लोगों को गैस और पेट फूलने की समस्या हो सकती है। एक्सपर्ट ने बताया प्रून जूस आंतों में पानी बनाए रखने में मदद कर सकता है और मल को नरम करने में मददगार हो सकता है। इसलिए प्रून जूस का इस्तेमाल कब्ज में राहत के लिए किया जाता है।

    नींबू पानी पिएं

    गुनगुने पानी में ताजा नींबू का रस मिलाकर पीना पाचन को बढ़ावा देने और कब्ज में राहत देने में बेहद असरदार साबित होता है। ये घरेलू उपाय सुबह के समय बेहद असरदार साबित होता है। खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू का सेवन बॉडी को हाइड्रेट करता है और बॉडी को हेल्दी रखता है। मेडिकल स्टडीज और फिजियोलॉजी के अनुसार, नींबू पानी का असर मुख्य रूप से गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स और हाइड्रेशन पर आधारित है। सुबह खाली पेट गुनगुना पानी पीने से पेट और आंतों की मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं और कब्ज से राहत मिलती है।

    अदरक की चाय पिएं

    गैस्ट्रोएंटरोलॉजी रिसर्च और PubMed में दर्ज अध्ययनों के अनुसार, अदरक में प्रोकिनेटिक (Prokinetic) गुण होते हैं जो गैस्ट्रिक खाली होने की प्रक्रिया को तेज करते हैं। अदरक में पाए जाने वाले सक्रिय बायोएक्टिव यौगिक जिंजरोल और शोगाओल (Gingerol & Shogaol) आंतों की चिकनी मांसपेशियों के संकुचन को बढ़ाते हैं। अदरक की चाय कब्ज में मददगार साबित होती है। अदरक पाचन तंत्र को सक्रिय करने और मल त्याग को बढ़ावा देने में मददगार साबित होती है।

    एलोवेरा जूस पिएं

    एलोवेरा के लैक्सेटिव गुणों पर कई क्लिनिकल स्टडीज मौजूद हैं। यूएस एफडीए (FDA) ने भी इसको नेचुरल लैक्सेटिव बताया है। एलोवेरा में कुछ ऐसे यौगिक पाए जाते हैं जो पाचन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। थोड़ी मात्रा में एलोवेरा जूस का सेवन पानी के साथ करने से फायदा होता है। हालांकि, एलोवेरा जूस हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होता, इसलिए इसका नियमित या अधिक मात्रा में सेवन करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है।

    इन तरीकों से करें कब्ज को दूर

    टॉयलेट सीट पर पैर ऊंचे रखें

    कब्ज में मल त्याग के दौरान ज्यादा जोर लगाने से बचने के लिए टॉयलेट पर बैठते समय पैरों के नीचे छोटा स्टूल रख लें। इससे घुटने कूल्हों से थोड़ा ऊपर आ जाते हैं और मलाशय का कोण सीधा होने में मदद मिल सकती है। इससे मल को डिस्चार्ज करने में मदद मिलती है।

    पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं

    मल को सॉफ्ट रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लेना जरूरी है। रोजाना करीब आठ गिलास पानी पीना आपके पाचन के दुरुस्त रखने के लिए जरूरी है। हालांकि, पानी की जरूरत हर व्यक्ति में अलग हो सकती है। इसके साथ ही डाइट में फाइबर की मात्रा बढ़ाना भी मददगार हो सकता है।

    डाइट में फाइबर बढ़ाएं

    फाइबर मल में पानी बनाए रखने में मदद करता है, जिससे मल सॉफ्ट हो सकता है और उसे बाहर निकालना आसान हो सकता है। इसके लिए डाइट में फल, सब्जियां और ओट्स जैसे फाइबर वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करें।

    रोजाना शारीरिक गतिविधि करें

    नियमित रूप से पैदल चलना और एक्सरसाइज करना भी कब्ज से राहत पाने में मदद कर सकता है। शारीरिक गतिविधि आंतों की गति को बढ़ाने में मदद करती है। जब मल बड़ी आंत में ज्यादा समय तक रुका रहता है, तो उसमें से पानी अधिक अवशोषित हो सकता है और मल सूखकर सख्त हो सकता है।

    जरूरत पड़ने पर लैक्सेटिव का करें इस्तेमाल

    अगर खानपान और लाइफस्टाइल में बदलाव से कब्ज में पर्याप्त राहत नहीं मिलती, तो डॉक्टर की सलाह से लैक्सेटिव का इस्तेमाल किया जा सकता है। बाजार में अलग-अलग तरह के लैक्सेटिव उपलब्ध हैं, इसलिए इन्हें अपनी मर्जी से लेने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। कुछ लैक्सेटिव केवल थोड़े समय के लिए इस्तेमाल किए जाने चाहिए।

    बल्क-फॉर्मिंग लैक्सेटिव

    बल्क-फॉर्मिंग लैक्सेटिव डाइट में फाइबर बढ़ाने की तरह काम करते हैं। ये मल में पानी बनाए रखने में मदद करते हैं, जिससे मल को बाहर निकालना आसान हो सकता है। इन्हें असर करने में आमतौर पर 2 से 3 दिन लग सकते हैं। शुरुआत में इससे गैस और पेट फूलने की समस्या हो सकती है, जो समय के साथ कम हो सकती है।

    ऑस्मोटिक लैक्सेटिव

    ऑस्मोटिक लैक्सेटिव आंतों में पानी बनाए रखने में मदद करते हैं, जिससे मल नरम हो जाता है और उसे बाहर निकालना आसान होता है। इन्हें भी असर करने में कुछ दिन लग सकते हैं। इनका इस्तेमाल करते समय पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लेना जरूरी होता है।

    स्टीमुलेंट लैक्सेटिव

    सेन्ना जैसे स्टीमुलेंट लैक्सेटिव आंतों की गतिविधि को बढ़ाकर मल त्याग में मदद करते हैं। इनके कारण आंतों में संकुचन बढ़ता है, जिससे कुछ लोगों को पेट में ऐंठन या क्रैंप हो सकते हैं। इनका असर कुछ घंटों में हो सकता है।

    स्टूल सॉफ्टनर

    डॉक्यूसेट सोडियम जैसे स्टूल सॉफ्टनर मल में पानी की मात्रा बढ़ाने में मदद करते हैं। इससे सख्त और सूखे मल को नरम करके बाहर निकालना आसान हो सकता है।

    डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। कब्ज के घरेलू उपाय या लैक्सेटिव हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते। लगातार या बार-बार कब्ज, तेज पेट दर्द, उल्टी, मल में खून या अचानक वजन कम होने जैसे लक्षण हों तो डॉक्टर से सलाह लें। किसी भी लैक्सेटिव या एलोवेरा जूस का सेवन डॉक्टर की सलाह के बिना न करें।

  • पितृपक्ष से पहले घर: से निकाल दें ये 5 चीजें, वरना तरक्की में आती है रुकावट!

    पितृपक्ष से पहले घर: से निकाल दें ये 5 चीजें, वरना तरक्की में आती है रुकावट!

    पितृपक्ष से पहले घर: से निकाल दें ये 5 चीजें, वरना तरक्की में आती है रुकावट!

    पितरों के आगमन से पहले घर की ऊर्जा को शुद्ध और संतुलित करना जरूरी है. घर में बेकार सामान और नकारात्मकता से जुड़ी चीजें रखने से तरक्की में रुकावट आ सकती है. आइए जानते हैं पितृपक्ष से पहले किन चीजों को घर से हटा देना चाहिए.

    पितृपक्ष को पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने का खास समय माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान पितर अपने परिजनों को आशीर्वाद देने के लिए धरती पर आते हैं. इस साल पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से हो रही है. ऐसे में घर की साफ-सफाई और सकारात्मक माहौल का विशेष ध्यान रखना चाहिए. वास्तु गुरु मान्यता के अनुसार, पितरों के आगमन से पहले घर की ऊर्जा को शुद्ध और संतुलित करना जरूरी है.

    घर में बेकार सामान और नकारात्मकता से जुड़ी चीजें रखने से तरक्की में रुकावट आ सकती है. आइए जानते हैं पितृपक्ष से पहले किन चीजों को घर से हटा देना चाहिए.खंडित मूर्तियां और फटी धार्मिक तस्वीरें वास्तु गुरु मान्या के अनुसार, घर के मंदिर या किसी कोने में टूटी हुई मूर्तियां नहीं रखनी चाहिए. इसी तरह फटी या खराब हो चुकी धार्मिक तस्वीरों को भी घर में नहीं रखना चाहिए. वास्तु मान्यता के अनुसार, इससे नकारात्मक ऊर्जा बढ़ सकती है और पूजा-पाठ के दौरान सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित हो सकती है.बंद पड़ी घड़ी अगर घर में कोई घड़ी लंबे समय से बंद पड़ी है तो उसे ठीक करवा लें या हटा दें.

    वास्तु के अनुसार, बंद घड़ी को घर में रखना शुभ नहीं माना जाता. मान्यता है कि इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित हो सकती है और कामों में रुकावट आ सकती है.टूटे-चटके बर्तन न रखें श्राद्ध और तर्पण के दौरान पितरों के लिए भोग तैयार किया जाता है. ऐसे में घर में साफ-सफाई का खास ध्यान रखना चाहिए. वास्तु के अनुसार, टूटे या चटके हुए बर्तनों को घर में रखना अशुभ माना जाता है. इन्हें इस्तेमाल से पहले ही हटा देना बेहतर है.जंग लगी धातु और सूखे पौधे वास्तु गुरु के अनुसार, लोहे या किसी अन्य धातु पर लगी जंग घर की ऊर्जा को प्रभावित कर सकती है. वहीं सूखे और मुरझाए हुए फूल-पौधे भी घर में नहीं रखने चाहिए. पितृपक्ष से पहले इन्हें हटाकर घर में हरे-भरे पौधे लगाने की सलाह दी जाती है.

  • वेट लॉस से लेकर: मजबूत मसल्स तक, सुबह भीगे काले चने खाने से शरीर को मिल सकते हैं ये जबरदस्त फायदे..

    वेट लॉस से लेकर: मजबूत मसल्स तक, सुबह भीगे काले चने खाने से शरीर को मिल सकते हैं ये जबरदस्त फायदे..

    वेट लॉस से लेकर: मजबूत मसल्स तक, सुबह भीगे काले चने खाने से शरीर को मिल सकते हैं ये जबरदस्त फायदे..

    काले चने में प्रोटीन, फाइबर, आयरन, फोलेट और मैग्नीशियम जैसे कई पोषक तत्व पाए जाते हैं. यही वजह है कि इन्हें वेट लॉस से लेकर पाचन और मसल्स की सेहत के लिए अच्छा माना जाता है. तो चलिए आपको बताते हैं काले चने खाने के फायदे के बारे में.

    सुबह का नाश्ता दिन की शुरुआत के लिए बेहद जरूरी माना जाता है. अगर नाश्ते में कुछ ऐसा शामिल किया जाए जो पेट को लंबे समय तक भरा रखे और शरीर को जरूरी पोषक तत्व भी दे, तो यह सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है. रातभर पानी में भिगोकर रखे गए काले चने भी ऐसा ही एक विकल्प हैं. काले चने में प्रोटीन, फाइबर, आयरन, फोलेट और मैग्नीशियम जैसे कई पोषक तत्व पाए जाते हैं. यही वजह है कि इन्हें वेट लॉस से लेकर पाचन और मसल्स की सेहत के लिए अच्छा माना जाता है. हालांकि, हर व्यक्ति के लिए इनका सेवन एक जैसा फायदेमंद हो, यह जरूरी नहीं है. तो चलिए आपको बताते हैं काले चने खाने के फायदे के बारे में.

    वेट लॉस मददगार काले चने प्रोटीन और फाइबर के साथ आयरन, फोलेट, मैग्नीशियम समेत कई जरूरी पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत होते हैं. रातभर भिगोए हुए चने सुबह खाने से लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस हो सकता है. इससे बार-बार कुछ खाने की इच्छा कम करने में मदद मिल सकती है. इसी वजह से वेट लॉस जर्नी में भी लोग इन्हें अपनी डाइट का हिस्सा बनाते हैं.

    पाचन के लिए हो सकते हैं फायदेमंद काले चनों में मौजूद फाइबर पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद होता है. यह कब्ज की समस्या को कम करने में मदद कर सकता है. हालांकि, कुछ लोगों को चने खाने के बाद गैस, पेट फूलने या अपच की समस्या हो सकती है. ऐसे लोगों को शुरुआत में कम मात्रा में चने खाने चाहिए और शरीर की प्रतिक्रिया पर ध्यान देना चाहिए.

    मसल्स की सेहत के लिए मददगार काले चनों में मौजूद प्रोटीन मांसपेशियों के रखरखाव और शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली के लिए जरूरी होता है. इनमें आयरन भी पाया जाता है, जो शरीर के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्व है. हालांकि, सिर्फ काले चने खाने से शरीर की पूरी आयरन या प्रोटीन जरूरत पूरी नहीं होती. इसलिए इन्हें संतुलित डाइट का हिस्सा बनाना बेहतर है.

    इन बातों का रखें ध्यान काले चनों को खाने से पहले अच्छी तरह धोकर पर्याप्त समय तक पानी में भिगोना चाहिए. अगर चने खाने से लगातार गैस या पाचन संबंधी परेशानी होती है, तो इनकी मात्रा कम करें. किसी बीमारी, पाचन संबंधी समस्या या डॉक्टर की बताई विशेष डाइट का पालन करने वाले लोगों को नियमित रूप से अधिक मात्रा में चने खाने से पहले डॉक्टर या डायटीशियन की सलाह लेनी चाहिए.

  • गुरु दोष से हैं परेशान: पुखराज खरीदने की जरूरत नहीं, गुरुवार को करें ये आसान उपाय, होगी बृहस्पति देव की कृपा

    गुरु दोष से हैं परेशान: पुखराज खरीदने की जरूरत नहीं, गुरुवार को करें ये आसान उपाय, होगी बृहस्पति देव की कृपा

    गुरु दोष से हैं परेशान: पुखराज खरीदने की जरूरत नहीं, गुरुवार को करें ये आसान उपाय, होगी बृहस्पति देव की कृपा

    ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति ग्रह को ज्ञान, शिक्षा, धन, विवाह, संतान और सौभाग्य का कारक माना जाता है. कुंडली में गुरु की स्थिति कमजोर होने पर व्यक्ति को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. खासतौर पर पढ़ाई-लिखाई में बाधा, करियर में रुकावट, आर्थिक परेशानियां और विवाह में देरी जैसी स्थितियों को गुरु की कमजोरी से जोड़कर देखा जाता है. यही वजह है कि गुरु को मजबूत करने के लिए पुखराज धारण करने की सलाह दी जाती है. हालांकि, हर व्यक्ति के लिए महंगा रत्न खरीदना संभव या जरूरी नहीं माना जाता. ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, गुरुवार के दिन कुछ सरल उपाय करके भी बृहस्पति देव की कृपा पाने का प्रयास किया जा सकता है.

    क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है बृहस्पति ग्रह?

    वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को देवगुरु कहा गया है. इसे ज्ञान, विवेक, धर्म, अध्यात्म, शिक्षा, संतान, विवाह और समृद्धि से संबंधित ग्रह माना जाता है. मान्यता है कि कुंडली में गुरु शुभ और मजबूत स्थिति में हो तो व्यक्ति को जीवन में सही मार्गदर्शन, ज्ञान और अवसर प्राप्त होते हैं. वहीं गुरु के कमजोर होने पर निर्णय लेने में कठिनाई, शिक्षा या नौकरी में रुकावट और आर्थिक मामलों में परेशानी जैसी स्थितियां देखने को मिल सकती हैं.

    गुरुवार को करें पीले रंग का उपाय

    बृहस्पति देव को पीला रंग प्रिय माना जाता है. इसलिए गुरुवार के दिन पीले वस्त्र पहनना या पूजा में पीले रंग की वस्तुओं का इस्तेमाल करना शुभ माना जाता है. इस दिन भगवान विष्णु या बृहस्पति देव की पूजा करते समय पीले फूल, पीले फल या पीली मिठाई अर्पित की जा सकती है. मान्यता है कि इससे गुरु ग्रह से जुड़े शुभ प्रभावों को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है.

    केले के पेड़ की पूजा की मान्यता

    गुरुवार के दिन केले के पेड़ की पूजा करने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार केले के पौधे में भगवान विष्णु का वास माना जाता है. गुरुवार की सुबह स्नान के बाद केले के पेड़ की पूजा करें और वहां हल्दी, चने की दाल तथा गुड़ अर्पित करें. इसके बाद श्रद्धापूर्वक दीपक जलाकर भगवान विष्णु का ध्यान किया जा सकता है.

    चने की दाल और गुड़ का करें दान

    गुरु ग्रह को प्रसन्न करने के लिए गुरुवार को जरूरतमंद व्यक्ति को पीली वस्तुओं का दान करना शुभ माना जाता है. इस दिन चने की दाल, गुड़, पीले वस्त्र या हल्दी का दान किया जा सकता है. अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया गया दान धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है. मान्यता है कि इससे गुरु से संबंधित सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने में मदद मिलती है.

    गुरु मंत्र का जाप करें

    गुरुवार के दिन बृहस्पति देव से जुड़े मंत्र का जाप करना भी एक सरल उपाय माना जाता है. पूजा के समय शांत मन से “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” मंत्र का जाप किया जा सकता है. नियमित रूप से मंत्र जाप करने से मन को एकाग्र करने और आध्यात्मिक अनुशासन बनाए रखने में मदद मिल सकती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इससे बृहस्पति देव की कृपा प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है.

    गुरुजनों का सम्मान भी माना जाता है जरूरी

    ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यताओं में गुरु, शिक्षक और बड़े-बुजुर्गों का सम्मान बृहस्पति से जोड़ा जाता है. इसलिए गुरुवार के दिन अपने गुरु, शिक्षक या किसी योग्य बुजुर्ग का आशीर्वाद लेना शुभ माना जाता है. जरूरतमंद विद्यार्थियों की पढ़ाई में सहायता करना या किसी को ज्ञान और शिक्षा से जुड़ी सामग्री देना भी सकारात्मक कार्य माना जाता है.

    पुखराज के बिना भी कर सकते हैं ये उपाय

    पुखराज बृहस्पति का प्रमुख रत्न माना जाता है, लेकिन इसे धारण करने से पहले कुंडली के अनुसार विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित माना जाता है. यदि कोई व्यक्ति पुखराज नहीं पहनना चाहता या खरीदना संभव नहीं है, तो गुरुवार की पूजा, पीली वस्तुओं का दान, गुरुजनों का सम्मान और मंत्र जाप जैसे सरल धार्मिक उपाय किए जा सकते हैं. इन उपायों को आस्था और नियमितता के साथ करना अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है.

  • उम्र के हिसाब से कितनी: देर वॉक करना जरूरी? जानिए WHO की सही गाइडलाइंस.

    उम्र के हिसाब से कितनी: देर वॉक करना जरूरी? जानिए WHO की सही गाइडलाइंस.

    उम्र के हिसाब से कितनी: देर वॉक करना जरूरी? जानिए WHO की सही गाइडलाइंस.

    बॉडी को हेल्दी और एक्टिव रखने के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि जरूरी है। इसके लिए वॉकिंग एक आसान और सुविधाजनक एक्सरसाइज है, जिसे लगभग हर उम्र के लोग अपनी क्षमता के अनुसार कर सकते हैं। काम के दौरान छोटे ब्रेक में या फोन पर बात करते समय भी पैदल चलने को अपनी दिनचर्या में शामिल किया जा सकता है। नियमित शारीरिक गतिविधि वजन को कंट्रोल रखने, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग जैसी कई क्रोनिक बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है।

    हर उम्र के शरीर की क्षमता और शारीरिक जरूरतें अलग होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार 5 साल के बच्चे से लेकर 65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों के लिए वॉक और फिजिकल एक्टिविटी का समय अलग-अलग तय किया गया है। WHO के अनुसार 18 से 64 साल के वयस्कों को हर सप्ताह कम से कम 150 से 300 मिनट की मध्यम-तीव्रता वाली एरोबिक शारीरिक गतिविधि (Brisk Walking) करनी चाहिए।

    The Lancet Public Health Study 2022 के हालिया अध्ययनों के अनुसार 60 वर्ष से कम उम्र के वयस्कों के लिए रोज़ाना 8,000-10,000 कदम और 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए 6,000-8,000 कदम चलना सेहत के लिए सबसे प्रभावी माना गया हैं। Centers for Disease Control and Prevention (CDC) सलाह देता है कि बच्चे और किशोर रोज़ाना कम से कम 60 मिनट तक बॉडी को एक्टिव रखें। अगर आपको कोई पुरानी बीमारी जैसे गंभीर घुटने का दर्द, हृदय रोग या सांस की समस्या है, तो अपने डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही वॉक का समय और गति तय करें। अगर आप भी रोज़ाना वॉक करते हैं, तो WHO की इन गाइडलाइंस के ज़रिए जानिए अपनी उम्र के हिसाब से आपको रोजाना कितनी देर और किस गति से टहलना चाहिए…

    उम्र के अनुसार वॉक का चार्ट

    ब्रिस्क वॉकिंग (Brisk Walking) की पहचान कैसे करें?

    अक्सर लोग साधारण वॉक और ब्रिस्क वॉक के अंतर को नहीं समझते हैं। आप इस अंतर को समझना चाहते हैं तो आप खुद से टेस्ट कर सकते हैं। आप टॉक टेस्ट की मदद से ब्रिस्क वॉक और नॉर्मल वॉक के अंतर को समझ सकते हैं।

    अगर आप चलते-चलते गाना गा पा रहे हैं तो आपकी वॉक की रफ्तार धीमी है।

    अगर आप चलते-चलते आसानी से बात कर पा रहे हैं, लेकिन गाना नहीं गा सकते तो यह परफेक्ट ब्रिस्क वॉक है।

    यदि बात करने में भी सांस फूल रही है तो आपकी वॉक की गति बहुत तेज़ है।

    वॉक करने का सही तरीका और टिप्स

    अगर आप वॉक करना शुरु कर रहे हैं तो आप शुरुआत में 5 मिनट वार्म-अप (धीमी वॉक) से शुरुआत करें और अंत में 5 मिनट कूल-डाउन करें।

    वॉक करते समय सही ग्रिप वाले स्पोर्ट्स शूज़ और आरामदायक सूती कपड़े पहनें।

    वॉक पर जाने से पहले और आने के बाद थोड़ा पानी ज़रूर पीएं।

    दिनभर में कदम बढ़ाने के स्मार्ट हैक्स अपनाएं

    जो लोग एक साथ 45-60 मिनट नहीं निकाल पाते, उनके लिए छोटे-छोटे हैक्स अपनाना बेहद असरदार साबित होगा। आप अपने स्टेप्स को बढ़ाना चाहते हैं तो लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करें।

    फोन पर बात करते समय बैठकर बात करने के बजाय टहलें।

    नजदीकी दुकान या बाजार जाने के लिए स्कूटर और बाइक की जगह पैदल जाएं।

    ऑफिस या घर पर हर 1 घंटे के काम के बाद 5 मिनट का वॉक ब्रेक लें।

    डिस्क्लेमर:जिन्हें आर्थराइटिस (घुटनों का दर्द), सांस की बीमारी (Asthma) या हृदय रोग है, वे डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह से ही अपनी वॉक का समय और स्पीड तय करें।

  • कब से शुरू होंगे: शारदीय नवरात्रि 2026? जानें घटस्थापना, अष्टमी, नवमी से लेकर दशहरा तक की पूरी तारीख और पूजा डिटेल

    कब से शुरू होंगे: शारदीय नवरात्रि 2026? जानें घटस्थापना, अष्टमी, नवमी से लेकर दशहरा तक की पूरी तारीख और पूजा डिटेल

    कब से शुरू होंगे: शारदीय नवरात्रि 2026? जानें घटस्थापना, अष्टमी, नवमी से लेकर दशहरा तक की पूरी तारीख और पूजा डिटेल

    इस साल शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू होकर 19 अक्टूबर तक रहेगी, जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा. तो चलिए आपको बताते हैं शारदीय नवरात्रि की जरूरी डेट कौन-कौन सी है.

    शारदीय नवरात्रि हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है. इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है. भक्त माता रानी की आराधना के साथ व्रत रखते हैं और घरों में कलश स्थापना कर विधि-विधान से पूजा करते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में मां दुर्गा की श्रद्धा से पूजा करने से भक्तों को उनका आशीर्वाद मिलता है और मनोकामनाएं पूरी होने की मान्यता है. साल 2026 में शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू होकर 19 अक्टूबर तक रहेगी, जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा.

    कब होगी घटस्थापना? शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर 2026, रविवार से होगी. इसी दिन घटस्थापना यानी कलश स्थापना की जाएगी और मां शैलपुत्री की पूजा होगी. दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों के पंचांग के अनुसार घटस्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6:19 बजे से 10:12 बजे तक बताया गया है. वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा. शहर के अनुसार मुहूर्त में थोड़ा अंतर हो सकता है.

    नवरात्रि में कब होगी अष्टमी और नवमी? 2026 में नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि का संयोग खास रहेगा. 19 अक्टूबर को दुर्गा अष्टमी और महानवमी के पूजन किए जाएंगे. इस दिन मां महागौरी और मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है. कई घरों में अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन, हवन और विशेष पूजा भी की जाती है.

    कब है दशहरा 2026? नवरात्रि के बाद 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा. इस दिन भगवान राम की रावण पर विजय की याद में रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है. कई जगह रामलीला और धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं.

    नवरात्रि 2026 की पूरी लिस्ट 11 अक्टूबर: घटस्थापना, मां शैलपुत्री पूजा 12 अक्टूबर: मां ब्रह्मचारिणी पूजा 13 अक्टूबर: मां चंद्रघंटा पूजा 14 अक्टूबर: मां कूष्मांडा पूजा 15 अक्टूबर: मां स्कंदमाता पूजा 16 अक्टूबर: मां कात्यायनी पूजा 17 अक्टूबर: मां कालरात्रि पूजा 18 अक्टूबर: मां महागौरी पूजा 19 अक्टूबर: दुर्गा अष्टमी और महानवमी, मां सिद्धिदात्री पूजा 20 अक्टूबर: विजयादशमी यानी दशहरा

  • पैर में बिछिया क्यों :पहनती हैं भारतीय महिलाएं? सुहाग की निशानी के पीछे क्या है मान्यता

    पैर में बिछिया क्यों :पहनती हैं भारतीय महिलाएं? सुहाग की निशानी के पीछे क्या है मान्यता

    पैर में बिछिया क्यों :पहनती हैं भारतीय महिलाएं? सुहाग की निशानी के पीछे क्या है मान्यता

    भारतीय महिलाओं के पारंपरिक श्रृंगार में बिछिया का खास स्थान माना जाता है। शादी के बाद पैरों की उंगलियों में पहनी जाने वाली बिछिया को कई परिवारों में सुहाग और वैवाहिक जीवन की पहचान से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, बिछिया की परंपरा केवल श्रृंगार या वैवाहिक पहचान तक सीमित नहीं मानी जाती, बल्कि इसके पीछे कई धार्मिक और पारंपरिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं।

    पैर की उंगलियों में पहनी जाने वाली इस छोटी सी चांदी की अंगूठी को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर इसे खास तौर पर दूसरी उंगली में ही क्यों पहना जाता है और क्या इसका स्वास्थ्य से भी कोई संबंध है?

    दूसरी उंगली में ही क्यों पहनी जाती है बिछिया?

    परंपरागत रूप से बिछिया पैर की दूसरी उंगली में पहनने का चलन है। भारतीय परंपराओं और कुछ आयुर्वेदिक मान्यताओं में इस उंगली को शरीर के कुछ खास नसों और दबाव बिंदुओं से जुड़ा हुआ माना जाता है।

    एक्यूप्रेशर से जुड़ी लोकप्रिय मान्यताओं के अनुसार, पैर की इस उंगली पर हल्का दबाव पड़ने से शरीर में कुछ विशेष बिंदु सक्रिय हो सकते हैं। इसी वजह से पुराने समय में बिछिया पहनने को केवल आभूषण नहीं, बल्कि एक पारंपरिक अभ्यास के तौर पर भी देखा जाता रहा है।

    हार्मोन और पीरियड्स से भी जोड़ी जाती है बिछिया

    बिछिया को लेकर एक प्रचलित मान्यता यह भी है कि पैर की दूसरी उंगली पर लगातार हल्का दबाव पड़ने से महिलाओं के प्रजनन तंत्र से जुड़े हिस्सों पर प्रभाव पड़ सकता है। कुछ पारंपरिक दावों में इसे हार्मोनल संतुलन और मासिक धर्म से भी जोड़ा जाता है।

    हालांकि, इन दावों को वैज्ञानिक तथ्य मानना सही नहीं होगा। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में अभी ऐसे

  • अस्पताल पहुंचने से पहले : KFC के कार पार्क में हुआ बच्चे का जन्म, परिवार ने रखा ‘कर्नल कोडी’ नाम.

    अस्पताल पहुंचने से पहले : KFC के कार पार्क में हुआ बच्चे का जन्म, परिवार ने रखा ‘कर्नल कोडी’ नाम.

    अस्पताल पहुंचने से पहले : KFC के कार पार्क में हुआ बच्चे का जन्म, परिवार ने रखा ‘कर्नल कोडी’ नाम.

    ब्रिटेन में एक कपल के साथ ऐसा अनोखा वाकया हुआ, जिसे वे शायद जिंदगीभर नहीं भूल पाएंगे। अस्पताल जाने के दौरान महिला की डिलीवरी इतनी जल्दी शुरू हो गई कि उन्हें रास्ते में ही कार रोकनी पड़ी। आखिरकार बच्चे का जन्म अस्पताल के बजाय KFC के कार पार्क में हो गया।

    इस घटना की सबसे दिलचस्प बात यह है कि बच्चे का नाम Cody रखा गया, लेकिन अब परिवार उसे प्यार से ‘कर्नल कोडी’ कहता है। इसकी वजह KFC के मशहूर संस्थापक Colonel Sanders से जुड़ी है।

    अस्पताल जाते समय अचानक बढ़ गया लेबर पेन

    रिपोर्ट के मुताबिक, 33 वर्षीय केटी मर्फी अपने 32 वर्षीय पार्टनर स्टीफन किर्बी के साथ अस्पताल जा रही थीं। केटी को तेज लेबर पेन हो रहा था और स्टीफन उन्हें कार से अस्पताल लेकर निकले थे।

    स्थिति को देखते हुए उन्होंने एंबुलेंस को भी फोन कर दिया। इसी दौरान उन्हें आसपास की लोकेशन बतानी थी, लेकिन रास्ते में ही हालात तेजी से बदलने लगे।

    स्टीफन की नजर Bromsgrove में A38 के पास मौजूद KFC आउटलेट पर पड़ी। वह जगह दोनों के लिए जानी-पहचानी भी थी। ऐसे में उन्होंने तुरंत कार को KFC के कार पार्क में ले जाकर रोक दिया।

    कार पार्क में ही हो गई डिलीवरी

    KFC पहुंचते-पहुंचते केटी को महसूस हुआ कि बच्चे का जन्म अब किसी भी पल हो सकता है। स्टीफन ने तुरंत कार रोकी और उनकी मदद करने के लिए पहुंचे।

    कुछ ही देर में केटी ने बेटे को जन्म दे दिया। यानी अस्पताल पहुंचने से पहले ही बच्चे ने दुनिया में कदम रख दिया था।

    राहत की बात यह रही कि एंबुलेंस भी करीब पांच मिनट बाद वहां पहुंच गई। इसके बाद मां और बच्चे को अस्पताल ले जाया गया।

    बेटे का नाम रखा Cody, प्यार से बुलाते हैं ‘कर्नल कोडी’

    बच्चे का नाम Cody रखा गया है। उसका वजन करीब 7 पाउंड 8 औंस बताया गया है और परिवार के मुताबिक वह पूरी तरह स्वस्थ है।

    लेकिन उसके जन्म की जगह की वजह से परिवार ने उसे एक मजेदार निकनेम भी दे दिया है। KFC के संस्थापक Colonel Sanders के नाम से जोड़ते हुए परिवार अब उसे प्यार से ‘Colonel Cody’ कहता है।

    परिवार का कहना है कि शायद यह नाम अब Cody के साथ जिंदगीभर जुड़ा रहेगा।

    अस्पताल में भी मंगाया गया KFC

    इस घटना की जानकारी अस्पताल की मिडवाइफरी टीम को मिली तो वहां भी यह किस्सा चर्चा का विषय बन गया।

    परिवार के मुताबिक, स्टाफ ने इस अनोखे संयोग को मजाकिया अंदाज में लिया और रात के खाने के लिए KFC भी ऑर्डर किया गया।

    परिवार अब मजाक में यह भी कहता है कि Cody का पहला जन्मदिन KFC में मनाया जा सकता है। यहां तक कि उसके पहले वीकेंड जॉब को लेकर भी परिवार मजाक करता है।

    सुबह अस्पताल से भेज दिया गया था घर

    स्टीफन ने बताया कि उसी दिन सुबह केटी और उन्हें अस्पताल से घर भेज दिया गया था, क्योंकि उस समय डॉक्टरों को लगा था कि डिलीवरी में अभी कुछ समय बाकी है।

    लेकिन शाम होते-होते केटी की तकलीफ काफी बढ़ गई। इसके बाद दोनों दोबारा अस्पताल के लिए निकल पड़े।

    रास्ते में करीब आधे घंटे की ड्राइव के दौरान उन्हें कार रोकने के लिए कोई उपयुक्त जगह नहीं मिल रही थी। तभी KFC का आउटलेट नजर आया और स्टीफन ने तुरंत वहां कार ले जाकर रोक दी।

    कुछ ही मिनट बाद उनका बेटा दुनिया में आ चुका था।

    KFC ने भी दी मजेदार प्रतिक्रिया

    इस अनोखे मामले पर KFC की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने

  • कश्मीर की डल झील: को आखिर क्या हो गया? कभी कमल के फूलों से सजती थी, अब खरपतवार और गंदगी ने बढ़ाई चिंता..

    कश्मीर की डल झील: को आखिर क्या हो गया? कभी कमल के फूलों से सजती थी, अब खरपतवार और गंदगी ने बढ़ाई चिंता..

    कश्मीर की डल झील: को आखिर क्या हो गया? कभी कमल के फूलों से सजती थी, अब खरपतवार और गंदगी ने बढ़ाई चिंता..

    कश्मीर की पहचान मानी जाने वाली डल झील इन दिनों गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रही है। जिस झील की खूबसूरती कभी बॉलीवुड फिल्मों और देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करती थी, उसके कई हिस्सों में अब गंदगी, सीवेज और घनी खरपतवार दिखाई दे रही है। स्थानीय लोगों और पर्यावरण से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर झील के पर्यावरण के साथ-साथ पर्यटन और स्थानीय लोगों की आजीविका पर भी पड़ सकता है।

    एक वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक, श्रीनगर में हर दिन करीब 201 मिलियन लीटर सीवेज पैदा होता है। इसमें से लगभग 73 फीसदी यानी करीब 147 मिलियन लीटर सीवेज का पर्याप्त उपचार नहीं हो पाता और यह डल झील या झेलम नदी जैसे जलस्रोतों तक पहुंच जाता है। यही वजह है कि अब डल झील की सफाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर समस्या सिर्फ झील की सतह साफ करने से दूर होगी या इसके लिए पूरी सीवेज व्यवस्था में बदलाव जरूरी है।

    डल झील की हालत क्यों बिगड़ रही है?

    डल झील और झेलम नदी श्रीनगर के लिए बेहद महत्वपूर्ण जलस्रोत हैं। लेकिन पिछले कई वर्षों में बढ़ती आबादी, अतिक्रमण, निर्माण गतिविधियों, कचरे और सीवेज ने इन जलस्रोतों पर दबाव बढ़ाया है।

    सबसे बड़ी चिंता बिना पर्याप्त उपचार के सीवेज के जलस्रोतों में पहुंचने को लेकर है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, श्रीनगर में रोज पैदा होने वाले करीब 201 मिलियन लीटर सीवेज में से लगभग 73 फीसदी का उपचार नहीं हो पाता। यानी हर दिन बड़ी मात्रा में गंदा पानी झील और नदी तक पहुंच रहा है।

    इसके अलावा खराब ड्रेनेज व्यवस्था और पानी के प्राकृतिक बहाव में रुकावट भी समस्या को बढ़ा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ स्थानों पर पानी के निकास के रास्तों में रुकावट के कारण झील का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हुआ है।

    सिर्फ सीवेज ही जिम्मेदार नहीं

    डल झील की समस्या केवल सीवेज तक सीमित नहीं है। स्थानीय निवासियों और एक्टिविस्ट्स के मुताबिक, झील के आसपास बढ़ता निर्माण, अतिक्रमण, कूड़ा-कचरा और जल निकासी की खराब व्यवस्था भी इसकी स्थिति पर असर डाल रही है।

    स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर गंदा पानी झील में पहुंचता रहेगा तो केवल ऊपर से खरपतवार हटाने या गाद निकालने से स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। इसके लिए पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रदूषित पानी झील में पहुंच ही न सके।

    कमल के फूलों की जगह दिखने लगी घनी खरपतवार

    डल झील की बदली हुई तस्वीर स्थानीय लोगों के लिए सबसे ज्यादा चिंता का विषय है। स्थानीय निवासी एजाज अहमद के मुताबिक, एक समय ऐसा था जब लोग झील के पानी का इस्तेमाल धार्मिक गतिविधियों के लिए करते थे और शिकारे के आसपास पीले और सफेद कमल के फूल नजर आते थे।

    अब झील के कई हिस्सों में अजोला की हरी परत और घनी खरपतवार दिखाई देती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, कुछ हिस्सों में पानी की स्थिति ऐसी हो गई है कि वहां शिकारे चलाना भी मुश्किल हो रहा है।

    एक अन्य स्थानीय निवासी अब्दुल रज्जाक का कहना है कि आज की डल झील पहले जैसी नहीं रही। उनका कहना है कि झील के आसपास बढ़ती आबादी और लंबे समय से चली आ रही समस्याओं ने इसकी स्थिति को काफी प्रभावित किया है।

    डल झील की हालत का पर्यटन पर क्या असर पड़ेगा?

    डल झील केवल एक प्राकृतिक जलस्रोत नहीं है, बल्कि कश्मीर के पर्यटन की पहचान भी है। शिकारे, हाउसबोट और झील का खूबसूरत नजारा यहां आने वाले पर्यटकों के प्रमुख आकर्षणों में शामिल हैं।

    स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर झील की हालत लगातार खराब होती रही तो इसका असर पर्यटन पर पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव उन लोगों की आय पर भी पड़ेगा, जिनका रोजगार शिकारे, हाउसबोट, पर्यटन सेवाओं और आसपास के कारोबार से जुड़ा है।

    इसलिए डल झील की समस्या को केवल पर्यावरण का मुद्दा मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसका संबंध स्थानीय अर्थव्यवस्था और हजारों लोगों की आजीविका से भी है।

    हर साल सफाई के बावजूद क्यों बनी हुई है समस्या?

    स्थानीय लोगों के मुताबिक, झील की सफाई के लिए समय-समय पर मशीनों और दूसरे संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि उनका कहना है कि सफाई का असर झील के कुछ हिस्सों तक ही सीमित रह जाता है।

    कुछ इलाकों में खरपतवार और गंदगी हटाने के बाद स्थिति बेहतर दिखाई देती है, लेकिन झील के दूसरे हिस्सों में समस्या बनी रहती है। स्थानीय लोगों का मानना है कि प्रशासन और जनता दोनों को अपनी भूमिका निभानी होगी।

    उनके मुताबिक, सरकार को जहां सीवेज ट्रीटमेंट की व्यवस्था मजबूत करनी होगी, वहीं लोगों को भी झील और उसके आसपास कचरा फेंकने से बचना होगा।

    एक्टिविस्ट ने बताई समस्या की जड़

    डल झील की सफाई से जुड़े स्थानीय एक्टिविस्ट तारिक पतलू का कहना है कि केवल सफाई अभियान चलाने से झील की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। उनके मुताबिक, झील में गंदा पानी पहुंचने की समस्या को सबसे पहले रोकना होगा।