वारसॉ (पोलैंड).
खूबसूरती पाने की चाहत जब एक पागलपन या मानसिक बीमारी का रूप ले ले, तो इसके नतीजे कितने खौफनाक हो सकते हैं, इसका एक जीता-जागता और डरावना उदाहरण पोलैंड से सामने आया है. यहां एक 26 साल की युवती एल्वा ने महंगे डॉक्टरों और कॉस्मेटिक क्लीनिकों की फीस से बचने के लिए इंटरनेट से नकली और बिना लाइसेंस वाले ब्यूटी प्रोडक्ट्स खरीदे. इसके बाद उसने किसी भी ट्रेनिंग के बिना, घर पर ही खुद से अपने चेहरे पर सिलिकॉन के इंजेक्शन लगाना शुरू कर दिया. इस जानलेवा लापरवाही का नतीजा यह हुआ कि आज उसके चेहरे की हालत बद से बदतर हो चुकी है. आईने में एल्वा अब खुद को भी पहचान नहीं पा रही है.
मूल रूप से पोलैंड के एक छोटे से शहर में लड़के के रूप में जन्मी एल्वा पिछले कई सालों से अपनी शारीरिक बनावट और लुक को लेकर मानसिक तनाव से गुजर रही थीं. अपने चेहरे को बदलने की चाहत में उसने कुछ साल पहले ब्लैक मार्केट से संदिग्ध कॉस्मेटिक उत्पाद ऑर्डर करना शुरू किया. शुरुआत में उन्होंने खुद ही चेहरे की चर्बी घटाने वाली दवाओं के इंजेक्शन सप्ताह में दो बार अपने चेहरे पर लगाने शुरू किए. इसका असर यह हुआ कि उसका चेहरा जरूरत से ज्यादा पतला और पिचक गया. इस नुकसान की भरपाई करने के लिए उसने इंटरनेट से इंजेक्टेबल लिपोलिसिस और नकली सिलिकॉन खरीदा और उसे चेहरे पर इंजेक्ट करना शुरू कर दिया.
एल्वा ने एक पोलिश समाचार आउटलेट को बताया कि शुरुआत में वे सप्ताह में एक बार सिलिकॉन इंजेक्शन लगाती थीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें इसकी ऐसी लत लगी कि वे हर दिन अपने चेहरे पर खुद ही सुई चुभाने लगीं. उस समय वे वारसॉ शहर में रह रही थीं और उनकी अधिकांश कमाई कमरे के किराए में चली जाती थी, इसलिए उनके पास किसी एक्सपर्ट डॉक्टर के पास जाने के पैसे नहीं थे. ऐसे में बिना किसी डॉक्टरी प्रशिक्षण और भारी मात्रा में नकली सिलिकॉन का इस्तेमाल करने के कारण एल्वा के पूरे चेहरे पर गंभीर सूजन आ गई. उनकी त्वचा पर गहरे निशान (Scars) पड़ गए हैं और उनकी आंखें सूजन के कारण लगभग पूरी तरह बंद हो चुकी हैं.
इस मामले पर चिंता जताते हुए एस्थेटिक मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ मारेक वासिलुक ने कहा कि एल्वा ने जिन उत्पादों का इस्तेमाल किया है, वे प्रमाणित नहीं हैं और बेहद खतरनाक हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि भले ही अभी कोई गंभीर संक्रमण न दिख रहा हो, लेकिन अगले छह महीनों में यह सूजन जानलेवा इन्फेक्शन का रूप ले सकती है, जिसमें उनकी आंखों को सबसे बड़ा खतरा है. वहीं, मनोवैज्ञानिक पॉलिना मिएर्जेजेवस्का का मानना है कि एल्वा ‘बॉडी डिस्मॉर्फिया’ नाम की एक गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं, जिसमें व्यक्ति अपने वास्तविक रूप को नापसंद करने लगता है और जोखिमों की परवाह किए बिना काल्पनिक रूप पाने की जिद में अंधा हो जाता है. डॉक्टरों के अनुसार, एल्वा को वापस सामान्य स्थिति में लाने के लिए पहले मानसिक काउंसलिंग और फिर चेहरे के नुकसान का आकलन करने के लिए एमआरआई कराना होगा.
उत्तर प्रदेश से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। एक युवक अपनी परिचित युवती से मिलने उसके घर पहुंचा था, लेकिन दोनों के बीच हुए विवाद ने हिंसक रूप ले लिया। आरोप है कि विवाद के दौरान युवती ने धारदार हथियार से युवक पर हमला कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया।
घटना के बाद युवक की चीख-पुकार सुनकर आसपास के लोग मौके पर पहुंचे और पुलिस को सूचना दी। घायल युवक को तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि युवक और युवती एक-दूसरे को लंबे समय से जानते थे। दोनों के बीच पहले से परिचय था, लेकिन पिछले कुछ समय से उनके संबंधों में तनाव चल रहा था।
पुलिस के अनुसार, युवती का आरोप है कि युवक उसके निजी वीडियो के जरिए उस पर लगातार दबाव बना रहा था। इसी बात को लेकर दोनों के बीच कहासुनी हुई, जो बाद में हिंसक घटना में बदल गई। पुलिस इन आरोपों की सत्यता की जांच कर रही है।
घटना के बाद पुलिस ने युवती को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि दोनों पक्षों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल मामले की विस्तृत जांच जारी है।
ब्राजील को बायोफ्यूल की दुनिया का सबसे सफल उदाहरण कहा जाता है.
क्रूड ऑयल की सप्लाई चेन में बाधा आने की वजह से बायोफ्यूल की चर्चा तेज हो चली है. भारत में ई-20 पेट्रोल अनिवार्य कर दिया गया है. दुनिया लंबे समय से क्रूड ऑयल पर निर्भर रही है. पेट्रोल, डीजल, गैस और विमान ईंधन के लिए कच्चे तेल का इस्तेमाल होता है. लेकिन अब ऊर्जा का यह मॉडल तेजी से बदल रहा है. महंगा तेल, बढ़ता प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन बड़ी चुनौतियां बन चुके हैं. ऐसे समय में बायोफ्यूल एक मजबूत विकल्प बनकर सामने आया है. बायोफ्यूल पौधों, अनाज, गन्ने, मक्का, वनस्पति तेल, जैविक कचरे और पशु अवशेषों से बनाया जाता है. वर्ल्ड बायोफ्यूल डे के मौके पर जानिए, बायोफ्यूल का बादशाह देश कौन है? इससे कैसे दे रहा अर्थव्यवस्था को रफ्तार? क्यों दुनिया बायोफ्यूल की तरफ क्यों बढ़ रही?
बायोफ्यूल का बादशाह कौन सा देश है? इसका उत्तर एक शब्द या एक लाइन में देना आसान नहीं है. यूं कुल बायोफ्यूल उत्पादन में अमेरिका नंबर एक है. वहीं, गन्ने से एथनॉल बनाने और उसे रोजमर्रा की परिवहन व्यवस्था का सफल हिस्सा बनाने में ब्राजील को दुनिया का सबसे प्रभावशाली मॉडल माना जाता है. इंडोनेशिया, चीन भी इस मामले में आगे आए हैं. भारत भी ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से इस ओर कदम बढ़ा चुका है. इसलिए इस एक सवाल को बड़े कैनवस पर देखना होगा.
प्रोडक्शन के मामले अमेरिका नंबर एक
साल 2024 के उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा बायोफ्यूल उत्पादक देश है. उसका कुल उत्पादन करीब 856 हजार बैरल तेल समतुल्य प्रतिदिन रहा. तेल समतुल्य बैरल का मतलब है कि अलग-अलग ईंधनों की ऊर्जा क्षमता को एक सामान्य पैमाने पर मापा गया है.
अमेरिका में बायोफ्यूल उत्पादन का सबसे बड़ा आधार मक्का है. मक्का से एथनॉल तैयार किया जाता है. यह एथनॉल पेट्रोल में मिलाया जाता है. इससे पेट्रोल की खपत कम होती है. अमेरिका में एथनॉल के साथ बायोडीजल और रिन्यूएबल डीजल का भी उत्पादन होता है. रिन्यूएबल डीजल को सामान्य डीजल के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. यही कारण है कि अमेरिका केवल एथनॉल में नहीं, बल्कि कुल तरल बायोफ्यूल उत्पादन में भी आगे है.
ब्राजील क्यों कहलाता है एथेनॉल का किंग?
ब्राजील कुल उत्पादन में अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है. उसका कुल बायोफ्यूल उत्पादन करीब 510 हजार बैरल तेल-समतुल्य प्रतिदिन रहा. इसके बावजूद ब्राजील को बायोफ्यूल की दुनिया का सबसे सफल उदाहरण कहा जाता है. इसकी सबसे बड़ी वजह गन्ना एथनॉल है. ब्राजील ने 1970 के दशक में तेल संकट के दौरान एथेनॉल को गंभीरता से अपनाना शुरू किया था. तब से देश ने गन्ने से बनने वाले ईंधन को अपनी परिवहन व्यवस्था का अहम हिस्सा बना लिया. ब्राजील में बड़ी संख्या में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन चलते हैं.
ये वाहन पेट्रोल, एथनॉल या दोनों के मिश्रण से चलते हैं. इससे वाहन मालिक को ईंधन चुनने की सुविधा मिलती है. ब्राजील में गन्ने से केवल चीनी नहीं बनती. गन्ने के रस और शीरे से एथनॉल तैयार होता है. चीनी निकालने के बाद बचने वाले रेशेदार अवशेष को बगास कहा जाता है. इस बगास से बिजली भी बनाई जाती है. यानी एक ही फसल से चीनी, ईंधन और बिजली मिलती है. यही ब्राजील के मॉडल की बड़ी ताकत है. इसलिए सही निष्कर्ष यह है कि अमेरिका कुल उत्पादन का नंबर एक देश है, जबकि ब्राजील गन्ना एथनॉल और फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल का वैश्विक नेता है.
इंडोनेशिया: बायोडीजल की बड़ी शक्ति
बायोफ्यूल उत्पादन में इंडोनेशिया तीसरे स्थान पर है. 2024 में उसका कुल उत्पादन करीब 205 हजार बैरल तेल समतुल्य प्रतिदिन रहा. इंडोनेशिया की ताकत पाम ऑयल से बनने वाला बायोडीजल है. देश में डीजल में बायोडीजल मिलाने की नीति लागू है. इसे बी-35 नीति के नाम से जाना जाता है. इसका मतलब है कि डीजल में 35 प्रतिशत तक बायोडीजल शामिल किया जा सकता है. इंडोनेशिया पाम ऑयल का बड़ा उत्पादक है.
इसलिए उसके पास बायोडीजल के लिए जरूरी कच्चा माल बड़ी मात्रा में उपलब्ध है. इससे उसे डीजल आयात कम करने और घरेलू उद्योग बढ़ाने में मदद मिलती है. हालांकि, पाम ऑयल आधारित बायोडीजल के साथ पर्यावरण की चिंता भी जुड़ी है. यदि जंगलों को काटकर पाम की खेती बढ़ाई जाए, तो पर्यावरण को नुकसान हो सकता है. इसलिए टिकाऊ खेती और जंगलों की सुरक्षा जरूरी है.
चीन: तेजी से बढ़ती बायोफ्यूल क्षमता
चीन इस सूची में चौथे स्थान पर है. उसका कुल बायोफ्यूल उत्पादन करीब 106 हजार बैरल तेल समतुल्य प्रतिदिन रहा. चीन एथनॉल, बायोडीजल और कचरे से बनने वाले जैव ईंधन के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है. चीन के सामने ऊर्जा सुरक्षा और वायु प्रदूषण बड़ी चुनौतियां हैं. विशाल वाहन बाजार भी उसकी ईंधन जरूरत बढ़ाता है. ऐसे में बायोफ्यूल उसके लिए एक उपयोगी विकल्प है. चीन कृषि और शहरी जैविक कचरे के बेहतर इस्तेमाल पर भी काम कर रहा है. भविष्य में वहां कचरे और गैर-खाद्य स्रोतों से बनने वाले बायोफ्यूल का महत्व बढ़ सकता है.
भारत: उभरती हुई बायोफ्यूल शक्ति
भारत दुनिया के टॉप पांच बायोफ्यूल उत्पादक देशों में शामिल है. 2024 में उसका कुल उत्पादन करीब 70 हजार बैरल तेल समतुल्य प्रतिदिन रहा. भारत का जोर मुख्य रूप से एथनॉल मिश्रण पर है. भारत पेट्रोल में एथनॉल मिलाकर पेट्रोलियम आयात घटाने की दिशा में काम कर रहा है. एथनॉल के लिए गन्ने के अलावा मक्का, टूटे चावल और अन्य अनुमत कृषि स्रोतों का इस्तेमाल किया जा रहा है.
भारत के लिए बायोफ्यूल का महत्व केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है. यह किसानों की आय से भी जुड़ा है. एथनॉल उत्पादन के लिए फसलों की मांग बढ़ने से कृषि क्षेत्र को नया बाजार मिल सकता है. इस्तेमाल किए गए खाना पकाने के तेल से बायोडीजल बनाने की संभावना भी बढ़ रही है. कृषि अवशेषों, गोबर और जैविक कचरे से बायोगैस तथा कंप्रेस्ड बायोगैस भी तैयार की जा सकती है. इससे पराली जलाने जैसी समस्याओं से निपटने में मदद मिल सकती है.
बायोफ्यूल से अर्थव्यवस्था को कैसे मिलती है रफ्तार?
बायोफ्यूल उद्योग का पहला लाभ किसानों को होता है. गन्ना, मक्का, तिलहन और अन्य कृषि उत्पादों की मांग बढ़ती है. इससे किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार बनता है. दूसरा लाभ रोजगार के रूप में मिलता है. बायोफ्यूल संयंत्रों में उत्पादन, परिवहन, भंडारण, मशीनरी और तकनीकी सेवाओं से रोजगार पैदा होते हैं. ग्रामीण इलाकों में इसका प्रभाव अधिक दिखता है. तीसरा लाभ तेल आयात बिल में कमी का है. जो देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात से पूरा करते हैं, वे घरेलू बायोफ्यूल उत्पादन बढ़ाकर विदेशी मुद्रा बचा सकते हैं. चौथा लाभ ऊर्जा सुरक्षा है. यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत अचानक बढ़ जाए, तो बायोफ्यूल घरेलू विकल्प के रूप में कुछ राहत दे सकता है.
दुनिया बायोफ्यूल की तरफ क्यों बढ़ रही है?
दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है. पेट्रोल और डीजल जलने से कार्बन डाइऑक्साइड समेत कई प्रदूषक निकलते हैं. बायोफ्यूल को जीवाश्म ईंधन की तुलना में कम कार्बन वाला विकल्प माना जाता है. यह लाभ हर स्थिति में समान नहीं होता. उत्पादन की पूरी प्रक्रिया महत्वपूर्ण है. फसल उगाने में कितना पानी लगा, कितनी खाद और ऊर्जा लगी, परिवहन कितना हुआ और क्या जंगलों को नुकसान पहुंचा, इन सभी बातों का असर पड़ता है. फिर भी, सही तरीके से तैयार किया गया बायोफ्यूल प्रदूषण घटाने में मदद कर सकता है. खासकर विमानन, भारी ट्रक और समुद्री परिवहन जैसे क्षेत्रों में इसका महत्व बढ़ रहा है, जहां केवल बैटरी से काम चलाना अभी कठिन है.
क्या है बायोफ्यूल का भविष्य?
भविष्य में बायोफ्यूल का ध्यान केवल गन्ने और मक्का तक सीमित नहीं रहेगा. कृषि कचरा, पराली, लकड़ी के अवशेष, शैवाल, नगरों का जैविक कचरा और इस्तेमाल किया गया खाद्य तेल महत्वपूर्ण स्रोत बन सकते हैं. इसे दूसरी और तीसरी पीढ़ी का बायोफ्यूल कहा जाता है. इसका लाभ यह है कि इससे खाद्य फसलों पर दबाव कम हो सकता है. बायोफ्यूल, इलेक्ट्रिक वाहन और ग्रीन हाइड्रोजन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. आने वाले समय में ये सभी ऊर्जा विकल्प अलग-अलग जरूरतों के लिए साथ काम करेंगे.
छोटे बच्चों के दांतों में कैविटी (दांतों की सड़न) एक आम लेकिन गंभीर समस्या है। यदि समय पर इसका इलाज न कराया जाए, तो बच्चे को तेज दर्द, सूजन और संक्रमण जैसी परेशानियां हो सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, सही ओरल हाइजीन और खानपान की अच्छी आदतों से बच्चों के दांतों को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है।
बच्चों के दांतों में कैविटी के शुरुआती लक्षण
यदि बच्चे के दांतों में ये संकेत दिखाई दें, तो यह कैविटी की शुरुआत हो सकती है—
दांतों पर सफेद, भूरे या काले धब्बे दिखाई देना।
खाना खाने के दौरान या बाद में दांत में दर्द होना।
दांतों में खाना बार-बार फंसना।
ठंडा या मीठा खाने पर संवेदनशीलता महसूस होना।
मुंह से बदबू आना।
बच्चों के दांत क्यों सड़ते हैं?
दांतों की सड़न के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे—
ज्यादा मिठाइयां, चॉकलेट और कैंडी खाना।
बार-बार मीठे पेय, पैकेट वाले जूस या शक्कर वाला दूध पीना।
चिपकने वाले स्नैक्स का अधिक सेवन।
दांतों की नियमित सफाई न करना।
फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट का इस्तेमाल न करना।
जब दांतों पर जमी गंदगी साफ नहीं होती, तो बैक्टीरिया प्लाक (Plaque) बनाते हैं। यही बैक्टीरिया एसिड बनाकर दांतों की ऊपरी परत (इनेमल) को नुकसान पहुंचाते हैं और धीरे-धीरे कैविटी बन जाती है।
इलाज में देरी करने से क्या हो सकता है?
यदि कैविटी का समय पर इलाज न कराया जाए, तो—
दांतों में तेज दर्द हो सकता है।
मसूड़ों में सूजन आ सकती है।
संक्रमण बढ़कर चेहरे या गर्दन तक फैल सकता है।
बच्चे को खाने और बोलने में परेशानी हो सकती है।
बच्चों के दांतों की देखभाल कैसे करें?
विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार—
दांत निकलने से पहले बच्चे के मसूड़ों को साफ और गीले कपड़े से पोंछें।
पहला दांत निकलते ही मुलायम ब्रश से सफाई शुरू करें।
दिन में कम से कम दो बार दांत साफ कराएं।
बच्चे की उम्र के अनुसार उचित मात्रा में फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट का उपयोग करें।
जीभ की सफाई और मसूड़ों की देखभाल भी करें।
बच्चों को सही तरीके से ब्रश कैसे कराएं?
दांत साफ करते समय इन बातों का ध्यान रखें—
ब्रश पर थोड़ी मात्रा में टूथपेस्ट लगाएं।
ब्रश को लगभग 45 डिग्री के कोण पर रखें।
हल्के हाथों से गोलाई में ब्रश करें।
दांतों की बाहरी, अंदरूनी और चबाने वाली सभी सतहों को साफ करें।
कम से कम 2 मिनट तक ब्रश करें।
सुबह और रात सोने से पहले ब्रश कराने की आदत डालें।
कैविटी से बचाव के आसान उपाय
बच्चों को बार-बार मीठा खाने की आदत न डालें।
मीठा खाने के बाद कुल्ला करवाएं।
पैकेट वाले जूस और शक्कर वाले पेय सीमित करें।
नियमित डेंटल चेकअप कराएं।
बच्चों को सही तरीके से ब्रश करना सिखाएं और शुरुआत में उनकी मदद करें।
निष्कर्ष
बच्चों के दूध के दांत भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितने स्थायी दांत। इसलिए दांतों में सफेद या काले धब्बे, दर्द या कैविटी के किसी भी शुरुआती संकेत को नजरअंदाज न करें। सही खानपान, नियमित ब्रशिंग और समय-समय पर डेंटिस्ट से जांच करवाकर बच्चों के दांतों को स्वस्थ रखा जा सकता है।
अस्वीकरण: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यदि बच्चे के दांतों में दर्द, कैविटी या अन्य समस्या दिखाई दे, तो योग्य दंत चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
उस बच्चे को दिवाली के मेले के लिए मिले पैसों से मिठाई की जगह झांसी की रानी की तस्वीर की तलाश रहती थी. तस्वीर न मिलती तो मन उदास हो जाता. मिल जाती तो चेहरे पर चमक आ जाती. मां से वो बच्चा कहता कि झांसी की रानी के रास्ते चलूंगा. लाहौर में आगे की पढ़ाई के समय आर्यसमाजी ताऊ की सलाह डी.ए.वी.कॉलेज के लिए थी. उस किशोर की पसंद लाला लाजपत राय द्वारा संस्थापित नेशनल कॉलेज था, जो राष्ट्रीय आंदोलन की नर्सरी था. यहीं सुखदेव और सरदार भगत सिंह का साथ हुआ. यह ऐसा साथ था कि फांसी के फंदे पर भी कायम रहा.
क्रांतिकारी रास्ते से ब्रितानी हुकूमत को उखाड़ फेंकने में यकीन रखने वाले सुखदेव और उनके साथियों के हाथों में सिर्फ पिस्तौल-बम नहीं थे. वे खूब पढ़ते थे. वैचारिक दृष्टि से समृद्ध थे. महात्मा गांधी से मतभेद थे लेकिन उनका आदर करते थे. सवाल भी करते थे. उन्होंने महात्मा गांधी को लिखा था “मैं नहीं मानता कि आप भी इस प्रचलित कल्पना में विश्वास करते हैं कि क्रांतिकारी बुद्धिहीन हैं. विनाश और संहार में आनंद मनाते हैं. वस्तुस्थिति ठीक उल्टी है. वे सदैव कोई कदम उठाने से पहले खूब विचार कर लेते हैं.” सरदार भगत सिंह के साथ फांसी पर चढ़ने वाले 23 साल के सुखदेव उन जैसे ही पढ़ाकू, तेजस्वी और साहसी थे. पढ़िए अमर शहीद सुखदेव की गाथा.
झांसी की रानी जैसा बनूंगा
15 मई 1907 को जन्मे सुखदेव के सिर से सिर्फ तीन साल की उम्र में पिता रामलाल थापर का साया उठ गया था. मां रल्ली देई की ममता और गांधीवादी ताऊ चिन्त राम थापर के संरक्षण के बीच वे पढ़ते और देश-समाज को समझने की कोशिश करते रहे. लेकिन उनकी मंजिल क्या होगी, इसके संकेत बचपन में ही मिलने लगे थे.
रानी लक्ष्मीबाई.
दिवाली में घर के बच्चों को पैसे मिलते. वे पटाके और मिठाइयां खरीदने के लिए निकल पड़ते. लेकिन छोटे से सुखदेव को उस तस्वीर की तलाश रहती जिसमें घोड़े पर सवार झांसी की रानी पीठ पर बच्चा बंधा होता. एक हाथ में लगाम होती. दूसरे में तलवार. कभी तस्वीर मिलती. कभी नहीं. जब नहीं मिलती, तब उदासी घेर लेती. मिल जाती तो चेहरा चमक उठता. घर पहुंच मां को तस्वीर दिखाते वह यही कहता – ऐसा ही बनूँगा.
कॉलेज में हुआ भगत सिंह का साथ
एक सदी से अधिक पहले के उस दौर की कल्पना की जाए, जब न इतने अखबार थे और न चौबीस घंटे चलने वाले खबरिया चैनल. देश-दुनिया के हाल जानने के सीमित संचार साधनों के बीच भी जो सजग-संवेदनशील और जागरूक थे, उसे पंद्रह साल के किशोर सुखदेव के जरिए समझिए. 1922 में लायलपुर से उन्होंने हाईस्कूल पास किया. आगे की पढ़ाई के लिए लाहौर गए.
आर्यसमाजी ताऊ उन्हें डी.ए.वी.कॉलेज में दाखिल कराना चाहते थे. लेकिन सुखदेव की पसंद लाला लाजपत राय द्वारा संस्थापित नेशनल कॉलेज था. उन्हें पता था कि यह कॉलेज उनकी राष्ट्रवादी सोच के अनुकूल है और जिस माहौल और साथ की उन्हें चाह है , वह यहीं हासिल हो सकता है. यहीं उनका साथ सरदार भगत सिंह का साथ हुआ, जो आखिरी सांस तक कायम रहा.
सुखदेव.
सुखदेव भी भगत सिंह जैसे पढ़ाकू
तीन साल बाद सुखदेव के छोटे भाई मथरादास भी पढ़ाई के लिए लाहौर पहुंचे. हॉस्टल छोड़कर सुखदेव एक किराए के मकान में आ गए. इस बीच सुखदेव अपने कोर्स से ज्यादा इतिहास, राजनीति और दुनिया के कई देशों की क्रांतियों से जुड़ी किताबों में डूबे रहे. उनकी आलमारी में ये किताबें सिर्फ सजी नहीं थीं , बल्कि सुखदेव और साथियों के बीच उन पर लगातार चर्चा होती रहती थी. सुखदेव और भगत सिंह के बीच अराजकतावाद पर लंबी बहसें मथरादास ने भी खूब सुनीं. बाद में अपने भाई सुखदेव पर लिखी किताब में मथरादास ने याद किया कि उन्हीं दिनों भगत सिंह ने द्वारका दास लाइब्रेरी से प्राप्त किताब “अनारकिज्म एंड अदर एसेज” पढ़ी थी. इस किताब पर भगत सिंह और सुखदेव महीनों तक मंथन करते रहे. प्रसिद्ध क्रांतिकारी शिव वर्मा ने लिखा है, “भगत सिंह और सुखदेव को छोड़कर अन्य किसी साथी ने समाजवाद पर उन जैसा पढ़ा और मनन नहीं किया था. उनका ज्ञान हमारी तुलना में कहीं अधिक था.”
क्रांति के लिए हर रिश्ता कुर्बान
अप्रैल 1929 के मशहूर असेंबली बम एक्शन के लिए चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह को नहीं चुना था. यह पहला क्रांतिकारी एक्शन था, जिसमें बम फेंकने के बाद भागने की जगह क्रांतिकारियों को अपनी गिरफ्तारी देनी थी. पुलिस को सांडर्स हत्याकांड में भगत सिंह की तलाश थी. आजाद को पता था कि एक बार भगत सिंह के जेल में पहुंच जाने के बाद उनकी वापसी मुमकिन नहीं होगी. आजाद अपने बेशकीमती साथी को खोना नहीं चाहते थे. लेकिन सुखदेव का प्रस्ताव था कि इसमें भगत सिंह को जरूर शामिल किया जाए.
साथियों की बैठक में सुखदेव सिंह ने भगत सिंह को ललकारा भी था. फिर भगत सिंह अड़ गए थे. आजाद के बहुत समझाने पर भी नहीं माने थे. बटुकेश्वर दत्त के साथ सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने के बाद उन्होंने अपनी गिरफ्तारी दी थी. सुखदेव की दलील थी कि भगत सिंह अकेले व्यक्ति हैं, जो दल के उद्देश्यों को प्रभावी तरीके से जनता के सामने रख सकते हैं.
भगत सिंह.
प्रसिद्ध क्रांतिकारी शिव वर्मा ने “संस्मृतियों” में लिखा, “सुखदेव में व्यक्तिगत तौर पर सबसे ज्यादा भगत सिंह के लिए ममता थी. प्यार नाम की जो पूंजी उनके पास थी, वह उन्होंने भगत सिंह को ही सौंपी थी. लेकिन समय आने पर आदर्शों के लिए अपने सबसे प्यारे दोस्त को मौत के मुंह में भेजने में उन्होंने संकोच नहीं किया. क्रांति के रास्ते प्यार और दोस्ती कैसे आड़े आ सकती थी?”
अदालत में बचाव में कोई दिलचस्पी नहीं
असेंबली बम कांड में जेल पहुंचे भगत सिंह सांडर्स हत्याकांड के भी अभियुक्त थे. सुखदेव की भी इसी मामले में गिरफ्तारी हुई. लाहौर षडयंत्र केस के नाम से चर्चित इस मामले में स्पेशल ट्रिब्यूनल के सामने अन्य साथियों की तरह सुखदेव की भी अपने बचाव में कोई दिलचस्पी नहीं थे. सरकारी खर्च पर वकील मुहैया करने की अदालत की पेशकश पर उनका जवाब था कि वे इस अदालत को ही मान्यता नहीं देते. भगत सिंह की तरह सुखदेव ने भी अदालती कार्यवाही को क्रांतिकारी आदर्शों के प्रचार का जरिया बनाया. इस दौरान या तो ब्रिटिश राज के खिलाफ नारे लगाते रहे या फिर कटघरे में ही किसी किताब में डूबे रहे. तय मानते थे कि सरकार छोड़ेगी नहीं और जिन्हें फांसी होनी है, उसमें उनका भी नाम होगा. कभी कह पड़ते थे कि न्याय का यह आडंबर कब तक चलता रहेगा ? फैसला वही हुआ. अदालत ने भगत सिंह और राजगुरु के साथ सुखदेव को भी फांसी की सजा सुनाई.
जेल से महात्मा गांधी को पत्र
फांसी का सुखदेव और साथियों को बेसब्री से इंतजार था. इस दौरान भी वे लिख-पढ़ रहे थे. आखिरी दिनों में सुखदेव ने अपने छोटे भाई मथरादास को महात्मा गांधी के नाम लिखा एक पत्र सिपुर्द किया था. मथरादास ने काफी मुश्किलों के बीच इसे कांग्रेस के कराची अधिवेशन में महात्मा गांधी तक महादेव देसाई के जरिए पहुंचाया था. दुर्भाग्य से उसके पहले 23 मार्च 1931 को सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु को फांसी हो चुकी थी. सुखदेव ने महात्मा गांधी को लिखा था कि समझौते (गांधी-इर्विन पैक्ट) के बाद क्रांतिकारियों से अपना आंदोलन बंद करने और अहिंसक उपायों के प्रयोग की आपने कई प्रकट प्रार्थनाएं की हैं.
महात्मा गांधी.
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के नाम से ही स्पष्ट है कि क्रांतिकारियों का आदर्श समाज सत्तावादी प्रजातंत्र स्थापित करना है और जब तक ये ध्येय प्राप्त न हो और जब तक आदर्श सिद्ध न हों ,वे लड़ाई जारी रखने के लिए बंधे हुए हैं. क्रांतिकारी युद्ध जुदा जुदा मौकों पर अलग रूप धारण करता है. कभी गुप्त, कभी प्रकट और कभी जीवन मरण का भयानक संग्राम बन जाता है. ऐसी परिस्थिति में क्रांतिकारियों के सामने अपना आंदोलन बंद करने के लिए विशेष कारण होने चाहिए. निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रांतिकारी युद्ध में कोई महत्व नहीं होता.
महात्मा गांधी पर नौकरशाही की मदद का आक्षेप
सुखदेव ने महात्मा गांधी से उम्मीद जताई थी,”मैं नहीं मानता कि आप भी इस प्रचलित पुरानी कल्पना में विश्वास करते हैं कि क्रांतिकारी बुद्धिहीन हैं. विनाश और संहार में आनंद मनाते हैं. वस्तुस्थिति ठीक उल्टी है. वे सदैव कोई कदम उठाने से पहले खूब विचार कर लेते हैं. क्रांति के कार्य में दूसरे किसी अंग की अपेक्षा रचनात्मक पक्ष का महत्व समझते हैं लेकिन मौजूदा हालत में अपने संहारक अंग पर डटे रहने के अलावा कोई चारा नहीं है.”
याद दिलाया कि 1915 से जेलों में पड़े गदर पार्टी के बीसियों कैदियों सजा की मियाद पूरी करने के बाद भी सड़ रहे हैं. मार्शल लॉ के बीसियों कैदी आज भी जिंदा कब्रों में दफनाए पड़े हैं.यही हाल बब्बर अकाली कैदियों का है. देवगढ़, काकोरी, मछुआ बाजार और लाहौर षड्यंत्र के कैदी भी जेलों में हैं. लाहौर, दिल्ली, चटगांव,बंबई, कलकत्ता और अन्य जगहों के आधा दर्जन से ज्यादा षड्यंत्र मामले चल रहे हैं. बहुसंख्यक क्रांतिकारी जिसमे स्त्रियां भी हैं भागते फिर रहे हैं. सचमुच आधा दर्जन से ज्यादा कैदी फांसी के इंतजार में हैं. ये सब होने के बाद भी आप उन्हें अपना आंदोलन स्थगित करने की सलाह देते हैं. ऐसी दशा में आपकी प्रार्थनाओं का यही मतलब होता है कि इस आंदोलन को कुचल देने में आप नौकरशाही की मदद कर रहे हैं और आपकी विनती का अर्थ उनके दल का द्रोह,पलायन और विश्वासघात का उपदेश करना है.
गांधी का जवाब लेकिन तब तक सुखदेव नहीं रहे
30 अप्रैल 1931 के “हिंदी नवजीवन” में महात्मा गांधी ने सुखदेव के पत्र का जवाब दिया था लेकिन तब तक वे शहीद हो चुके थे. सुखदेव ने गांधी को लिखे पत्र में स्वयं को अनेकों में एक बताया था. बापू ने लिखा कि स्वर्गीय सुखदेव का यह पत्र मुझे उनकी मृत्यु के बाद दिया गया. वे अनेकों में एक नहीं हैं. राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए फांसी को गले लगाने वाले अनेक नहीं होते. राजनीतिक खून चाहें जितने निंद्य हों, तो भी जिस देश प्रेम और साहस के कारण ऐसे भयानक काम किए जाते हैं, उनकी कद्र किए बिना नहीं रहा जा सकता. और, यह आशा रखें कि राजनीतिक खूनियों का संप्रदाय बढ़ नहीं रहा है. यदि भारत वर्ष का प्रयोग सफल हुआ, और होना ही चाहिए, तो राजनीतिक खूनियों का पेशा सदा ले लिए बंद हो जाएगा. मैं स्वयं तो इसी श्रद्धा के साथ काम कर रहा हूं. लेखक यह कहकर मेरे साथ अन्याय करते हैं कि क्रांतिकारियों से उनका आंदोलन बंद करने की भावपूर्ण प्रार्थनाएं करने के सिवा मैंने कुछ नहीं किया.उल्टे मेरा दावा तो यह है कि मैंने उनके सामने नग्न सत्य रखा है, जिसका इन स्तंभों में कई बार जिक्र किया जा चुका है और उसे फिर से दोहराया जा सकता है.
सोशल मीडिया पर इन दिनों एक अजीबोगरीब और हैरान कर देने वाला मामला तेजी से वायरल हो रहा है. एक टिकटॉक क्रिएटर ने जब अपने परिवार के इतिहास का पता लगाने के लिए DNA टेस्ट कराया, तो जो सच सामने आया उसने उसके पैरों तले जमीन खिसका दी. जिस महिला से उसकी शादी हुई और जिससे उसके दो प्यारे बच्चे हैं, वह असल में उसकी चचेरी बहन निकली. इस चौंकाने वाले खुलासे ने इंटरनेट पर हलचल मचा दी है और लोग इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं.
जब अजनबी बन गए रिश्तेदार
बोर्ड पांडा की रिपोर्ट के अनुसार, टिकटॉक पर @toothlessandruthless नाम से वीडियो शेयर करने वाले इस क्रिएटर ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका पारिवारिक इतिहास ऐसा मोड़ लेगा. वह और उसकी पत्नी दोनों ही अपनी फैमिली हिस्ट्री और डीएनए का पता लगाना चाहते थे. जब दोनों की डीएनए रिपोर्ट्स आईं, तो पता चला कि वे दोनों आपस में फर्स्ट कजिन हैं. हैरानी की बात यह थी कि शादी से पहले इस बात की भनक न तो उन दोनों को थी और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य को.
बच्चों के भविष्य और तलाक की चिंता
इस खुलासे के बाद से वह व्यक्ति गहरे मानसिक तनाव में है. उसने सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करते हुए लोगों से सलाह मांगी कि अब उसे क्या करना चाहिए. उसने वीडियो में कहा, जब से मुझे पता चला है कि मैंने अपनी चचेरी बहन से शादी की है, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या करूं. क्या हमें तलाक ले लेना चाहिए? हमारे बच्चों का क्या होगा? उनका यह वीडियो देखते ही देखते वायरल हो गया और इसे करोड़ों लोग देख चुके हैं.
क्यों नहीं हुई थी किसी को पहले इस रिश्ते की भनक?
लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह था कि शादी के वक्त किसी को इस पारिवारिक संबंध के बारे में क्यों नहीं पता चला? इस पर क्रिएटर ने सफाई दी कि यह रिश्ता उनकी फैमिली ट्री की एक ऐसी भूली-बिसरी शाखा से जुड़ा था जिसके बारे में किसी को जानकारी नहीं थी. उनकी दादी और उनकी पत्नी की दादी सगी बहनें थीं, लेकिन वक्त के साथ यह संपर्क टूट गया और दोनों परिवारों को कभी इस बात का अंदाजा ही नहीं हुआ.
दो हिस्सों में बंटे नेटिजन्स
इस वायरल खुलासे पर सोशल मीडिया यूजर्स की राय दो हिस्सों में बंट गई है. कुछ लोगों का कहना है कि चचेरे भाई-बहनों में शादी के बाद पैदा होने वाले बच्चों में थैलेसीमिया, सिस्टिक फाइब्रोसिस जैसी जेनेटिक बीमारियां होने का खतरा थोड़ा बढ़ जाता है. इसलिए उन्हें तुरंत बच्चों की मेडिकल जांच करवानी चाहिए और कपल्स थेरेपी लेनी चाहिए. यह भी पढ़ें: डर की ऐसी की तैसी! 97 साल की ‘दादी’ ने उड़ते प्लेन पर किया ऐसा स्टंट, देख दंग रह गई दुनिया
बात को दबाने की सलाह
वहीं कुछ यूजर्स का मानना है कि अब बहुत देर हो चुकी है, उनके दो बच्चे हैं, इसलिए उन्हें डरने की जरूरत नहीं है और इस बात को यहीं खत्म कर देना चाहिए क्योंकि इतिहास में भी ऐसे कई उदाहरण रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी स्थिति में घबराने के बजाय शांत रहकर डॉक्टर और जेनेटिक काउंसलर की मदद लेनी चाहिए.
आजकल मॉडर्न होम डेकोर में कांच से बनी चीजों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। डाइनिंग टेबल से लेकर बर्तन, शोपीस तक, कांच की चीजें लगभग हर घर का हिस्सा बन चुकी हैं। वास्तु और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इनका जरूरत से ज्यादा उपयोग शुभ नहीं होता। क्योंकि कई बार कांच की वस्तुएं घर के माहौल, रिश्तों और मानसिक शांति पर नकारात्मक असर डालती हैं। अगर फिर भी आप इन चीजों का इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो कुछ बातों का ख्याल रखना जरूरी है। तो चलिए जानते हैं इससे जुड़े वास्तु नियम क्या है।
कांच का सीमित करें इस्तेमाल
वास्तु शास्त्र कहता है कि
घर में कांच की वस्तुओं का उपयोग जरूरत के हिसाब से ही करना चाहिए। अगर घर में हर जगह कांच का बहुत इस्तेमाल किया जाए, तो इसका असर परिवार के सदस्यों के स्वभाव पर पड़ सकता है। मान्यता है कि इससे लोग अधिक भावुक हो सकते हैं। ऐसे में छोटी-छोटी बातों पर गलतफहमियां या तनाव बढ़ने की संभावना रहती है।
कांच के बर्तन
आजकल बहुत से घरों में लोग रोजाना ही भोजन के लिए कांच की प्लेट, कटोरी और गिलास का इस्तेमाल करते हैं। हर समय कांच के बर्तनों का उपयोग करने से जीवन में संतुष्टि और आनंद की भावना धीरे-धीरे कम हो सकती है। ऐसे में इनका इस्तेमाल समझदारी से करें, ताकि इसका बुरा प्रभाव आपके परिवार पर न पड़े।
मिरर लगाने की सही जगह
दर्पण को वास्तु में विशेष महत्व दिया गया है। इसे व्यक्ति की भावनाओं का भी रिफ्लेक्शन माना जाता है। इसलिए घर के हर हिस्से में आईना लगाने से बचना चाहिए। खासकर बेडरूम या सोने की जगह पर आईना लगाना सही नहीं माना जाता। सुबह उठते ही सबसे पहले नजर आईने पर नहीं पड़ना चाहिए। ऐसे में सुबह उठते ही दर्पण के सामने न खड़े होने की सलाह दी जाती है।
कांच की टेबल से जुड़ी मान्यता
कई घरों और ऑफिस में कांच की टेबल का चलन बढ़ गया है, लेकिन वास्तु की माने तो लंबे समय तक कांच की मेज पर काम करना उचित नहीं होता है। इससे एकाग्रता प्रभावित हो सकती है और करियर में रुकावटें आने की आशंका रहती है।
क्या मुंह की बदबू किसी बीमारी का संकेत हो सकती है?
अगर आपके मुंह से बार-बार बदबू आती है, तो इसे केवल दांतों की सफाई की कमी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई बार यह खराब ओरल हाइजीन, मसूड़ों की बीमारी, दांतों की सड़न या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत भी हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि बदबू लंबे समय तक बनी रहती है या इसके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई दें, तो डेंटिस्ट या डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
1. मसूड़ों की बीमारी हो सकती है वजह
मसूड़ों में संक्रमण या सूजन होने पर मुंह से बदबू आ सकती है। इसके साथ ये लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं—
मसूड़ों से खून आना।
मसूड़ों में सूजन।
ब्रश करते समय दर्द होना।
मसूड़ों का कमजोर होना।
खराब ओरल हाइजीन और तंबाकू का सेवन मसूड़ों की बीमारी का खतरा बढ़ा सकता है।
2. दांतों की सड़न (कैविटी)
दांतों में कैविटी होने पर भोजन के कण फंस जाते हैं, जिससे बैक्टीरिया पनपते हैं और बदबू आने लगती है।
यदि बदबू के साथ—
दांत में दर्द,
ठंडा-गर्म लगना,
या कैविटी दिखाई दे,
तो जल्द से जल्द डेंटिस्ट से जांच करानी चाहिए।
3. खराब ओरल हाइजीन
मुंह की नियमित सफाई न करने पर बैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं, जो सांस की दुर्गंध का कारण बन सकते हैं।
अच्छी ओरल हाइजीन के लिए—
दिन में दो बार फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट से ब्रश करें।
जीभ की सफाई करें।
फ्लॉस का इस्तेमाल करें।
नियमित रूप से डेंटल चेकअप कराएं।
4. तंबाकू और शराब का सेवन
धूम्रपान, तंबाकू और शराब का सेवन केवल सांस की बदबू ही नहीं बढ़ाते, बल्कि मसूड़ों की बीमारी, दांतों की समस्याओं और मुंह के कैंसर का जोखिम भी बढ़ा सकते हैं।
5. हर बार बदबू का मतलब गंभीर बीमारी नहीं
कभी-कभी सुबह उठने के बाद या तेज गंध वाले खाद्य पदार्थ खाने के बाद सांस से बदबू आना सामान्य हो सकता है। लेकिन यदि समस्या लगातार बनी रहे और इसके साथ अन्य लक्षण भी हों, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
कब डॉक्टर या डेंटिस्ट से मिलें?
यदि मुंह की बदबू लंबे समय तक बनी रहे और साथ में ये लक्षण दिखाई दें—
मसूड़ों से खून आना।
मसूड़ों में सूजन।
दांतों में दर्द या कैविटी।
मुंह में लगातार दर्द।
बदबू के बावजूद नियमित सफाई से भी सुधार न होना।
तो विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।
मुंह की बदबू से बचने के आसान उपाय
दिन में दो बार अच्छी तरह ब्रश करें।
जीभ की सफाई करना न भूलें।
फ्लॉस का नियमित इस्तेमाल करें।
पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
तंबाकू और शराब से दूरी बनाएं।
मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करें।
हर 6–12 महीने में डेंटल चेकअप कराएं।
निष्कर्ष
मुंह से आने वाली बदबू हमेशा सिर्फ दांतों की समस्या नहीं होती। यह मसूड़ों की बीमारी, कैविटी, खराब ओरल हाइजीन या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत भी हो सकती है। यदि यह समस्या बार-बार या लंबे समय तक बनी रहे, तो केवल माउथ फ्रेशनर पर निर्भर रहने के बजाय सही कारण का पता लगाकर इलाज कराना बेहतर होता है।
अस्वीकरण: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यदि मुंह की बदबू या अन्य ओरल हेल्थ समस्याएं लंबे समय तक बनी रहें, तो योग्य डेंटिस्ट या डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।
सोशल मीडिया पर तमाम तरह के वीडियो वायरल होते रहते हैं, जो बहुत मजेदार होते हैं. खासतौर पर बच्चों के फनी वीडियो को लोग खूब पसंद करते हैं. आजकल जैसे-जैसे सोशल मीडिया का जमाना आगे बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे अलग-अलग तरह के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आते रहते हैं. स्कूल के वीडियो भी खूब लोगों को पसंद आते हैं. ऐसा ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर इन दिनों वायरल हो रहा है. वायरल हो रहा वीडियो एक स्कूल के क्लासरूम का है, जिसमें एक क्लास टीचर नजर आ रही है और कुछ बच्चे बेंच पर बैठे हुए नजर आ रहे हैं.
वायरल वीडियो में मैडम बच्चों की टेस्ट कॉपी देख रही हैं. जिसमें एक कॉपी को लेकर वह बहुत हंसती हुई नजर आ रही हैं. दरअसल, टेस्ट में सवाल पूछा गया था कि जंगलों से वन्य जीव क्यों कम होते जा रहे हैं, इसका कारण क्या है? इस सवाल का जवाब एक बच्चे ने बहुत मजेदार दिया है. बच्चे ने कॉपी में प्रश्न का जवाब लिखा है कि जंगलों से वन्य जीव इसलिए गायब हो रहे हैं. क्योंकि वह किडनैप हो रहे हैं और फिर उनको जू में लाया जा रहा है.
बच्चे ने जवाब में लिखा, ‘इतने पेड़-पौधे कट रहे हैं. और जानवर किडनैप हो रहे हैं. और जू में जा रहे हैं. इसलिए वन्यजीवों की संख्या में गिरावट आ रही है. इस वायरल वीडियो को हजारों लोगों ने लाइक्स किया है. इस तरह के वीडियो खूब वायरल होते रहते हैं. क्योंकि लोग खूब पसंद करते हैं. बच्चे सवालों के जवाब बहुत मजेदार देते हैं.
अक्सर लोग जीवन में आने वाली मुश्किलों का कारण ग्रहों की स्थिति या खराब समय को मानते हैं। लेकिन हमारी दिनचर्या की कुछ छोटी-छोटी आदतें भी जीवन पर असर डाल सकती हैं। वास्तु और ज्योतिष शास्त्र में बताया गया है कि हमारी रोजमर्रा की कुछ आदतें घर की सकारात्मक ऊर्जा को प्रभावित कर सकती हैं।
अनजाने में की गई छोटी-छोटी गलतियों के कारण हमारे आसपास नेगेटिव एनर्जी बढ़ती है। जिसके कारण कार्यों में रुकावट व आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। चलिए जानते हैं कि ऐसी कौन सी आदतें हैं जो हमारे ग्रह दोष का कारण बन सकती है।
रोज की ये आदतें चुपचाप बिगाड़ रही हैं आपका वास्तु
देर तक सोने से बचें: वास्तु और ज्योतिष में
सूर्य को ऊर्जा, स्वास्थ्य और सम्मान का प्रतीक माना गया है। अगर व्यक्ति देर तक सोता है, तो उसे सुबह की प्राकृतिक धूप का लाभ नहीं मिल पाता। इससे सकारात्मक ऊर्जा कम होती है। ऐसे में आलस्य, आत्मविश्वास में कमी और करियर से जुड़ी बाधाएं बढ़ सकती हैं। इसलिए सूर्योदय के आसपास या उससे पहले उठना चाहिए।
दूसरों के कपड़े पहनने की आदत:
हर व्यक्ति की अपनी ऊर्जा होती है, जिसका प्रभाव उसके कपड़ों पर भी माना जाता है। ऐसे में नियमित रूप से किसी और के कपड़े पहनना शुभ नहीं होता। मान्यता है कि इससे मानसिक अस्थिरता, चिड़चिड़ापन और नकारात्मकता बढ़ सकती है। खासकर रोजमर्रा के कपड़ों को साझा करने से बचने की सलाह दी जाती है।
नाखून चबाने की आदत छोड़ें:
दांतों से नाखून चबाना सिर्फ एक बुरी आदत नहीं, बल्कि इसे मानसिक अशांति का संकेत भी माना जाता है। वास्तु और ज्योतिष के अनुसार, यह आदत व्यक्ति की एकाग्रता और सही निर्णय लेने की क्षमता पर असर डालती है। इससे बार-बार गलत फैसले लेने की संभावना बढ़ सकती है।
बिस्तर पर बैठकर भोजन न करें:
बिस्तर को केवल आराम और नींद के लिए उपयुक्त माना गया है। बिस्तर पर बैठकर भोजन करना शुभ नहीं माना जाता। इससे नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ता है। व्यक्ति को मानसिक तनाव या उलझनों का सामना करना पड़ सकता है। भोजन हमेशा साफ-सुथरे स्थान पर, शांत मन से और उचित दिशा में बैठकर करना बेहतर माना गया है।