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  • बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, किस उम्र में कितनी एक्सरसाइज है जरूरी?

    बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, किस उम्र में कितनी एक्सरसाइज है जरूरी?

    बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, किस उम्र में कितनी एक्सरसाइज है जरूरी?

    फिट रहने के लिए रोज कितनी एक्सरसाइज करनी चाहिए?

    आज के समय में फिट और हेल्दी रहने के लिए लोग वॉकिंग, रनिंग, योग, जिम और दूसरी तरह की एक्सरसाइज करते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर हर उम्र के व्यक्ति को कितनी देर तक फिजिकल एक्टिविटी करनी चाहिए? क्या रोज 10 हजार कदम चलना ही पर्याप्त है या इससे ज्यादा भी जरूरी है?

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, स्वस्थ रहने के लिए सिर्फ कदम गिनना ही जरूरी नहीं है, बल्कि पूरे सप्ताह की कुल शारीरिक गतिविधि ज्यादा मायने रखती है। हर उम्र के लोगों के लिए एक्सरसाइज की जरूरत अलग-अलग होती है।

    क्या रोज 10 हजार कदम चलना जरूरी है?

    WHO के अनुसार, 10 हजार कदम चलना कोई अनिवार्य नियम नहीं है। यह एक सामान्य लक्ष्य हो सकता है, लेकिन हर व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और जीवनशैली के अनुसार फिजिकल एक्टिविटी की जरूरत अलग होती है। इसलिए केवल स्टेप काउंट पर ध्यान देने के बजाय नियमित रूप से सक्रिय रहना अधिक महत्वपूर्ण है।

    सिर्फ कदम नहीं, एक्टिव लाइफस्टाइल भी जरूरी

    फिट रहने के लिए केवल वॉक करना ही काफी नहीं है। पूरे दिन में की जाने वाली कई गतिविधियां भी फिजिकल एक्टिविटी का हिस्सा होती हैं, जैसे—

    • तेज चलना
    • साइकिल चलाना
    • दौड़ना
    • तैराकी
    • खेलकूद
    • योग
    • घर के काम
    • सीढ़ियां चढ़ना

    जितना अधिक शरीर सक्रिय रहेगा, उतना ही स्वास्थ्य को लाभ मिलेगा।

    5 से 17 साल के बच्चों और किशोरों के लिए

    WHO की गाइडलाइन के अनुसार 5 से 17 वर्ष के बच्चों और किशोरों को हर दिन कम से कम 60 मिनट मध्यम से तेज शारीरिक गतिविधि करनी चाहिए।

    इसमें शामिल हो सकते हैं—

    • आउटडोर गेम्स
    • दौड़ना
    • साइकिल चलाना
    • तैराकी
    • डांस
    • अन्य खेल गतिविधियां

    सप्ताह में कम से कम 3 दिन ऐसी गतिविधियां भी करनी चाहिए जो हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत बनाएं।

    18 से 64 साल के वयस्कों के लिए

    18 से 64 वर्ष की उम्र के लोगों के लिए WHO की सलाह है कि वे सप्ताहभर में—

    • कम से कम 150 से 300 मिनट मध्यम तीव्रता वाली एक्सरसाइज करें।
    • या 75 से 150 मिनट तेज तीव्रता वाली एक्सरसाइज करें।
    • बेहतर स्वास्थ्य लाभ के लिए सप्ताह में दो या उससे अधिक दिन मांसपेशियों को मजबूत करने वाली एक्सरसाइज भी करें।

    65 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों के लिए

    65 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों को भी सप्ताह में कम से कम 150 मिनट शारीरिक गतिविधि करने की सलाह दी जाती है।

    इसके अलावा उन्हें ऐसी एक्सरसाइज भी करनी चाहिए जो—

    • संतुलन (Balance) बेहतर बनाए,
    • गिरने के जोखिम को कम करे,
    • मांसपेशियों को मजबूत रखे,
    • शरीर की लचीलापन बनाए रखे।

    लंबे समय तक बैठे रहना भी नुकसानदायक

    WHO का कहना है कि केवल एक्सरसाइज करना ही काफी नहीं है। लंबे समय तक लगातार बैठे रहना भी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए काम के दौरान बीच-बीच में उठकर थोड़ा चलना, स्ट्रेचिंग करना और शरीर को सक्रिय रखना जरूरी है।

    निष्कर्ष

    स्वस्थ रहने के लिए किसी एक तय संख्या में कदम चलना जरूरी नहीं है। असली लक्ष्य नियमित रूप से सक्रिय रहना और उम्र के अनुसार पर्याप्त फिजिकल एक्टिविटी करना है। चाहे बच्चे हों, युवा हों या बुजुर्ग—हर किसी को अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार नियमित व्यायाम करना चाहिए। यदि पहले से कोई गंभीर बीमारी या स्वास्थ्य समस्या है, तो नई एक्सरसाइज शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

    अस्वीकरण: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी प्रकार की एक्सरसाइज शुरू करने या अपनी दिनचर्या में बदलाव करने से पहले योग्य चिकित्सक या फिटनेस विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।

  • अंग्रेजों के होश उड़ाने वाले चंद्रशेखर आजाद कैसे कम उम्र में बने सटीक निशानेबाज?..

    अंग्रेजों के होश उड़ाने वाले चंद्रशेखर आजाद कैसे कम उम्र में बने सटीक निशानेबाज?..

    अंग्रेजों के होश उड़ाने वाले चंद्रशेखर आजाद कैसे कम उम्र में बने सटीक निशानेबाज?..

    चंद्रशेखर आज़ाद का बचपन भील समुदाय के बीच बीता जो तीरंदाजी में माहिर थे.

    23 जुलाई 1906 को जन्मे और महज 24-25 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गए. वे आजादी के ऐसे दीवाने थे कि नाम के आगे भी आजाद लगा लिया. अंग्रेज उनसे थर-थर कांपते थे. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चर्चित क्रांतिकारियों में थे. वे साहसी थे. तेज़ निर्णय लेते थे. अपने साथियों की सुरक्षा को बहुत महत्व देते थे. उनकी एक खास पहचान उनका सटीक निशाना भी था. ऐसे ही थे भारतीयों के रग-रग में बसे चंद्रशेखर आजाद.

    आइए, उनकी जन्म जयंती के बहाने जानते हैं कि वे निशानेबाजी में महारथ हासिल करने में कैसे कामयाब हुए? किस उम्र में पिस्टल-गोलियों से खेलने लगे?

    कम उम्र में ही पक्के निशानेबाज हो गए थे

    आज़ाद की निशानेबाजी केवल प्राकृतिक प्रतिभा नहीं थी. इसके पीछे बचपन का अभ्यास, मजबूत शरीर, धैर्य, सतर्कता और कठिन परिस्थितियों में शांत रहने की क्षमता थी. क्रांतिकारी जीवन में पिस्तौल उनके लिए शौक की वस्तु नहीं थी. वह आत्मरक्षा, साथी-सुरक्षा और संगठन की जिम्मेदारी का साधन थी.

    चंद्रशेखर आज़ाद का बचपन मध्य भारत के भाबरा क्षेत्र में बीता. यह क्षेत्र वन, पहाड़ और आदिवासी जीवन से जुड़ा था. वहां भील समुदाय के लोग रहते थे. भील समुदाय को तीर-कमान चलाने की पारंपरिक कला के लिए जाना जाता है. आज़ाद ने बचपन में भील बच्चों के साथ तीर चलाने का अभ्यास किया. यह अभ्यास उनके लिए बहुत उपयोगी बना. तीरंदाजी में आंख, हाथ और लक्ष्य के बीच सही तालमेल चाहिए होता है. निशाना लगाते समय सांस, शरीर और ध्यान को नियंत्रित रखना पड़ता है. यही गुण आगे चलकर पिस्तौल चलाने में भी उनके काम आए. तीर-कमान से मिला अभ्यास उनके हाथों की स्थिरता और नजर की एकाग्रता का आधार बना.

    क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद.

    इसलिए रखते थे पिस्तौल और गोलियां

    जब आज़ाद क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े, तब परिस्थितियां बदल गईं. अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ संघर्ष बहुत कठिन था. पुलिस, खुफिया तंत्र और सरकारी बल लगातार क्रांतिकारियों की तलाश में रहते थे. ऐसी स्थिति में क्रांतिकारियों को अपनी रक्षा करनी पड़ती थी. साथियों को सुरक्षित निकालना भी जरूरी होता था, इसलिए आज़ाद ने तीर-कमान के स्थान पर पिस्तौल और गोलियां रखना शुरू किया. लेकिन इसे केवल हथियार रखने की कहानी नहीं मानना चाहिए. आज़ाद के लिए पिस्तौल जिम्मेदारी का प्रतीक थी. उन्हें कई बार संगठन के वरिष्ठ साथियों की रक्षा करनी होती थी. वे खतरे के समय पीछे हटने वाले व्यक्ति नहीं थे. उनका उद्देश्य अंधाधुंध गोली चलाना नहीं था. वे परिस्थितियों को समझकर फैसला लेते थे. यही बात उन्हें सामान्य हथियारबंद व्यक्ति से अलग बनाती है.

    नियमित शारीरिक अभ्यास उनकी पहचान

    आज़ाद का शरीर बहुत मजबूत था. वे नियमित रूप से दंड-बैठक करते थे. उनका शरीर गठा हुआ था. उनकी मांसपेशियां मजबूत थीं. वे पेड़ों पर चढ़ने में भी कुशल थे. शारीरिक फिटनेस का निशानेबाजी से गहरा संबंध है. मजबूत शरीर का मतलब केवल ताकत नहीं होता. इसका अर्थ है बेहतर संतुलन. निशाना लगाते समय हाथ कांपना नहीं चाहिए. शरीर का नियंत्रण जरूरी है. तनाव में भी शरीर को स्थिर रखना पड़ता है. आज़ाद कठिन जीवन जीते थे. वे कम साधनों में रहते थे. कई बार जमीन पर अखबार बिछाकर सो जाते थे. फिर भी उनका अनुशासन नहीं टूटता था. यह अनुशासन उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता को मजबूत करता था.

    अपने मन पर जबरदस्त काबू रखते थे आजाद

    अच्छा निशानेबाज केवल अच्छी आंख वाला व्यक्ति नहीं होता. उसे डर और दबाव में भी शांत रहना पड़ता है. आज़ाद इस गुण के लिए प्रसिद्ध थे. वे लंबे समय तक अंग्रेज पुलिस से बचते रहे. वे लगातार अपना भेष बदलते. कभी व्यापारी तो कभी कुली बनते. कभी साधु का रूप धारण करते थे तो कभी अंग्रेज़ी पहनावे में दिखाई देते थे. इस जीवन में हर समय पकड़े जाने का खतरा था. ऐसी स्थिति में घबराहट स्वाभाविक थी, लेकिन आज़ाद में मानसिक संतुलन था. वे खतरे के बीच भी स्थिति को पढ़ते थे. वे समझते थे कि कब रुकना है, कब आगे बढ़ना है और कब अपने साथी को बचाना है. यह मानसिक स्थिरता उनके निशाने को मजबूत बनाती थी.

    साथियों की सुरक्षा पहली जिम्मेदारी समझते थे आजाद

    चंद्रशेखर आज़ाद की निशानेबाजी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष साथियों की सुरक्षा था. वे अक्सर अपने साथियों को बचाने के लिए पीछे रहते थे. उनका काम केवल हमला करना नहीं था. उनका पीछा कर रहे लोगों को रोकना भी था. लाहौर में सांडर्स की हत्या के बाद ऐसा ही एक प्रसंग सामने आता है. योजना में भगत सिंह और राजगुरु मुख्य भूमिका में थे. आज़ाद को पीछे से सुरक्षा देने की जिम्मेदारी मिली थी. घटना के बाद भगत सिंह और राजगुरु वहां से निकल रहे थे. हेड कॉन्स्टेबल चानन सिंह उनका पीछा कर रहा था. आज़ाद ने उसे रुकने की चेतावनी दी. जब उसने पीछा जारी रखा, तो आज़ाद ने गोली चलाई. यह घटना बताती है कि आज़ाद केवल निशाना लगाने में कुशल नहीं थे. वे संकट में अपने साथियों की रक्षा करने के लिए तैयार रहते थे. उनके लिए संगठन और साथियों की जान बहुत महत्वपूर्ण थी.

    अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से हुई अंतिम लड़ाई

    चंद्रशेखर आज़ाद की निशानेबाजी की चर्चा उनकी अंतिम लड़ाई के कारण भी होती है. 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस ने उन्हें घेर लिया. आज यह पार्क चंद्रशेखर आज़ाद के नाम से ही जाना जाता है. उस समय वे अकेले नहीं थे. उनके साथ सुखदेव भी थे. आज़ाद ने पहले अपने साथी को सुरक्षित निकलने का अवसर दिया. उसके बाद वे पुलिस का सामना करते रहे.

    बीबीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के आईजी रहे हॉलिंस के हवाले से आज़ाद के निशाने की प्रशंसा का उल्लेख मिलता है. हॉलिंस ने लिखा कि आज़ाद की पहली गोली नॉट बावर के कंधे में लगी थी. पुलिस इंस्पेक्टर विशेश्वर सिंह को भी गंभीर चोट लगी थी. हॉलिंस के अनुसार आज़ाद की गोलियां पेड़ पर इंसान की औसत ऊंचाई के आसपास लगी थीं. दूसरी ओर पुलिस की कई गोलियां काफी ऊपर लगी थीं. इस विवरण से यह संकेत मिलता है कि घिर जाने और घायल होने के बाद भी आज़ाद का नियंत्रण खुद पर बना हुआ था. यह उनके धैर्य और अभ्यास की बड़ी मिसाल है.

    आजाद के लिए पिस्तौल का अर्थ क्या था?

    आज़ाद के जीवन में पिस्तौल का अर्थ हिंसा का प्रदर्शन नहीं था. वह औपनिवेशिक दमन के दौर में आत्मरक्षा और प्रतिरोध का साधन थी. उस समय अनेक क्रांतिकारियों का मानना था कि अंग्रेज़ी शासन के सामने केवल अपील से आज़ादी नहीं मिलेगी. हालांकि, स्वतंत्रता आंदोलन में कई विचारधाराएं थीं. महात्मा गांधी अहिंसा और जन-आंदोलन के पक्षधर थे. दूसरी ओर आज़ाद, भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारी प्रतिरोध का रास्ता चुन रहे थे. दोनों धाराओं का लक्ष्य भारत की आज़ादी था, लेकिन तरीके अलग थे. आज़ाद की पिस्तौल उनके चुने हुए रास्ते का हिस्सा थी. फिर भी उनका व्यक्तिगत जीवन अनुशासन, सादगी और साथियों के प्रति समर्पण से भरा था.

    कम शब्दों में कहें तो चंद्रशेखर आज़ाद निशानेबाजी में इसलिए पक्के थे क्योंकि उन्होंने बचपन से लक्ष्य साधने का अभ्यास किया था. भील बच्चों के साथ तीरंदाजी ने उनकी नजर और हाथों को प्रशिक्षित किया. क्रांतिकारी जीवन ने उन्हें पिस्तौल का कुशल उपयोग सिखाया. उनकी शारीरिक शक्ति, मानसिक संतुलन और अनुशासन ने इस कौशल को और मजबूत बनाया. वे निशानेबाज जरूर थे, लेकिन उनकी पहचान केवल इसी तक सीमित नहीं थी. उनका जीवन यह बताता है कि किसी भी कौशल के पीछे अभ्यास, अनुशासन और स्पष्ट उद्देश्य का बड़ा महत्व है.

  • महिला का अचानक फूलने लगा पेट, लोग समझने लगे प्रेग्नेंट, फिर खुला खौफनाक राज..?

    महिला का अचानक फूलने लगा पेट, लोग समझने लगे प्रेग्नेंट, फिर खुला खौफनाक राज..?

    महिला का अचानक फूलने लगा पेट, लोग समझने लगे प्रेग्नेंट, फिर खुला खौफनाक राज..?

    लंदन. यूके के स्विंडन शहर की रहने वाली 51 वर्षीय डेब्स डनहम की जिंदगी में कुछ साल पहले एक ऐसा खौफनाक मोड़ आया, जिसने उनकी सेहत, पहचान और आत्मविश्वास को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया. साल 2020 में जब डेब्स 44 साल की थीं और अपनी नॉर्मल व हेल्दी लाइफ जी रही थीं, तब अचानक उनका पेट अजीब तरीके से बाहर निकलने लगा. जिम में साइकिल चलाते समय बार-बार उनका घुटना पेट से टकराने लगा. शुरुआत में उन्होंने इसे सामान्य मानते हुए मेनोपॉज का असर समझा. वे लगातार पुदीने की चाय पीने लगीं और पेट की गैस कम करने की दवाइयां निगलने लगीं. लेकिन पेट का आकार रुकने के बजाय दिन-ब-दिन बढ़ता ही गया. स्थिति इतनी बिगड़ गई कि बाहर निकलने पर लोग उन्हें गर्भवती समझने लगे. खुद उनके पति ने भी टोकते हुए कहा कि वे दिखने में प्रेग्नेंट लग रही हैं.

    डेब्स इतनी असहज महसूस करने लगीं कि उन्होंने शीशे के सामने जाना और पति के सामने कपड़े बदलना तक बंद कर दिया. जब कोई भी घरेलू नुस्खा काम नहीं आया और पेट गुब्बारे की तरह फूलता चला गया, तो वे डॉक्टर के पास पहुंचीं. डॉक्टरों ने तुरंत एमआरआई स्कैन और ब्लड टेस्ट किए. इसके बाद जब रिपोर्ट सामने आई तो डेब्स और उनके परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई. उनके पेट के अंदर 20 सेंटीमीटर बड़ा कैंसरयुक्त ट्यूमर तेजी से बढ़ रहा था. जान बचाने के लिए डॉक्टरों ने तुरंत सर्जरी कर पेट में जमा तरल पदार्थ को बाहर निकाला और गर्भाशय हटाने की प्रक्रिया को अंजाम दिया. सर्जरी पूरी तरह सफल रही और डेब्स कैंसर से मुक्त हो गईं. लेकिन इस गंभीर इलाज और सर्जिकल मेनोपॉज ने उनके शरीर पर भारी असर डाला. कैंसर के तनाव और बदले हुए हार्मोनल असंतुलन के कारण उनकी खाने-पीने की आदतें बुरी तरह बिगड़ गईं.

    डेब्स इसकी वजह से डिप्रेशन में चली गईं और बहुत ज्यादा खाना खाने लगीं, जिसके चलते उनका वजन बढ़कर लगभग 99 किलो तक पहुंच गया. उनके साइज के कपड़े छोटे पड़ने लगे. बीमारी के बाद ये भी एक ऐसा दौर था, जब वजन बढ़ने से डेब्स का आत्मविश्वास दोबारा डगमगाने लगा. लेकिन सितंबर 2023 में उन्होंने हार न मानते हुए खुद को बदलने का फैसला किया. उन्होंने वजन घटाने वाले इंजेक्शनों का सहारा लेने के बजाय संतुलित पोषण और सही पोर्शन कंट्रोल वाली डाइट प्लान की मदद ली. उन्होंने पोर्शन-कंट्रोल मील डिलीवरी का तरीका अपनाया और 9 महीनों के भीतर लगभग 29 किलो वजन कम कर लिया. आज 51 साल की उम्र में डेब्स पूरी तरह फिट हैं और उनकी शादीशुदा जिंदगी में भी पुरानी खुशियां लौट आई हैं.

  • बेड के पास रखी दवाई कहीं बढ़ा तो नहीं रही परेशानी? जानें वास्तु में क्यों सिरहाने मेडिसिन रखने की है मनाही..

    बेड के पास रखी दवाई कहीं बढ़ा तो नहीं रही परेशानी? जानें वास्तु में क्यों सिरहाने मेडिसिन रखने की है मनाही..

    बेड के पास रखी दवाई कहीं बढ़ा तो नहीं रही परेशानी? जानें वास्तु में क्यों सिरहाने मेडिसिन रखने की है मनाही..

    दवाइयां हमारी रोजमर्रा की जरूरतों का हिस्सा हैं। अक्सर लोग सुविधा के लिए इन्हें ऐसी जगह रख देते हैं, जहां जरूरत पड़ने पर तुरंत मिल जाएं। खासकर रात में इस्तेमाल होने वाली दवाइयां लोग अपने बिस्तर या सिरहाने के पास रख लेते हैं। हालांकि, वास्तु शास्त्र में दवाइयों को रखने की जगह को लेकर कुछ मान्यताएं बताई गई हैं। वास्तु अनुसार, सही स्थान पर रखी गई चीजें घर में सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने में मदद करती हैं । जानिए कहां दवाइयां रखना चाहिए और कहां नहीं।

    सिरहाने रखने की क्यों है मनाही?

    कई लोग रात में जरूरत पड़ने की वजह से दवाइयों को अपने बिस्तर के पास या तकिए के नीचे रख लेते हैं। लेकिन वास्तु मान्यताओं के अनुसार ऐसा करना शुभ नहीं माना जाता। कहा जाता है कि दवाइयां बीमारी से जुड़ी वस्तु होती हैं, इसलिए इन्हें सोने की जगह के आसपास रखने से नकारात्मक ऊर्जा बढ़ सकती है। इससे मानसिक तनाव, बेचैनी और चिंता जैसी परेशानियां बढ़ने की मान्यता है।

    रसोई में न रखें दवाइयां

    वास्तु शास्त्र में रसोई को घर का महत्वपूर्ण और पवित्र स्थान माना गया है, क्योंकि यहीं भोजन तैयार होता है। इसलिए यहां दवाइयां रखना उचित नहीं माना जाता। मान्यता है कि इससे घर के स्वास्थ्य और सुख-शांति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    पूजा स्थल से रखें दूर

    पूजा घर को सकारात्मक ऊर्जा का स्थान माना जाता है। ऐसे में दवाइयों को पूजा घर या उसके आसपास रखने से बचने की सलाह दी जाती है। इन्हें किसी साफ और व्यवस्थित अलमारी में रखना बेहतर माना जाता है।

    धन रखने वाली जगह पर न रखें

    वास्तु मान्यताओं के अनुसार जिस स्थान पर पैसे, गहने या अन्य कीमती चीजें रखी जाती हैं, वहां दवाइयां रखना शुभ नहीं माना जाता। कहा जाता है कि इससे आर्थिक परेशानियां बढ़ सकती हैं और अनावश्यक खर्च की स्थिति बन सकती है।

    दवाई रखने की सही जगह

    दवाइयों को घर में ऐसी जगह रखना चाहिए, जहां साफ-सफाई बनी रहे और जरूरत के समय आसानी से मिल जाएं। व्यवस्थित तरीके से रखी गई दवाइयां न केवल घर में सुविधा बनाए रखती हैं, बल्कि सामान को सही तरीके से रखने की आदत भी विकसित करती हैं।

    (Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

  • सुबह उठते ही खाली पेट चाय पीते हैं? जानिए सेहत पर पड़ने वाले 6 बड़े असर, आज ही बदलें ये आदत…

    सुबह उठते ही खाली पेट चाय पीते हैं? जानिए सेहत पर पड़ने वाले 6 बड़े असर, आज ही बदलें ये आदत…

    सुबह उठते ही खाली पेट चाय पीते हैं? जानिए सेहत पर पड़ने वाले 6 बड़े असर, आज ही बदलें ये आदत…

    सुबह की शुरुआत चाय से करना पड़ सकता है भारी

    भारत में लाखों लोगों की सुबह की शुरुआत एक कप गर्म चाय से होती है। कई लोगों का मानना है कि बिना चाय के उनकी नींद ही नहीं खुलती। लेकिन अगर आप रोजाना खाली पेट चाय पीते हैं, तो यह आदत धीरे-धीरे आपकी सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकती है। खासतौर पर जिन लोगों को पहले से गैस, एसिडिटी या पाचन संबंधी समस्याएं हैं, उन्हें इस आदत से बचने की सलाह दी जाती है।

    1. बढ़ सकती है एसिडिटी और पेट में जलन

    खाली पेट चाय पीने से पेट में एसिड का स्तर बढ़ सकता है। इससे सीने में जलन, खट्टी डकारें और एसिडिटी जैसी समस्याएं होने की संभावना रहती है। जिन लोगों को पहले से एसिड रिफ्लक्स की शिकायत है, उनके लिए यह आदत परेशानी बढ़ा सकती है।

    2. पाचन तंत्र पर पड़ सकता है असर

    चाय में मौजूद कैफीन और अन्य प्राकृतिक तत्व कुछ लोगों के पाचन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। इसके कारण पेट में भारीपन, गैस, अपच या असहजता महसूस हो सकती है।

    3. बेचैनी और घबराहट महसूस हो सकती है

    सुबह खाली पेट कैफीन लेने से कुछ लोगों में घबराहट, बेचैनी, हाथ कांपना या दिल की धड़कन तेज होने जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं। यह असर व्यक्ति की कैफीन सहन करने की क्षमता पर भी निर्भर करता है।

    4. इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें

    अगर सुबह चाय पीने के बाद बार-बार पेट दर्द, मितली, उल्टी, जलन या गैस की समस्या होने लगे, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज न करें। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है ताकि सही कारण का पता लगाया जा सके।

    5. दिन की शुरुआत पानी से करना बेहतर

    विशेषज्ञों के अनुसार, सुबह उठने के बाद शरीर को सबसे पहले पानी की जरूरत होती है। पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर हाइड्रेट होता है और पाचन तंत्र भी बेहतर तरीके से काम करता है। इसके बाद हल्का नाश्ता करके चाय पीना अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प माना जाता है।

    6. किन लोगों को खास सावधानी बरतनी चाहिए?

    • जिन लोगों को एसिडिटी या गैस की समस्या रहती है।
    • जिन्हें पेट का अल्सर या एसिड रिफ्लक्स है।
    • जिन्हें कैफीन से घबराहट या धड़कन बढ़ने की शिकायत होती है।
    • गर्भवती महिलाओं और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही चाय का सेवन करना चाहिए।

    निष्कर्ष

    सुबह खाली पेट चाय पीना हर व्यक्ति के लिए नुकसानदायक हो, ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन अगर इससे आपको पेट में जलन, गैस, बेचैनी या अन्य समस्याएं होती हैं, तो इस आदत में बदलाव करना बेहतर रहेगा। दिन की शुरुआत पहले पानी और फिर पौष्टिक नाश्ते से करें। यदि कोई परेशानी लगातार बनी रहती है, तो चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

    अस्वीकरण: यह लेख सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या या आहार में बदलाव से पहले योग्य डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।

  • मेन गेट के पास जूते-चप्पल रखने की गलती तो नहीं कर रहे, जानिए शू रैक की क्या है सही दिशा..?

    मेन गेट के पास जूते-चप्पल रखने की गलती तो नहीं कर रहे, जानिए शू रैक की क्या है सही दिशा..?

    घर के मुख्य द्वार पर बिखरे जूते-चप्पल निगेटिव ऊर्जा और कंगाली लाते हैं, इसलिए वास्तु के अनुसार शू रैक को सही दिशा में रखना बेहद जरूरी है.

    मेन गेट के पास जूते-चप्पल रखने की गलती तो नहीं कर रहे, जानिए शू रैक की क्या है सही दिशा..?

    घर का मेन गेट सिर्फ आने-जाने का रास्ता नहीं होता है. वास्तु की मानें तो इसी रास्ते से घर में सुख-समृद्धि और पॉजिटिव एनर्जी आती है. पर हममें से ज्यादातर लोग क्या करते हैं, जैसे ही घर लौटे, दरवाजे के पास ही जूते-चप्पल उतार दिए या वहीं शू रैक पर रख दिया. 

    सच कहें तो ये छोटी-सी आदत आपके घर का बजट और शांति दोनों बिगाड़ सकती है. दरवाजे पर बिखरे जूते-चप्पल घर में नेगेटिविटी लाते हैं, जिससे पैसे की तंगी और फालतू का दिमागी तनाव बढ़ने लगता है.

    मेन गेट पर जूते-चप्पल क्यों नहीं फेंकने चाहिए?

    हमारे बुजुर्ग हमेशा से कहते आए हैं कि घर की चौखट को साफ-सुथरा रखना चाहिए. वास्तु में भी मेन गेट को बहुत पवित्र माना गया है, क्योंकि यहीं से खुशियां घर के भीतर आती हैं.

    अब सोचिए, जहां जूते-चप्पल का ढेर लगा होगा, वहां भला अच्छी वाइब्स कैसे आएंगी. दरवाजे पर गंदगी रहेगी तो घर के लोगों में छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन और किचकिच बढ़ेगी. इसके अलावा, ऐसा माना जाता है कि जहां बेतरतीब जूते फैले रहते हैं, वहां बरकत कभी नहीं रुकती.

    शू रैक किस कोने में रखना सही रहेगा?

    अगर घर में शू रैक रखना ही है, तो उसकी जगह सही चुनना बहुत जरूरी है. वास्तु के हिसाब से शू रैक के लिए घर का पश्चिम या उत्तर-पश्चिम वाला कोना सबसे बढ़िया होता है. 

    आप चाहें तो इसे दक्षिण-पश्चिम दिशा में भी सेट कर सकते हैं. इन जगहों पर जूते रखने से घर के माहौल पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता. बस एक बात का खास ख्याल रखें, उत्तर-पूर्व में भूलकर भी जूते न रखें, ये जगह पूजा-पाठ और भगवान के ध्यान के लिए होती है.

    इन जगहों पर शू रैक रखा तो होगी बड़ी गड़बड़

    घर की कुछ जगहें ऐसी हैं जहां जूते-चप्पल का नामो-निशान भी नहीं होना चाहिए. जैसे पूर्व, उत्तर और उत्तर-पूर्व दिशा को हमेशा खाली और एकदम साफ रखना चाहिए. 

    इसके अलावा अपने सोने वाले कमरे में शू रैक रखने की गलती कभी न करें, इससे पति-पत्नी के बीच बेवजह की अनबन होने लगती है. किचन की दीवार से सटाकर या मंदिर के आसपास भी जूते-चप्पल रखना बहुत बड़ा वास्तु दोष माना जाता है.

    खुला शू रैक या बंद अलमारी, क्या है बेहतर?

    बाजार में आजकल कई तरह के शू रैक आते हैं, लेकिन आपको हमेशा ढक्कन या दरवाजे वाला बंद शू रैक ही खरीदना चाहिए. खुला शू रैक रखने से जूतों की धूल और निगेटिविटी पूरे घर में फैलती है. 

    बंद अलमारी में जूते रखने से गंदगी एक जगह ढकी रहती है. इसके साथ ही हफ्ते-दस दिन में शू रैक की सफाई जरूर करें. जूते-चप्पलों को हमेशा सीधा और सलीके से रखें, उन्हें कभी उल्टा न पड़ा रहने दें.

    अगर जगह कम हो तो क्या करें?

    आजकल फ्लैट्स या छोटे मकानों में जगह की काफी दिक्कत होती है. अगर आपके पास मेन गेट के आसपास शू रैक रखने के अलावा कोई चारा नहीं है, तो उसे दरवाजे के ठीक सामने रखने के बजाय थोड़ा साइड में खिसका दें. 

    दूसरी सबसे जरूरी बात, जो जूते-चप्पल टूट गए हैं या जिन्हें कोई पहनता नहीं है, उन्हें तुरंत घर से बाहर फेंकें. फटे-पुराने जूते जमा रखने से घर में कंगाली आती है. बाहर से आते ही घर में जूते पहनकर घूमना बंद करें और उन्हें सही जगह पर ही उतारें.

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  • क्या प्राचीन भारत में भी होती थी लव मैरिज? जानिए शास्त्रों में दर्ज ‘गंधर्व विवाह’ के दिलचस्प नियम और सच

    क्या प्राचीन भारत में भी होती थी लव मैरिज? जानिए शास्त्रों में दर्ज ‘गंधर्व विवाह’ के दिलचस्प नियम और सच

    आज के दौर की लव मैरिज प्राचीन काल का गंधर्व विवाह ही है, जिसका वर्णन ऋग्वेद और मनुस्मृति जैसे ग्रंथों में आपसी प्रेम और बिना किसी सामाजिक आडंबर के विवाह के रूप में मिलता है.

    क्या प्राचीन भारत में भी होती थी लव मैरिज? जानिए शास्त्रों में दर्ज ‘गंधर्व विवाह’ के दिलचस्प नियम और सच

    आज के समय में हम जिसे लव मैरिज कहते हैं, वह कोई नई बात नहीं है. हमारे प्राचीन हिंदू शास्त्रों में इसे गंधर्व विवाह का नाम दिया गया है. बहुत से लोगों को लगता है कि अपनी मर्जी से शादी करने का चलन पश्चिमी देशों से आया है. लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है. 

    हमारे पौराणिक ग्रंथों में इसका जिक्र बहुत पुराने समय से मिलता है. उस जमाने में भी जब कोई लड़का और लड़की एक दूसरे को दिल दे बैठते थे, तो वे बिना किसी आडंबर के शादी कर लेते थे. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि गंधर्व विवाह आखिर क्या है और शास्त्रों में इसे लेकर क्या लिखा गया है.

    गंधर्व विवाह की शुरुआत कहां से हुई

    इस अनोखी शादी की शुरुआत का पहला जिक्र ऋग्वेद में देखने को मिलता है. ऋग्वेद के दसवें मंडल में गंधर्वों का उल्लेख किया गया है. प्राचीन कथाओं के अनुसार, एक गंधर्व ने अप्सरा से उसकी मर्जी से शादी की थी. इस शादी में कोई बड़े कर्मकांड या पंडित की जरूरत नहीं पड़ी थी. 

    ये पूरी तरह से दोनों के बीच के सच्चे प्रेम और आकर्षण पर टिका था. नारद स्मृति में भी स्पष्ट लिखा है कि जब एक युवक और युवती अपनी पूरी इच्छा से एक दूसरे को जीवनसाथी मान लेते हैं, तो उसे ही गंधर्व विवाह कहा जाता है.

    मनुस्मृति में आठ तरह की शादियों का जिक्र

    हिंदू धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ मनुस्मृति में इंसानों के लिए आठ तरह के विवाहों के बारे में बताया गया है. इनमें ब्रह्म, देव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गंधर्व, राक्षस और पैशाच विवाह शामिल हैं. 

    मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के अनुसार, जब कोई लड़का और लड़की एक दूसरे को पसंद करके बिना माता पिता की अनुमति के शादी का फैसला लेते हैं, तो वह गंधर्व विवाह की श्रेणी में आता है. इस तरह के विवाह में दोनों का मानसिक और भावनात्मक रूप से एक होना सबसे जरूरी माना गया है.

    बिना समाज और परिवार के होता था ये बंधन

    गंधर्व विवाह की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसमें परिवार या समाज की दखलअंदाजी नहीं होती थी. इसमें न तो कोई लंबी चौड़ी रस्में होती थीं और न ही रिश्तेदारों का जमावड़ा लगता था. 

    दो प्रेमी बस एक दूसरे को वरमाला पहनाकर या मन ही मन पति पत्नी स्वीकार कर लेते थे. कई मामलों में इस तरह के रिश्तों में शारीरिक जुड़ाव भी शादी का मुख्य आधार बनता था. राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रसिद्ध कहानी गंधर्व विवाह का ही सबसे बड़ा और ऐतिहासिक उदाहरण मानी जाती है.

    आज के दौर में गंधर्व विवाह का बदला रूप

    पुराने जमाने में आठ तरह की शादियां होती थीं, लेकिन आज के दौर में मुख्य रूप से दो ही रूप बचे हैं. पहला है ब्रह्म विवाह, जिसे हम सब अरेंज मैरिज कहते हैं. इसमें परिवार के बड़े बुजुर्ग सब मिलकर शादी तय करते हैं. 

    दूसरा है गंधर्व विवाह, जिसे आज लव मैरिज कहा जाता है. आज के समय में युवा अपने पार्टनर का चुनाव खुद करते हैं. जब दो लोग अपनी पसंद से शादी का फैसला लेते हैं, तो वह सीधे तौर पर प्राचीन गंधर्व विवाह का ही आधुनिक रूप होता है.

    गंधर्व विवाह के सामने आने वाली बड़ी चुनौतियां

    शास्त्रों में गंधर्व विवाह को मान्यता तो दी गई, लेकिन इसे सबसे उत्तम नहीं माना गया. इसके पीछे कुछ व्यावहारिक कारण भी हैं. इस विवाह में अक्सर परिवार का सहयोग नहीं मिलता है. जब शादी के बाद जिंदगी में असली परेशानियां आती हैं, तो मार्गदर्शन देने वाला कोई बड़ा साथ नहीं होता.

     ऐसे में जब छोटी छोटी बातों पर तनाव बढ़ता है, तो बात जल्दी बिगड़ने लगती है. यही वजह है कि बिना पारिवारिक समर्थन के कई बार ऐसे रिश्तों में दरार आने का खतरा काफी बढ़ जाता है.

    डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक ग्रंथों, प्राचीन धार्मिक मान्यताओं और शास्त्र सम्मत जानकारियों पर आधारित है. इसे केवल एक ज्ञानवर्धक और सांस्कृतिक जानकारी के रूप में पढ़ें.

  • बिन मारे घर से रफूचक्कर हो जाएंगे छछूंदर! बस कोने में रख दें रसोई की यह 1 चीज..?

    बिन मारे घर से रफूचक्कर हो जाएंगे छछूंदर! बस कोने में रख दें रसोई की यह 1 चीज..?

    बिन मारे घर से रफूचक्कर हो जाएंगे छछूंदर! बस कोने में रख दें रसोई की यह 1 चीज..?

    बरसात के दिनों में बिलों में पानी भर जाने पर अक्सर कई जीव-जंतु बाहर निकलकर लोगों के घरों में घुसने लगते हैं. ऐसा ही एक जीव छछूंदर है, जो बरसात के सीजन में बहुत परेशान करता है. उसकी गंदी स्मेल और अजीब लोग हर किसी को परेशान करता है. जब वह अजीब आवाज निकालता हुआ घरों में घुसता है तो बच्चे उससे डर जाते हैं. वह ऐसा जीव है, जो आसानी से पिंजरे में भी नहीं घुसता. ऐसे में लोग इस बात से परेशान हो जाते हैं कि उसे बिना मारे घर से कैसे दूर भगाया जाए. आइए, आज हम आपको ऐसा ही एक घरेलू नुस्खा बताने जा रहे हैं. जिसे आजमाकर आप छछूंदर की समस्या से हमेशा के लिए निजात पा सकते हैं.

    घर से छछूंदरों को भगाने का उपाय

    छछूंदर भगाने के लिए आप घर में ही देसी उपाय (Chuchundar Bhagane Ke Upay) कर सकते हैं. इसके लिए आप पुदीने की पत्तियों या उसकी डंडियों का इस्तेमाल करें. असल में पुदीने की खास गंध छछूंदरों को बिल्कुल रास नहीं आती है. वे इसकी गंध महसूस करते ही दूर भाग खड़े होते हैं. ऐसे में आप अपने घर के अंदर, बाहर, खिड़की, रसोई और प्रमुख जगहों पर पुदीने को रख दें. ऐसा करने से छछूंदर आपके घर में घुसने की कभी सोचेंगे भी नहीं.

    पुदीने की पत्तियों का करें इस्तेमाल

    इस ट्रिक को इस्तेमाल करने के लिए आप पुदीने की ताजा पत्तियां लें. इसके बाद उन्हें घर के हर कोने पर एक-एक पत्ता रख दें. आप चाहें तो पुदीने की पत्तियों को सुखाकर उसका पाउडर भी घर की प्रमुख जगहों पर रख सकते हैं. इन दो तरीकों के अलावा तीसरा तरीका स्प्रे बनाने का है. आप पुदीने की पत्तियों और डंडियों को उबालकर उसके गर्म पानी को स्प्रे बोतल में भर लें.

    स्प्रे से दूर भागते हैं छछूंदर

    इसके बाद आप घर के तमाम एंट्री पॉइंट्स पर समय-समय पर इस स्प्रे को छिड़कते रहें. खासकर उन जगहों पर जरूर छिड़कें, जहां से चूहों और छछूंदरों के आने का अंदेशा हो. इस ट्रिक की वजह से उनके आवागमन के सारे रास्ते ब्लॉक हो जाएंगे और वे आपके घर की ओर झांकेंगे भी नहीं. इस उपाय से आपको छछूंदरों के साथ ही चूहों से भी निजात मिल जाएगी.

    घर में पनपने न दें गंदगी

    इसके साथ ही आप छछूंदरों से निजात पाने के लिए कुछ ओर भी उपाय कर सकते हैं. सबसे पहले तो आप दरवाजों और खिड़कियों के आसपास जाली लगवा लें. दरवाजे के नीचे इतनी जगह न छोड़ें कि वहां से चूहे या छछूंदर अंदर घुस सकें. घर में कूड़ा इकट्ठा न होने दें. कूड़े की गंध चूहों और छछूंदरों को बहुत आकर्षित करती है. अगर गंदगी नहीं होगी तो उनका आना भी काफी हद तक रुक जाएगा.

  • राजा नल और पांडवों से जुड़ा है शिवपुरी का सिद्धेश्वर मंदिर..?

    राजा नल और पांडवों से जुड़ा है शिवपुरी का सिद्धेश्वर मंदिर..?

    राजा नल और पांडवों से जुड़ा है शिवपुरी का सिद्धेश्वर मंदिर..?

    मध्य प्रदेश के शिवपुरी शहर में छत्री रोड पर जाधव सागर झील के पास बना श्री सिद्धेश्वर महादेव मंदिर बेहद खास है. यह शहर के सबसे पुराने और बड़े धार्मिक स्थलों में गिना जाता है. लोग यहां दूर दूर से दर्शन करने आते हैं.

    अपनी पुरानी वास्तुकला और गहरी आस्था के कारण यह मंदिर हर किसी का मन मोह लेता है. इस मंदिर से कई पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियां जुड़ी हुई हैं. आइए जानते हैं 1000 साल पुराने इस पावन शिवधाम का पूरा इतिहास.

    ओंकारेश्वर से लाया गया था मुख्य शिवलिंग

    मंदिर के महंत सूरज भट्ट बताते हैं कि यहां स्थापित मुख्य शिवलिंग बेहद पवित्र है. इसे और इसके आसपास मौजूद 12 ज्योतिर्लिंगों को ओंकारेश्वर से लाकर यहां स्थापित किया गया था. मंदिर परिसर सिर्फ शिव जी तक सीमित नहीं है.

    यहां भगवान गणेश, कार्तिकेय, राम जानकी और राधा कृष्ण की बहुत सुंदर प्रतिमाएं मौजूद हैं. इसके अलावा भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्राचीन मूर्तियां भी दर्शन के लिए रखी गई हैं.

    राजा नल से लेकर सिंधिया परिवार तक का नाता

    स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का नाता राजा नल के दौर से है. यही वजह है कि मंदिर परिसर में आज भी राजा नल की छत्रियां देखी जा सकती हैं. बाद में 19वीं सदी में ग्वालियर के महाराजा दौलतराव सिंधिया की पत्नी महारानी बैजाबाई सिंधिया ने इसका जीर्णोद्धार कराया.

    उन्होंने शिवपुरी के कई मंदिरों को संवारने का काम किया था. कुछ साल पहले पूर्व कलेक्टर ओमप्रकाश श्रीवास्तव और एसडीएम रूपेश उपाध्याय की मदद से इसे फिर से नया रूप दिया गया.

    गुरु गोरखनाथ की पवित्र तपोभूमि

    सिद्धेश्वर मंदिर के ठीक पीछे गुरु गोरखनाथ का एक प्राचीन मंदिर भी बना हुआ है. ऐसा माना जाता है कि नाथ संप्रदाय की शुरुआत करने वाले गुरु गोरखनाथ ने यहां बैठकर कठिन तपस्या की थी.

    इस मंदिर की सबसे खास बात यहां मौजूद गुरु गोरखनाथ की दुर्लभ मूर्ति है. पत्थर की यह अनोखी मूर्ति 12वीं सदी की बताई जाती है. श्रद्धालुओं के लिए यह जगह बहुत ही शांत और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरी हुई लगती है.

    अर्जुन के बाण से बह निकली थी बाणगंगा

    मंदिर से बिल्कुल सटा हुआ बाणगंगा इलाका अपने 52 कुंडों के लिए पूरे क्षेत्र में जाना जाता है. इसके पीछे महाभारत काल की एक बहुत पुरानी कहानी जुड़ी है. कहा जाता है कि जब पांडव अज्ञातवास काट रहे थे, तब वे शिवपुरी और बैराड़ के जंगलों में ठहरे थे.

    प्यास लगने पर जब कहीं पानी नहीं मिला, तो अर्जुन ने जमीन पर बाण चला दिया. बाण लगते ही वहां से पानी की धारा बह निकली, जिससे इस जगह का नाम बाणगंगा पड़ा.

    आस्था और शांति का बड़ा केंद्र

    आज सिद्धेश्वर महादेव मंदिर शिवपुरी की पहचान बन चुका है. यहां आने वाले हर भक्त को एक अजीब सी दिमागी शांति महसूस होती है. त्यौहारों के दौरान यहां भारी भीड़ उमड़ती है और मेले जैसा माहौल रहता है.

    अगर आप इतिहास और अध्यात्म में रुचि रखते हैं, तो यह जगह आपके देखने लायक है. 1000 साल पुरानी यह धरोहर आज भी अपने गौरवशाली अतीत की कहानी खुद बयां करती है.

  • हैकर्स की नई चाल! होटल वाई-फाई से चुरा रहे आपका पर्सनल वीडियो और ऑडियो, जानिए ‘CaptiveCrunch’ का काला सच..

    हैकर्स की नई चाल! होटल वाई-फाई से चुरा रहे आपका पर्सनल वीडियो और ऑडियो, जानिए ‘CaptiveCrunch’ का काला सच..

    हैकर्स की नई चाल! होटल वाई-फाई से चुरा रहे आपका पर्सनल वीडियो और ऑडियो, जानिए ‘CaptiveCrunch’ का काला सच..

    Image Credit: AI Generated Image

    अगर आप अक्सर ट्रैवल करते हैं और होटल या एयरपोर्ट पर फ्री वाई-फाई का इस्तेमाल करते हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है. माइक्रोसॉफ्ट की थ्रेट इंटेलिजेंस टीम ने एक खतरनाक साइबर अटैक अभियान ‘CaptiveCrunch’ को लेकर दुनिया भर के यात्रियों को अलर्ट जारी किया है. रूसी हैकर्स का एक ग्रुप होटल और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर के वाई-फाई नेटवर्क को निशाना बना रहा है. यह हैकिंग हमला इतना खतरनाक है कि हैकर्स आपके लैपटॉप या फोन का पासवर्ड चुराने के साथ-साथ ऑडियो और वीडियो भी रिकॉर्ड कर सकते हैं.

    क्या है ‘CaptiveCrunch’ और यह कैसे काम करता है?

    माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार, इस हैकिंग अभियान को Storm-2945 नाम का ग्रुप चला रहा है, जो रूस के कुख्यात हैकर ग्रुप ‘माइडनाइट ब्लिजार्ड’ (APT29 या Cozy Bear) से जुड़ा हुआ है. यह हमला मुख्य रूप से कॉर्पोरेट ट्रैवलर्स को निशाना बनाकर किया जा रहा है.

    • नेटवर्क हैक करना:
      हैकर्स सबसे पहले होटल के राउटर या उस सिस्टम को हैक करते हैं जिससे वाई-फाई का लॉगिन पेज (Captive Portal) खुलता है.
    • नकली लॉगिन पेज:
      जब कोई यूजर वाई-फाई से कनेक्ट करता है, तो उसके सामने गूगल या माइक्रोसॉफ्ट 365 जैसा दिखने वाला फर्जी लॉगिन पेज आ जाता है.
    • पासवर्ड चोरी:
      यूजर जैसे ही अपना पासवर्ड डालता है, उसकी ईमेल, वनड्राइव फाइल्स और कंपनी के डेटा का एक्सेस सीधे हैकर्स के पास चला जाता है.

    फर्जी अपडेट के नाम पर मालवेयर का जाल

    • इस हमले की सबसे खतरनाक बात यह है कि हैकर्स यूजर्स को धोखा देने के लिए कई तरह के फर्जी पॉप-अप और यूटिलिटीज का सहारा लेते हैं.
    • यूजर के स्क्रीन पर ‘ब्राउजर अपडेट’, ‘विंडोज सिक्योरिटी चेक’ या ‘डायरेक्टएक्स/विजुअल सी++ इंस्टॉल’ करने के मैसेज आते हैं.
    • ये मैसेज बिल्कुल असली विंडोज या गूगल सर्विस की तरह दिखाई देते हैं.
    • जैसे ही यूजर इन फर्जी अपडेट्स पर क्लिक करता है, उसके डिवाइस में खतरनाक मालवेयर (Malware) डाउनलोड हो जाता है.

    हैकर्स आपके डिवाइस में क्या-क्या कर सकते हैं?

    माइक्रोसॉफ्ट ने चेतावनी दी है कि इस मालवेयर के जरिए हैकर्स आपके कंप्यूटर पर लगभग पूरा कंट्रोल हासिल कर लेते हैं.

    • ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग:
      हैकर्स आपके वेबकैम और माइक को चालू करके आपकी बातें और वीडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं.
    • पासवर्ड और कुकीज चोरी:
      ब्राउजर में सेव किए गए सभी पासवर्ड और बैंकिंग कुकीज चुरा सकते हैं.
    • स्क्रीनशॉट और की-स्ट्रोक्स:
      आप कीबोर्ड पर क्या टाइप कर रहे हैं (Keylogging), हैकर्स उसे ट्रैक कर सकते हैं और आपकी स्क्रीन के स्क्रीनशॉट ले सकते हैं.

    होटल वाई-फाई अटैक से कैसे बचें?

    माइक्रोसॉफ्ट ने यात्रियों और कंपनियों के लिए कुछ बेहद जरूरी सुरक्षा उपाय बताए हैं:

    • पब्लिक वाई-फाई से बचें:
      जब भी संभव हो, होटल या एयरपोर्ट के वाई-फाई के बजाय अपने फोन का पर्सनल मोबाइल हॉटस्पॉट इस्तेमाल करें.
    • कोई अपडेट न डाउनलोड करें:
      वाई-फाई कनेक्ट करते ही अगर कोई ब्राउजर या सॉफ्टवेयर अपडेट करने का मैसेज आए, तो उस पर भूलकर भी क्लिक न करें.
    • ऑफिशियल वेबसाइट का इस्तेमाल करें:
      किसी भी अपडेट के लिए हमेशा सॉफ्टवेयर की आधिकारिक वेबसाइट या सिस्टम सेटिंग्स का ही उपयोग करें.
    • एन्क्रिप्टेड प्राइवेट कनेक्शन (VPN):
      अगर पब्लिक वाई-फाई इस्तेमाल करना बहुत जरूरी हो, तो हमेशा एक सुरक्षित और भरोसेमंद VPN का उपयोग करें.