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  • बुजुर्गों की मदद के लिए साल में 200 से ज्यादा यात्राएं! इस शख्स की कहानी जीत लेगी आपका दिल

    बुजुर्गों की मदद के लिए साल में 200 से ज्यादा यात्राएं! इस शख्स की कहानी जीत लेगी आपका दिल

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    Viral Post : चीन के हुबेई प्रांत में रहने वाले 39 वर्षीय टियान रुई इन दिनों अपनी अनोखी पहल की वजह से सोशल मीडिया पर लोगों का दिल जीत रहे हैं. कभी कूरियर डिलीवरी का काम करने वाले टियान अब उन बुजुर्गों के लिए परिवार की तरह बन चुके हैं, जिनके बच्चे नौकरी या बेहतर भविष्य की तलाश में उनसे हजारों किलोमीटर दूर रहते हैं.

    टियान पहाड़ी इलाकों में रहने वाले बुजुर्गों से मिलने के लिए साल में 200 से ज्यादा बार सफर करते हैं. वह उनके लिए दवाइयां, राशन और जरूरत का सामान लेकर जाते हैं. लेकिन टियान का काम केवल सामान पहुंचाने तक सीमित नहीं है. कई बुजुर्गों के लिए उनकी सबसे बड़ी जरूरत किसी अपने से बातचीत करना और कुछ पल साथ बिताना है.

    बुजुर्गों को सामान से ज्यादा चाहिए साथ

    टियान बताते हैं कि पहाड़ों में रहने वाले बुजुर्गों से मिलने पर उन्हें अक्सर एक ही बात महसूस होती है. उन्हें सिर्फ दवा या खाने-पीने का सामान नहीं चाहिए, बल्कि किसी ऐसे इंसान की जरूरत है जो बैठकर उनकी बातें सुने. एक करीब 80 वर्षीय महिला तो हर मुलाकात के बाद टियान से पूछती हैं कि वह अगली बार कब आएंगे. उनके लिए टियान की यात्रा सिर्फ एक डिलीवरी नहीं, बल्कि अपनों के आने जैसा इंतजार बन चुकी है.

    इसी तरह बोलीविया में करीब 17 हजार किलोमीटर दूर रहने वाला एक बेटा भी अपने माता-पिता तक दवाइयां और दूसरी जरूरी चीजें पहुंचाने के लिए टियान की मदद लेता है.

    टियान जब भी पहाड़ों में जाते हैं, वहां रहने वाले बुजुर्गों से मुलाकात के छोटे-छोटे वीडियो रिकॉर्ड करते हैं. बाद में उन्हें एडिट करके विदेश या दूसरे शहरों में रहने वाले परिवार के सदस्यों तक पहुंचाते हैं.

    उनके बनाए वीडियो कभी-कभी परिवार के लिए बेहद भावुक याद बन जाते हैं. टियान ने एक 70 वर्षीय बुजुर्ग का वीडियो रिकॉर्ड किया था, जिनकी करीब चार महीने बाद मौत हो गई. बाद में वही वीडियो उनके परिवार के लिए पिता की आखिरी यादों में से एक बन गया.

    बिना मुनाफे के निभा रहे हैं जिम्मेदारी

    चीन में अकेले रहने वाले बुजुर्गों की संख्या बड़ी है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2020 तक करीब 11.8 करोड़ बुजुर्ग अकेले रह रहे थे, जिन्हें वहां ‘एम्प्टी नेस्ट’ बुजुर्ग कहा जाता है. टियान इस काम से कोई मुनाफा नहीं कमाते. वह मुख्य रूप से पेट्रोल का खर्च लेते हैं और बाकी काम अपनी इच्छा से करते हैं. उनके लिए यह सिर्फ सामान पहुंचाने का काम नहीं, बल्कि उन परिवारों के बीच दूरी कम करने की कोशिश है, जहां बच्चे दूर हैं और माता-पिता पहाड़ों में अकेले हैं.

  • न शादी का सामान, न कोई गहना… दुल्हन की डोली में रखी जाती थी ये खास रोटी, वजह बेहद दिलचस्प..

    न शादी का सामान, न कोई गहना… दुल्हन की डोली में रखी जाती थी ये खास रोटी, वजह बेहद दिलचस्प..

    मुल्तान की वो अनोखी रोटी, जिसे हर दुल्हन की डोली में रखा जाता था

    भारत और पाकिस्तान भले ही आज अलग-अलग देशों में बंटे हुए हैं, लेकिन दोनों जगहों की खान-पान और लाइफस्टाइल में आज भी कई समानताएं देखने को मिलती हैं. रोटी भी ऐसी ही चीज है, जो दोनों देशों के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा रही है. भारत में जहां नान, पराठा, रुमाली रोटी से लेकर कई तरह की पारंपरिक रोटियां बनाई जाती हैं, वहीं पाकिस्तान में भी अलग-अलग इलाकों की अपनी खास रोटियां हैं. इन्हीं में से एक है मुल्तान की मशहूर ‘डोली रोटी’, जिसका रिश्ता सिर्फ स्वाद से नहीं, बल्कि करीब 100 साल पुरानी एक दिलचस्प परंपरा से जुड़ा हुआ है.

    सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में कंटेंट क्रिएटर अक्सा जट ने मुल्तान की इसी खास रोटी के बारे में जानकारी दी है. वीडियो में वह बताती हैं कि करीब 100 साल पहले मुल्तान में शादी के समय दुल्हन की डोली के साथ यह रोटी रखी जाती थी. हालांकि, इसे सिर्फ दुल्हन के लिए नहीं रखा जाता था. यह बारात के लोगों के लिए रास्ते का खाना हुआ करता था. आज के दौर में शादी में कुछ घंटों का सफर तय करके बारात आसानी से दुल्हन के घर पहुंच जाती है, लेकिन पुराने समय में ऐसा नहीं था. उस वक्त न तो आज जैसी सड़कें थीं और न ही हर किसी के पास कार या दूसरे साधन उपलब्ध थे. कई बार बारात को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने में कई दिन लग जाते थे.

    कई दिनों के सफर के लिए था खाने का इंतजाम
    अक्सा जट के मुताबिक, पुराने समय में लोग घोड़ों और तांगों से सफर करते थे. लंबी दूरी की यात्रा में सबसे बड़ी समस्या खाने-पीने की होती थी. रास्ते में हर जगह खाना मिलना आसान नहीं था और बारात में बड़ी संख्या में लोग भी शामिल होते थे. ऐसे में ऐसी चीज की जरूरत थी, जिसे पहले से तैयार करके लंबे सफर के दौरान आसानी से खाया जा सके. इसी जरूरत ने डोली रोटी को खास बना दिया. मीठी रोटी को डोली में रख दिया जाता था, ताकि रास्ते में जब किसी को भूख लगे तो वह इसे खा सके. इस तरह यह रोटी सिर्फ एक व्यंजन नहीं रही, बल्कि उस समय की यात्रा और शादी की जरूरत का हिस्सा बन गई.

    कभी सिर्फ मीठी होती थी डोली रोटी
    बताया जाता है कि पुराने समय में डोली रोटी मुख्य रूप से मीठी बनाई जाती थी. इसे इस तरह तैयार किया जाता था कि वह सफर के दौरान खाने के काम आ सके. समय के साथ इसके स्वाद और बनाने के तरीके में भी बदलाव आया. आज डोली रोटी के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं. इसमें खोया और कीमा जैसी चीजों का इस्तेमाल भी किया जाने लगा है. यानी एक समय बारात के लंबे सफर का सहारा रही यह रोटी अब स्वाद और स्थानीय पहचान का हिस्सा बन चुकी है. दशकों से रोटी बना रहा है मुल्तान का मशहूर रोटी वाला

     

     


    अक्सा जट ने अपने वीडियो में मुल्तान के मशहूर फहीम रोटी वाले की दुकान भी दिखाई. बताया जाता है कि यहां लंबे समय से इस तरह की पारंपरिक रोटी बनाई जा रही है. दुकान पर मिलने वाली डोली रोटी आज भी लोगों को मुल्तान की पुरानी परंपराओं और खान-पान की याद दिलाती है. इस रोटी की खासियत यह है कि इसे देखने और खाने के साथ-साथ इसके पीछे की कहानी भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ाती है. एक साधारण सी रोटी कैसे कभी बारात के कई दिनों के सफर का जरूरी खाना हुआ करती थी, यह बात आज के समय में काफी अनोखी लगती है.

    बंटवारे के बाद भी नहीं भूली गई यह परंपरा


    इस वीडियो को अक्सा जट ने अपने इंस्टाग्राम @aqsajutt1212 पर शेयर किया है. वीडियो पर एक भारतीय यूजर का कमेंट भी काफी खास रहा. उन्होंने बताया कि उनके परिवार का रिश्ता बंटवारे से पहले मुल्तान से था. उनके मुताबिक, मुल्तान से भारत आने के कई साल बाद भी उनकी दादी डोली रोटी बनाया करती थीं. यह बात दिखाती है कि खाने की परंपराएं सिर्फ एक जगह या सीमा तक सीमित नहीं रहतीं. लोग जब एक जगह से दूसरी जगह चले जाते हैं, तब भी अपने साथ स्वाद, यादें और पुरानी रिवायतें लेकर जाते हैं. डोली रोटी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. आज मुल्तान की यह रोटी सोशल मीडिया के जरिए फिर चर्चा में है, लेकिन इसके पीछे छिपी कहानी इसे और खास बनाती है. कभी लंबी यात्रा के दौरान बारातियों का पेट भरने वाली यह मीठी रोटी आज एक पुरानी परंपरा, बदलते खान-पान और बंटवारे से पहले की साझा संस्कृति की याद दिलाती है.

  • रोना आपकी सेहत के लिए क्यों फायदेमंद हो सकता है? जानिए आंसुओं से जुड़े फायदे..

    रोना आपकी सेहत के लिए क्यों फायदेमंद हो सकता है? जानिए आंसुओं से जुड़े फायदे..

    रोना इंसानी भावनाओं का स्वाभाविक हिस्सा है। दुख, खुशी, तनाव या भावनात्मक दबाव के दौरान आंखों से आंसू निकलना सामान्य प्रक्रिया है। कई बार रोने के बाद व्यक्ति खुद को हल्का और बेहतर महसूस करता है। हालांकि, रोने को किसी बीमारी का इलाज नहीं माना जा सकता, लेकिन भावनात्मक रूप से यह तनाव कम करने में मदद कर सकता है।

    आइए जानते हैं रोने से जुड़े कुछ संभावित फायदे।

    आंखों को मिलती है नमी

    आंसू आंखों की सतह को नम रखने में मदद करते हैं। इससे आंखों में सूखापन और जलन जैसी परेशानी से राहत मिल सकती है। आंसुओं में मौजूद प्राकृतिक तत्व आंखों की सतह को सुरक्षित रखने में भी भूमिका निभाते हैं।

    भावनात्मक बोझ कम महसूस हो सकता है

    जब व्यक्ति लंबे समय तक अपनी भावनाओं को दबाकर रखता है, तो मानसिक दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में रोना भावनाओं को व्यक्त करने का एक प्राकृतिक तरीका हो सकता है। कई लोगों को रोने के बाद मन हल्का महसूस होता है।

    तनाव कम करने में मदद

    भावनात्मक तनाव के दौरान रोने के बाद कुछ लोगों को शांति और आराम महसूस होता है। रोने के साथ गहरी सांस लेना और भावनाओं को बाहर निकालना व्यक्ति को मानसिक रूप से रिलैक्स महसूस करा सकता है।

    मूड बेहतर हो सकता है

    रोने के बाद व्यक्ति को भावनात्मक राहत मिल सकती है, खासकर तब जब वह किसी परेशानी या दुख से गुजर रहा हो। हालांकि, हर व्यक्ति में इसका अनुभव अलग-अलग हो सकता है।

    भावनाओं को व्यक्त करने का स्वस्थ तरीका

    रोना कमजोरी की निशानी नहीं है। यह शरीर और दिमाग की भावनाओं को व्यक्त करने की प्राकृतिक प्रक्रिया है। अपनी भावनाओं को समझना और जरूरत पड़ने पर किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए ज्यादा मददगार हो सकता है।

    जरूरी बात: रोने से आंखों की रोशनी बढ़ने या शरीर के विषैले पदार्थ बाहर निकलने जैसे दावों के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। अगर लगातार उदासी, तनाव, घबराहट या रोने की समस्या बनी रहती है और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

  • ‘पाताल लोक’ में बने हैं ये मेट्रो स्टेशन, जहां पहुंचने में लग जाते हैं 5 मिनट..

    ‘पाताल लोक’ में बने हैं ये मेट्रो स्टेशन, जहां पहुंचने में लग जाते हैं 5 मिनट..

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    दुनिया भर के बड़े शहरों में चलने वाली मेट्रो ट्रेनें अमूमन जमीन से कुछ ही फीट या कुछ मंजिलों की गहराई पर बनी होती हैं. लेकिन दुनिया में कुछ ऐसे मेट्रो स्टेशन भी मौजूद हैं, जिन्हें बनाने के लिए इंजीनियर्स को जमीन के नीचे लगभग पाताल लोक तक जाना पड़ा. किसी शहर की कठिन भौगोलिक बनावट, गहरी नदियों की मौजूदगी, दलदल और युद्ध के समय परमाणु बंकर की जरूरतों के कारण इन स्टेशनों को जमीन से सैंकड़ों फीट नीचे बनाया गया है. इस सूची में सबसे पहला नाम आता है यूक्रेन की राजधानी कीव में स्थित ‘आर्सेनलना’ मेट्रो स्टेशन का, जो जमीन से 105.5 मीटर यानी लगभग 346 फीट की गहराई पर स्थित है. यह दुनिया का सबसे गहरा मेट्रो स्टेशन माना जाता है.

    आर्सेनलना स्टेशन इतना गहरा है कि अगर अमेरिका की विशालकाय ‘स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी’ को इसके सीधे गड्ढे में डाल दिया जाए, तो भी ऊपर 12 मीटर यानी लगभग 40 फीट से ज्यादा की जगह खाली रह जाएगी. इस स्टेशन की गहराई का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि यहां ट्रेन पकड़ने के लिए यात्रियों को दो बड़ी-बड़ी एस्केलेटर की मदद से पाताल में उतरना पड़ता है. इन एस्केलेटर पर सफर करने में यात्रियों को लगभग 5 मिनट का लंबा समय लग जाता है. इस स्टेशन के इतने गहरे होने की मुख्य वजह नीपर नदी का किनारा और कीव शहर की पहाड़ी बनावट है. नदी के ऊंचे किनारों के कारण ट्रेन के ट्रैक को सीधा रखने के लिए स्टेशन को पहाड़ के ऊपर से 105 मीटर नीचे खोदकर बनाना पड़ा था.

    दुनिया के सबसे गहरे मेट्रो स्टेशनों की सूची में दूसरा बड़ा नाम रूस के ‘सेंट पीटर्सबर्ग मेट्रो’ का आता है. सेंट पीटर्सबर्ग का ‘एडमिरलटेयस्काया’ स्टेशन जमीन से 86 मीटर की गहराई पर स्थित है. औसतन सभी स्टेशनों की गहराई के मामले में यह दुनिया का सबसे गहरा मेट्रो नेटवर्क माना जाता है. इस स्टेशन पर उतरने के लिए यात्रियों को दुनिया की सबसे लंबी एस्केलेटर का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिसकी लंबाई 130 मीटर से भी ज्यादा है. इतनी गहराई में उतरते समय यात्रियों को ऐसा महसूस होता है, मानो वे किसी दूसरी ही दुनिया में प्रवेश कर रहे हों. रूस के इस स्टेशन को भी कठिन भूवैज्ञानिक परिस्थितियों के कारण इतनी गहराई में तैयार किया गया था.

    वहीं, उत्तर कोरिया की रहस्यमयी राजधानी प्योंगयांग में बना ‘प्योंगयांग मेट्रो’ नेटवर्क भी दुनिया के सबसे गहरे मेट्रो सिस्टम का सबसे बड़ा दावेदार है. यहां की मेट्रो लाइनें जमीन से 110 मीटर से भी अधिक की गहराई पर बिछाई गई हैं. उत्तर कोरिया के केवल दो स्टेशनों पुहुंग और योंगवांग में ही विदेशी पर्यटकों को जाने की अनुमति दी जाती है. प्योंगयांग मेट्रो में नीचे उतरने के लिए एस्केलेटर पर सफर करते समय पुराने लाउडस्पीकरों से देशभक्ति और क्रांति के गाने गूंजते रहते हैं. इतनी ज्यादा गहराई पर होने के कारण प्योंगयांग का यह मेट्रो स्टेशन किसी भी परमाणु हमले या बमबारी के समय एक अभेद्य ‘बॉम्ब शेल्टर’ यानी परमाणु बंकर का काम करता है.

    अत्यधिक गहराई में होने के कारण प्योंगयांग मेट्रो स्टेशन का तापमान साल के बारह महीने एक समान यानी 18 डिग्री सेल्सियस बना रहता है, चाहे बाहर कितनी भी कड़ाके की ठंड या गर्मी क्यों न हो. इन प्रसिद्ध स्टेशनों के अलावा अमेरिका के ऑरेगॉन में स्थित ‘वाशिंगटन पार्क’ स्टेशन 79 मीटर गहरा है, जो उत्तरी अमेरिका का सबसे गहरा स्टेशन है. वहीं, लंदन अंडरग्राउंड का ‘हैम्पस्टेड’ स्टेशन 58.5 मीटर और चेक गणराज्य के प्राग मेट्रो का ‘नामस्ती मीरू’ स्टेशन 53 मीटर की गहराई पर बने हुए हैं. ये सभी मेट्रो स्टेशन आज न सिर्फ परिवहन का जरिया हैं, बल्कि इंजीनियरिंग का एक नायाब और हैरतअंगेज नमूना भी बन चुके हैं.

  • दफन10 हजार साल से शांत था ज्वालामुखी, अचानक मचा ऐसा तांडव कि पूरा इलाका राख में दब गया

    दफन10 हजार साल से शांत था ज्वालामुखी, अचानक मचा ऐसा तांडव कि पूरा इलाका राख में दब गया

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    प्रकृति जब अपने रौद्र रूप में आती है, तो इंसानी सभ्यता और बड़े से बड़े शहर पल भर में तिनके की तरह बिखर जाते हैं. ऐसा ही एक खौफनाक नजारा 2 मई 2008 की सुबह दक्षिण अमेरिकी देश चिली में देखने को मिला. चिली के चैतेन (Chaiten) शहर से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक ज्वालामुखी लगभग 10,000 सालों की गहरी नींद के बाद अचानक भड़क उठा. इस भयंकर विस्फोट से आसमान में 17 किलोमीटर ऊपर तक राख का विशाल गुबार उठने लगा, जिसने देखते ही देखते पूरे शहर को अपनी गिरफ्त में ले लिया. उस समय शहर में करीब 4,000 लोग रहते थे, जिन्हें आनन-फानन में सुरक्षित बाहर निकाला गया. ज्वालामुखी का यह तांडव अगले कई दिनों तक जारी रहा और राख का गुबार 30 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच गया. राख की यह मोटी परत चिली, अर्जेंटीना से होती हुई अटलांटिक महासागर तक फैल गई.

    शुरुआत में शहर को सीधा नुकसान नहीं पहुंचा था, लेकिन इसके बाद हुई मूसलाधार बारिश ने तबाही की पूरी पटकथा लिख दी. बारिश का पानी ज्वालामुखी के मुहाने पर जमा राख और कीचड़ को बहाकर चैतेन नदी में ले आया. कीचड़ के जमाव (लाहार) के कारण नदी का जलस्तर भर गया और 12 मई को नदी के तटबंध टूट गए. तटबंध टूटते ही उफनती नदी ने अपना पुराना रास्ता छोड़कर सीधे शहर के बीचों-बीच नया रास्ता बना लिया. कीचड़, राख और पानी का यह सैलाब अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को निगलता चला गया. देखते ही देखते पूरा शहर कीचड़ के मलबे में समा गया, इमारतें ढह गईं, सड़कें धंस गईं और गाड़ियां ताश के पत्तों की तरह बह गईं. राहत की बात यह रही कि पूरे शहर को पहले ही खाली करा लिया गया था, जिसकी वजह से किसी भी व्यक्ति की जान नहीं गई.

    आपदा के सालों बाद भी चैतेन शहर का एक हिस्सा कीचड़ की मोटी परत के नीचे दबा हुआ है. हालांकि, इस तबाही के बाद एक बेहद हैरान करने वाला नजारा देखने को मिला. आपदा में बचे हुए हिस्से में रहने वाले लोगों ने इस बर्बाद और छोड़ दिए गए हिस्से को ही अपनी कमाई का जरिया बना लिया. आज दुनिया भर से पर्यटक इस ‘दफन हुए शहर’ का नजारा देखने आते हैं, जिससे यहां का पर्यटन उद्योग फल-फूल रहा है. सरकार ने शुरुआत में इस शहर को किसी दूसरी जगह बसाने का प्लान बनाया था, लेकिन स्थानीय लोगों ने अपनी जगह छोड़ने से इनकार कर दिया. आज नया चैतेन शहर उत्तर दिशा की ओर बढ़ रहा है, लेकिन खतरा अभी भी टला नहीं है. नया बसाया जा रहा हिस्सा असल में ज्वालामुखी के और ज्यादा करीब है. फरवरी 2009 और साल 2011 में इस ज्वालामुखी में दोबारा छोटे-बड़े विस्फोट हुए थे, जो आज भी हल्के झटकों के साथ लोगों को आने वाले खतरे की चेतावनी दे रहे हैं.

  • Google पर महिलाओं की ये सर्च देखकर मचा हड़कंप! 16 करोड़ बार पूछा- मर्द को बिना सबूत कैसे मारें?

    Google पर महिलाओं की ये सर्च देखकर मचा हड़कंप! 16 करोड़ बार पूछा- मर्द को बिना सबूत कैसे मारें?

    आज के डिजिटल युग में छोटी-बड़ी हर जानकारी के लिए लोग सबसे पहले गूगल की शरण लेते हैं. चाहे मौसम हो, रेसिपी हो या कोई खबर, सर्च बार में टाइप करते ही जवाब मिल जाता है. लेकिन हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर एक चौंकाने वाला दावा तेजी से वायरल हो रहा है. इस दावे के मुताबिक साल 2025 में महिलाओं ने गूगल पर सबसे ज्यादा “मर्द को बिना सबूत कैसे मारें” जैसे शब्द सर्च किए. कहा जा रहा है कि इस वाक्य को महिलाओं ने 16 करोड़ पचास लाख से अधिक बार सर्च किया.

    पोस्ट में अक्सर एक फाइल फोटो के साथ लिखा जाता है कि महिलाएं मर्दों को मारने के तरीके ढूंढती नजर आ रही हैं. यह दावा देखकर कई लोग हैरान और चिंतित हो गए. कुछ ने इसे समाज की सोच का आईना बताया तो कुछ ने इसे पुरुष विरोधी मानसिकता से जोड़ा. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गूगल ने ऐसा कोई आंकड़ा जारी नहीं किया है.

    फेक है खबर


    गूगल हर साल “Year in Search” रिपोर्ट जारी करता है जिसमें उस साल के टॉप ट्रेंडिंग सर्च बताए जाते हैं. 2025 की रिपोर्ट में भारत में टॉप सर्च में इंडियन प्रीमियर लीग यानी IPL सबसे ऊपर रहा. उसके बाद गूगल जेमिनी, एशिया कप, आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी, प्रो कबड्डी लीग, महाकुंभ, महिला विश्व कप, ग्रोक, सैयारा और धर्मेंद्र जैसे नाम शामिल थे. महिलाओं से जुड़ी सर्च में क्रिकेटर जेमिमा रोड्रिग्ज, स्मृति मंधाना जैसी हस्तियां टॉप पर रहीं. मर्डर या हिंसा के तरीकों से जुड़ी कोई भी क्वेरी टॉप लिस्ट में नहीं थी. वैश्विक स्तर पर भी चार्ली कर्क, के-पॉप, लैबुबू, आईफोन जैसे विषय छाए रहे. इस वायरल दावे की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है. गूगल अपनी सर्च वॉल्यूम के सटीक आंकड़े इस तरह सार्वजनिक नहीं करता कि कोई विशेष वाक्य कितनी बार सर्च हुआ. गूगल ट्रेंड्स सिर्फ सापेक्ष रुचि दिखाता है, पूर्ण संख्या नहीं. इसलिए 16 करोड़ का आंकड़ा पूरी तरह निराधार है.

    फैक्ट चेक में सामने आई सच्चाई


    ब्राजील सहित कई देशों में “महिला को बिना निशान मारे कैसे” जैसे समान दावे पहले भी वायरल हुए थे. उन्हें फैक्ट-चेकर्स और खुद गूगल ने खारिज कर दिया था. उन मामलों में भी कहा गया था कि आंकड़े कंपनी के डेटा पर आधारित नहीं हैं. सोशल मीडिया पर ऐसे दावे फैलने की कई वजहें हैं. सबसे बड़ी वजह है क्लिक और इंगेजमेंट की होड़. चौंकाने वाले, डरावने या विवादित शीर्षक ज्यादा लाइक, शेयर और कमेंट पाते है. एल्गोरिदम ऐसे कंटेंट को आगे बढ़ाता है. कई बार बिना स्रोत के स्क्रीनशॉट या पोस्ट बनाकर फैला दिए जाते हैं. लोग उन्हें सच मानकर आगे शेयर कर देते हैं. कभी-कभी यह जेन्डर वॉर को भड़काने के लिए भी किया जाता है. एक तरफ महिला सुरक्षा और हिंसा के आंकड़े चर्चा में रहते हैं तो दूसरी तरफ पुरुषों के खिलाफ झूठे आरोपों की बातें भी उठती हैं. ऐसे में संतुलित और सत्यापित जानकारी की कमी और बढ़ जाती है.

  • यहां iPhone से भी सस्ता बिक रहा है बंगला, कौड़ियों के दाम खरीद रहे लोग…?

    यहां iPhone से भी सस्ता बिक रहा है बंगला, कौड़ियों के दाम खरीद रहे लोग…?

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    आईफोन से भी सस्ता मिल रहा जापान में घर (इमेज- सोशल मीडिया)

    दुनिया के कई देशों में घर खरीदना सपना बनकर रह जाता है. कीमतें आसमान छूती हैं और आम आदमी के लिए अपना घर बसाना मुश्किल हो जाता है. लेकिन जापान में एक बिल्कुल उलटी तस्वीर देखने को मिल रही है. यहां लाखों घर सालों से खाली पड़े हैं. इन्हें जापानी भाषा में “अकिया” कहा जाता है. अब इन अकिया घरों की बिक्री जोरों पर है और कुछ तो इतने सस्ते हैं कि उनकी कीमत एक अच्छे आईफोन से भी कम बैठ रही है.

    लोग कौड़ियों के दाम में ये घर खरीदने के लिए भाग-भाग कर रजिस्ट्री करवा रहे हैं. जापान में अकिया की समस्या पिछले कई वर्षों से चर्चा में है. देश की आबादी तेजी से बुजुर्ग हो रही है और ग्रामीण इलाकों से युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. नतीजा यह हुआ कि गांवों और छोटे कस्बों में लाखों घर खाली पड़ गए हैं. मालिक या तो गुजर चुके हैं या शहर में बस गए हैं और घर की देखभाल नहीं कर पा रहे. ऐसे में इन घरों को औने-पौने दामों में बेचा जा रहा है.

    लाखों घर हैं सुनसान
    अनुमान के मुताबिक जापान में ऐसे खाली घरों की संख्या कई लाखों में है और आने वाले वर्षों में यह आंकड़ा और बढ़ सकता है. इन घरों की कीमत उनके आकार, लोकेशन और हालत पर निर्भर करती है. कुछ घर पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं तो कुछ में थोड़ी मरम्मत की जरूरत है. दूरदराज के इलाकों में जहां आबादी बहुत कम है वहां कुछ संपत्तियां बेहद कम कीमत पर उपलब्ध हो जाती हैं. सोशल मीडिया और खबरों में दावा किया जा रहा है कि कुछ बंगले या घर आईफोन की कीमत से भी सस्ते में बिक रहे हैं. यही वजह है कि लोग इन घरों को खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं और रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं. भारत सहित दुनिया के कई देशों में लोग इस खबर को पढ़कर हैरान हैं. कई भारतीय यूजर्स सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि वे जापान शिफ्ट होने के तरीके सर्च कर रहे हैं. सस्ता घर होने का लालच किसी को भी आकर्षित कर सकता है. लेकिन हकीकत सिर्फ कीमत तक सीमित नहीं है. इन घरों को खरीदने के बाद कई चुनौतियां भी आती है.

    कई को मरम्मत की जरुरत
    सालों से खाली पड़े इन घरों में सबसे बड़ी चुनौती मरम्मत की है. कई अकिया घर लंबे समय से बंद पड़े होने के कारण क्षतिग्रस्त हो चुके हैं. छत लीक करती है, दीवारें कमजोर हो जाती हैं, पाइपलाइन और बिजली के तार पुराने पड़ जाते हैं. मरम्मत का खर्च कभी-कभी घर की कीमत से भी ज्यादा बैठ सकता है. इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में नौकरी, स्वास्थ्य सुविधाएं, स्कूल और परिवहन के विकल्प सीमित होते हैं. युवा पीढ़ी के लिए शहरों की सुविधाएं छोड़कर गांव में बसना आसान नहीं होता.

    जापानी सरकार और स्थानीय प्रशासन अकिया समस्या से निपटने के लिए कई कदम उठा रहे हैं. कुछ जगहों पर खाली घरों को सस्ते में या कभी-कभी मुफ्त में देने की योजनाएं चलाई जाती हैं बशर्ते खरीदार वहां रहें और घर को ठीक रखें. कुछ स्थानीय निकाय विदेशी खरीदारों को भी आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि आबादी बढ़े और इलाका फिर से जीवंत हो जाए. फिर भी प्रक्रिया आसान नहीं है. कानूनी कागजी कार्रवाई, टैक्स और स्थानीय नियमों का पालन करना जरूरी होता है. सोशल मीडिया पर इस विषय ने खासी चर्चा पैदा कर दी है।. कुछ लोग इसे सुनहरा मौका बता रहे हैं तो कुछ चेतावनी दे रहे हैं कि सिर्फ सस्ता होने के चक्कर में फैसला ना करें.

  • बिहार के 4 कलाकार जिन्होंने बॉलीवुड में बनाई खास पहचान..

    बिहार के 4 कलाकार जिन्होंने बॉलीवुड में बनाई खास पहचान..

    बिहार को प्रतिभाओं की धरती कहा जाता है। कला, सिनेमा और मनोरंजन के क्षेत्र में भी बिहार से कई ऐसे कलाकार निकले हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत और शानदार अभिनय के दम पर देशभर में पहचान बनाई। इनमें से कुछ कलाकारों ने बॉलीवुड में अपनी अलग छाप छोड़ी है।

    आइए जानते हैं बिहार से जुड़े उन 4 कलाकारों के बारे में, जिन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में खास मुकाम हासिल किया।

    1. प्रकाश झा

    बिहार के चंपारण क्षेत्र से जुड़े प्रकाश झा भारतीय सिनेमा के चर्चित फिल्म निर्देशक, निर्माता और अभिनेता हैं। सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर आधारित फिल्मों के लिए उन्हें खास पहचान मिली। गंगाजल, अपहरण, राजनीति, आरक्षण और सत्याग्रह जैसी फिल्मों ने उन्हें अलग पहचान दिलाई।

    2. सोनाक्षी सिन्हा

    सोनाक्षी सिन्हा का जन्म पटना, बिहार में हुआ था। उन्होंने दबंग से बॉलीवुड में शानदार शुरुआत की और इसके बाद राउडी राठौर, अकीरा, फोर्स 2 और इत्तेफाक जैसी फिल्मों में काम किया। अपने अलग अंदाज और अभिनय के कारण उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में मजबूत पहचान बनाई।

    3. मनोज बाजपेयी

    बिहार के पश्चिम चंपारण जिले से आने वाले मनोज बाजपेयी हिंदी सिनेमा के बेहतरीन अभिनेताओं में गिने जाते हैं। सत्या, गैंग्स ऑफ वासेपुर, अलीगढ़, स्पेशल 26 और सत्याग्रह जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को काफी सराहा गया। वे अपनी दमदार और सहज अदाकारी के लिए जाने जाते हैं।

    4. नेहा शर्मा

    भागलपुर, बिहार में जन्मी नेहा शर्मा ने हिंदी फिल्मों के साथ-साथ अन्य मनोरंजन परियोजनाओं में भी काम किया है। क्रुक, तेरी मेरी कहानी, जयंता भाई की लव स्टोरी और यमला पगला दीवाना 2 जैसी फिल्मों में नजर आ चुकी नेहा शर्मा ने बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई है।

    बिहार की प्रतिभा की अलग पहचान

    बिहार से आने वाले कलाकारों ने हिंदी सिनेमा में अपनी मेहनत, अभिनय और रचनात्मकता के दम पर जगह बनाई है। इन कलाकारों की सफलता यह दिखाती है कि छोटे शहर और साधारण पृष्ठभूमि से आने वाली प्रतिभाएं भी बड़े मंच पर अपनी अलग पहचान बना सकती हैं।

  • बारिश में अचानक क्यों निकल आते हैं सांप? सावन से जुड़ी इस वजह से 90% लोग हैं अनजान

    बारिश में अचानक क्यों निकल आते हैं सांप? सावन से जुड़ी इस वजह से 90% लोग हैं अनजान

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    सावन का महीना शुरू होते ही खेतों, सड़कों और कई बार घरों के आसपास भी सांप दिखाई देने की घटनाएं बढ़ जाती हैं. सोशल मीडिया पर भी इस मौसम में सांपों के वीडियो और तस्वीरें खूब वायरल होती हैं. ऐसे में लोगों के मन में सवाल उठता है कि क्या सावन में सचमुच सांप ज्यादा निकलते हैं और क्या इसका संबंध नाग पंचमी से है? तो चलिए आपको बताते हैं इसका सही जवाब…

    बारिश के कारण बिलों से बाहर आते हैं सांप
    सांप आमतौर पर जमीन के अंदर बने बिलों, दरारों, झाड़ियों और घास के बीच छिपकर रहते हैं. सावन के दौरान तेज बारिश होने से इनके बिलों में पानी भर जाता है. ऐसे में सांप सुरक्षित जगह की तलाश में बाहर निकलने को मजबूर हो जाते हैं. यही वजह है कि इस मौसम में खेतों, सड़कों और रिहायशी इलाकों में इनके दिखने की घटनाएं बढ़ जाती हैं.

    तापमान और नमी बनाते हैं अनुकूल माहौल
    सांप ठंडे खून वाले जीव होते हैं. उनके शरीर का तापमान वातावरण के अनुसार बदलता रहता है. गर्मियों में तेज गर्मी और डिहाइड्रेशन के खतरे की वजह से वे कम सक्रिय रहते हैं. वहीं बरसात के मौसम में तापमान कम और नमी अधिक होने से उनके लिए बाहर निकलना आसान हो जाता है. इसलिए सावन में उनकी गतिविधियां सामान्य दिनों की तुलना में ज्यादा दिखाई देती हैं.

    भोजन की तलाश भी है बड़ी वजह
    मानसून में मेंढक, चूहे और कीड़े-मकोड़े तेजी से बढ़ते हैं. यही जीव सांपों का मुख्य भोजन हैं. जब भोजन आसानी से मिलने लगता है तो सांप भी ज्यादा सक्रिय होकर शिकार की तलाश में बाहर निकलते हैं. इसलिए बारिश के मौसम में उनका दिखना स्वाभाविक माना जाता है.

    प्रजनन काल का भी पड़ता है असर
    जानकारों के मुताबिक कई प्रजातियों के सांपों का प्रजनन काल भी मानसून के दौरान होता है. इस समय वे साथी की तलाश में अधिक दूरी तय करते हैं. इससे भी लोगों को सांप पहले की तुलना में ज्यादा नजर आते हैं.

    नाग पंचमी और धार्मिक मान्यता
    सावन में ही नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है, जो नाग देवता और भगवान शिव को समर्पित है. इस दिन नाग देवता की पूजा करने की परंपरा है. मान्यता है कि इससे सर्पदंश के भय से रक्षा होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है. हालांकि, इसी समय सांप प्राकृतिक कारणों से ज्यादा दिखाई देते हैं, इसलिए लोगों को लगता है कि उनका संबंध सीधे नाग पंचमी से है.

  • एक साल से सरकारी रिकॉर्ड में ‘मुर्दा’ था शख्स, कलेक्टर के पास पहुंचकर बोला- साहब, मैं जिंदा हूं..

    एक साल से सरकारी रिकॉर्ड में ‘मुर्दा’ था शख्स, कलेक्टर के पास पहुंचकर बोला- साहब, मैं जिंदा हूं..

    मध्य प्रदेश के शिवपुरी में एक अनोखा मामले सामने आया है. मर चुका युवक एक अचानक जिंदा हो गया और कलेक्ट्रेट ऑफिस पहुंच गया. युवक ने कलेक्टर से गुहार लगाई कि साहब, मैं जिंदा हूं. दरअसल ये शख्स जिंदा हैं, लेकिन कागजों में इनको मृत घोषित कर दिया गया है. जिसकी वजह से इनको तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल रहा है. इतना ही नहीं, जमीन जायदाद का काम भी अटका हुआ है.

    पिता की जगह बेटे का मृत्यु प्रमाण पत्र-
    शिवपुरी जिले की रन्नौद नगर परिषद की एक लापरवाही ने जिंदा इंसान को कागजों में मृत घोषित कर दिया. मामला सेसई निवासी गिटला आदिवासी का है. पिता के निधन के बाद मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने गए तो अधिकारियों ने पिता की जगह बेटे गिटला का ही मृत्यु प्रमाण पत्र बना दिया.

    ‘साहब, मैं जिंदा हूं…’
    गिटला ने शिवपुरी कलेक्ट्रेट में आयोजित जनसुनवाई में कलेक्टर को आवेदन सौंपा. उसने बताया कि मेरे पिताजी का निधन 2022 में हो गया था. नामांतरण करवाने गया तो पता चला कि नगर परिषद रन्नौद ने गलती से मेरा मृत्यु प्रमाण पत्र बना दिया है. ये प्रमाण पत्र 1 साल पहले बना था. गिटला का कहना है कि नगर परिषद में कई बार शिकायत की, सुनवाई नहीं हुई. अब जमीन-जायदाद के काम अटक गए हैं. बैंक, राशन, सरकारी योजनाएं सब बंद. जिंदा होते हुए भी सिस्टम ने उसे मृत मान लिया. बड़ा सवाल यह है कि रन्नौद नगर परिषद के जिम्मेदार अधिकारियों की गलती का खामियाजा पीड़ित युवक भुगत रहा है.

    उचित कार्रवाई होगी- एडीएम
    हालांकि प्रशासन भी इस मामले में उचित कार्रवाई का भरोसा दिला रहा है. लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है. इस पूरे मामले को लेकर एडीएम दिनेश चंद शुक्ला का कहना है कि यह पूरा मामला मीडिया के द्वारा उनके संज्ञान में लाया गया है इस पूरे मामले की जांच कर उचित कार्रवाई की जाएगी.