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  • इस मंदिर के पत्थरों: पर थपथपाने से सुनाई देते हैं संगीत के सुर! 56 संगीतमय स्तंभों का क्या है रहस्य.

    इस मंदिर के पत्थरों: पर थपथपाने से सुनाई देते हैं संगीत के सुर! 56 संगीतमय स्तंभों का क्या है रहस्य.

    इस मंदिर के पत्थरों: पर थपथपाने से सुनाई देते हैं संगीत के सुर! 56 संगीतमय स्तंभों का क्या है रहस्य.

    हम्पी: भारत के प्राचीन मंदिर अपनी भव्य वास्तुकला और अद्भुत नक्काशी के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। कर्नाटक के हम्पी स्थित विजय विट्ठल मंदिर भी ऐसी ही ऐतिहासिक धरोहर है, जहां पत्थरों से बने कुछ स्तंभों को लेकर सदियों से लोगों की खास दिलचस्पी रही है। इन्हें आमतौर पर संगीतमय स्तंभ या ‘म्यूजिकल पिलर्स’ कहा जाता है।

    इन स्तंभों की खासियत यह है कि इन पर हल्की चोट या थपकी देने पर अलग-अलग तरह की ध्वनियां सुनाई दे सकती हैं। इसी वजह से इन्हें भारतीय संगीत के सुरों और वाद्य यंत्रों से जोड़कर देखा जाता है।

    15वीं शताब्दी की शानदार वास्तुकला

    विजय विट्ठल मंदिर हम्पी के ऐतिहासिक मंदिर परिसर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हम्पी को यूनेस्को की विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है। यह क्षेत्र कभी शक्तिशाली विजयनगर साम्राज्य का प्रमुख केंद्र हुआ करता था।

    विट्ठल मंदिर भगवान विष्णु के विट्ठल स्वरूप को समर्पित है। मंदिर परिसर में प्रसिद्ध पत्थर का रथ भी मौजूद है, लेकिन इसकी वास्तुकला के साथ-साथ संगीतमय स्तंभ भी लोगों का ध्यान खींचते हैं।

    मंदिर के निर्माण और विस्तार का काम विजयनगर काल के अलग-अलग शासकों के दौर में हुआ था। इसी वजह से इसकी वास्तुकला में कई चरणों की झलक दिखाई देती है।

    56 स्तंभों में छिपा है ध्वनि का रहस्य

    मंदिर के महामंडप में मौजूद स्तंभों को बेहद बारीकी से तराशा गया है। मुख्य स्तंभों के आसपास कई छोटे और पतले स्तंभनुमा हिस्से बनाए गए हैं। इन्हीं को ‘संगीतमय स्तंभ’ कहा जाता है।

    इन पर हल्की थाप देने से अलग-अलग आवृत्ति की ध्वनियां पैदा हो सकती हैं। यही वजह है कि इनके बारे में लंबे समय से यह धारणा चली आ रही है कि इन पत्थरों से संगीत के सुर निकलते हैं।

    हालांकि आज संरक्षण के कारण पर्यटकों को इन ऐतिहासिक स्तंभों को छूने या थपथपाने की अनुमति नहीं होती। इसलिए इनके बारे में प्रचलित जानकारी को पुराने विवरणों और अध्ययनों के संदर्भ में समझना चाहिए।

    क्या पत्थरों के अंदर कोई खोखली जगह थी?

    इन स्तंभों को लेकर कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं। कुछ पुराने विवरणों में यह भी दावा मिलता है कि ब्रिटिश काल में इनकी संरचना का रहस्य जानने के लिए कुछ स्तंभों को काटकर देखा गया था।

    कहा जाता है कि जांच के दौरान इनके भीतर कोई छिपा हुआ यंत्र या धातु की संरचना नहीं मिली। हालांकि इस घटना से जुड़े विवरणों की ऐतिहासिक पुष्टि और उनके अलग-अलग संस्करणों को लेकर सावधानी बरतना जरूरी है।

    आखिर पत्थर से आवाज निकलती कैसे है?

    इसका जवाब केवल यह कह देना नहीं है कि पत्थर में कोई खास धातु मौजूद होने के कारण संगीत पैदा होता है। ध्वनि उत्पन्न होने के पीछे पत्थर की संरचना, आकार, लंबाई, मोटाई, तराशने की तकनीक और कंपन के गुण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    जब किसी ठोस संरचना को विशेष आकार दिया जाता है और उस पर चोट की जाती है, तो उसमें कंपन पैदा होता है। अलग-अलग आकार और संरचना वाले हिस्से अलग-अलग आवृत्तियों पर कंपन कर सकते हैं। इसी वजह से उनसे अलग-अलग ध्वनियां सुनाई दे सकती हैं।

    विजय विट्ठल मंदिर के स्तंभों की खासियत यह है कि प्राचीन शिल्पकारों ने पत्थर को इस तरह तराशा कि उसके विभिन्न हिस्सों में अलग तरह के कंपन पैदा हो सकें। यही प्राचीन स्थापत्य और शिल्प कौशल इस मंदिर को खास बनाता है।

    क्या सच में ‘सारेगामा’ के सातों सुर निकलते हैं?

    मंदिर के संगीतमय स्तंभों को अक्सर भारतीय संगीत के सुरों से जोड़ा जाता है, लेकिन इसे शाब्दिक रूप से हर स्तंभ से बिल्कुल सटीक सा-रे-गा-मा निकलने के दावे के रूप में नहीं समझना चाहिए।

    असल में इन स्तंभों की विशेषता उनकी ध्वनि और कंपन से जुड़ी है। अलग-अलग स्तंभों या उनके हिस्सों से अलग आवृत्तियों की आवाजें सुनाई देने की बात पुराने विवरणों में मिलती है।

    विजय विट्ठल मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यही है कि सदियों पहले बिना आधुनिक मशीनों और कंप्यूटर तकनीक के शिल्पकारों ने पत्थर की संरचना, अनुपात और कंपन को समझते हुए ऐसी अद्भुत वास्तुकला तैयार की।

    आज ये स्तंभ केवल संगीत से जुड़े रहस्य के कारण ही नहीं, बल्कि विजयनगर साम्राज्य की उन्नत स्थापत्य कला और शिल्प कौशल के प्रमाण के रूप में भी बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

  • पूरे भारत का एक ‘महीने’ का बिजली बिल कितना होता है? आंकड़ा जानकर चौंक जाएंगे, ऐसे होती है गणना:

    पूरे भारत का एक ‘महीने’ का बिजली बिल कितना होता है? आंकड़ा जानकर चौंक जाएंगे, ऐसे होती है गणना:

    पूरे भारत का एक ‘महीने’ का बिजली बिल कितना होता है? आंकड़ा जानकर चौंक जाएंगे, ऐसे होती है गणना:

    नई दिल्ली: घर का बिजली बिल हर महीने के बजट का एक अहम हिस्सा होता है। गर्मियों में एसी, कूलर और पंखों का इस्तेमाल बढ़ने के साथ बिजली की खपत भी तेजी से बढ़ जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पूरे भारत में एक महीने में जितनी बिजली खर्च होती है, अगर उसका बिल निकाला जाए तो रकम कितनी होगी?

    हालिया आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर महीने करीब 160 से 169 अरब यूनिट बिजली की खपत होती है। उदाहरण के तौर पर अगस्त 2026 में देश में कुल बिजली खपत करीब 169.01 अरब यूनिट दर्ज की गई थी।

    हालांकि, पूरे देश का एक ही बिजली बिल नहीं होता। इसकी वजह यह है कि बिजली की दरें राज्य, उपभोक्ता वर्ग और खपत के स्लैब के अनुसार अलग-अलग होती हैं।

    घरेलू बिजली की औसत दर कितनी है?

    भारत में घरेलू बिजली की औसत दर करीब 6.86 रुपये प्रति यूनिट बताई जाती है। वहीं दुकानों, दफ्तरों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए बिजली की औसत दर इससे अधिक होती है और यह करीब 10.28 रुपये प्रति यूनिट के आसपास हो सकती है।

    इसके अलावा बिजली की दरें स्लैब के हिसाब से भी बदलती हैं। यानी कम यूनिट इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ता और ज्यादा बिजली खर्च करने वाले उपभोक्ता के लिए प्रति यूनिट दर अलग हो सकती है।

    अगर पूरी बिजली को घरेलू दर से जोड़ें तो कितना बनेगा?

    अगर सिर्फ समझने के लिए अगस्त 2026 की 169.01 अरब यूनिट खपत को 6.86 रुपये प्रति यूनिट की औसत घरेलू दर से गुणा किया जाए, तो रकम करीब 1.16 लाख करोड़ रुपये बैठती है।

    लेकिन यह वास्तविक राष्ट्रीय बिजली बिल नहीं है। इसकी वजह यह है कि देश की पूरी बिजली खपत घरेलू उपभोक्ताओं की नहीं होती। इसमें उद्योग, कारोबार, कृषि, सरकारी संस्थान और अन्य श्रेणियों की बिजली खपत भी शामिल होती है, जिनकी दरें अलग-अलग होती हैं।

    इसलिए वास्तविक बिल की गणना के लिए हर श्रेणी की खपत और उसके संबंधित टैरिफ को अलग-अलग देखना पड़ेगा।

    एक आम परिवार का बिजली बिल कितना आता है?

    हर परिवार का बिजली बिल उसकी खपत, राज्य की दरों और मौसम पर निर्भर करता है। सामान्य तौर पर कई भारतीय परिवारों में मासिक बिजली बिल कुछ सौ रुपये से लेकर कुछ हजार रुपये तक हो सकता है।

    जिन घरों में एसी, गीजर, फ्रिज, वॉशिंग मशीन और दूसरे ज्यादा बिजली खपत करने वाले उपकरण हैं, वहां बिल काफी अधिक हो सकता है। वहीं कम उपकरण इस्तेमाल करने वाले परिवारों का बिल तुलनात्मक रूप से कम रहता है।

    अगस्त में बिजली की खपत क्यों बढ़ी?

    अगस्त 2026 में भारत की कुल बिजली खपत करीब 169.01 अरब यूनिट रही, जबकि अगस्त 2025 में यह लगभग 149.76 अरब यूनिट थी। यानी सालाना आधार पर बिजली की खपत में करीब 12.85 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।

    इस दौरान कई इलाकों में गर्मी और उमस बनी रही। ऐसे मौसम में लोग एयर कंडीशनर, कूलर और दूसरे कूलिंग उपकरणों का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। इसका सीधा असर बिजली की मांग पर पड़ता है।

    बिजली की पीक डिमांड भी बढ़ी

    बिजली की कुल खपत के साथ-साथ एक समय पर सबसे ज्यादा बिजली की जरूरत यानी पीक डिमांड में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    अगस्त 2025 में अधिकतम बिजली मांग करीब 229.72 गीगावाट थी, जो अगस्त 2026 में बढ़कर लगभग 258.27 गीगावाट तक पहुंच गई। हालांकि यह मई में दर्ज करीब 270.82 गीगावाट की अधिकतम मांग से कम रही।

    बिजली बिल किन चीजों से तय होता है?

    किसी उपभोक्ता का बिजली बिल सिर्फ यूनिट को प्रति यूनिट दर से गुणा करने से तय नहीं होता। इसमें कई दूसरे शुल्क भी शामिल हो सकते हैं। राज्य और बिजली वितरण कंपनी के अनुसार फिक्स्ड चार्ज, ऊर्जा शुल्क, टैक्स, ड्यूटी, सरचार्ज और अन्य नियामकीय शुल्क लग सकते हैं।

    यही वजह है कि एक ही मात्रा में बिजली इस्तेमाल करने वाले दो परिवारों का बिल अलग-अलग राज्यों में अलग हो सकता है।

    भारत में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है और मौसम, औद्योगिक गतिविधियों तथा घरेलू उपकरणों के इस्तेमाल में बदलाव का सीधा असर बिजली खपत पर पड़ता है। इसलिए पूरे देश के ‘एक महीने के बिजली बिल’ का कोई एक तय आंकड़ा नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय खपत को औसत दरों से जोड़ने पर यह रकम दसियों हजार करोड़ रुपये से लेकर एक लाख करोड़ रुपये से भी अधिक के स्तर पर पहुंच सकती है।

  • फलाहारी महाराज नाम क्यों पड़ा? क्या सच में सिर्फ फल खाकर रहते हैं संत, जानिए क्या होता है फलाहारी आहार.

    फलाहारी महाराज नाम क्यों पड़ा? क्या सच में सिर्फ फल खाकर रहते हैं संत, जानिए क्या होता है फलाहारी आहार.

    फलाहारी महाराज नाम क्यों पड़ा? क्या सच में सिर्फ फल खाकर रहते हैं संत, जानिए क्या होता है फलाहारी आहार.

    वृंदावन: संतों की परंपरा में कई साधु अपने कठोर नियमों और खान-पान की विशेष तपस्या के लिए जाने जाते हैं। इन्हीं में एक नाम फलाहारी महाराज का भी सामने आता है। हाल के एक विवाद के बाद उनके नाम और जीवनशैली को लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर किसी संत को फलाहारी क्यों कहा जाता है और क्या फलाहारी होने का मतलब सिर्फ फल खाना होता है?

    हाल ही में वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज के केलीकुंज आश्रम से जुड़े विवाद के बीच श्री कृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास के अध्यक्ष दिनेश शर्मा, जिन्हें फलाहारी महाराज के नाम से जाना जाता है, की ओर से विराट कोहली से जुड़ा एक दावा सामने आया था। इस दावे में प्रेमानंद महाराज से मुलाकात को लेकर आर्थिक लेनदेन का आरोप लगाया गया था।

    हालांकि, विराट कोहली के प्रवक्ता ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि विराट कोहली और अनुष्का शर्मा प्रेमानंद महाराज के प्रति श्रद्धा और आस्था के कारण उनसे मिलने जाते हैं। ऐसे में इस विवाद से अलग यह जानना भी दिलचस्प है कि ‘फलाहारी’ शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है।

    संतों को फलाहारी क्यों कहा जाता है?

    हिंदू धार्मिक परंपरा में फलाहारी शब्द ऐसे व्यक्ति या साधु के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो अपने आहार में अनाज का त्याग कर देता है और फल, दूध तथा कुछ अन्य सात्विक खाद्य पदार्थों पर निर्भर रहता है।

    यह किसी व्यक्ति का पारिवारिक नाम या जातिगत पहचान नहीं होती। कई बार साधु अपने धार्मिक संकल्प, तपस्या या साधना के दौरान अनाज का त्याग करते हैं। इसके बाद उनकी इसी जीवनशैली के कारण लोग उन्हें फलाहारी कहकर संबोधित करने लगते हैं।

    क्या फलाहारी संत सिर्फ फल ही खाते हैं?

    फलाहारी शब्द सुनकर अक्सर लोगों को लगता है कि ऐसे संत पूरे जीवन केवल फल खाकर ही रहते होंगे। लेकिन फलाहार का अर्थ हर स्थिति में केवल फल खाना नहीं होता।

    कई फलाहारी साधुओं के आहार में मौसमी फल के साथ सूखे मेवे, मखाना, दूध, दही, मट्ठा, नारियल पानी और अन्य सात्विक चीजें भी शामिल हो सकती हैं। हालांकि यह हर संत के व्यक्तिगत संकल्प और नियम पर निर्भर करता है।

    कुछ साधु अपने नियमों के तहत पके हुए भोजन, मसालों और अनाज से पूरी तरह दूरी बनाए रखते हैं, जबकि फलाहार की अलग-अलग परंपराओं में आहार के नियम अलग हो सकते हैं।

    फलाहार को तपस्या से क्यों जोड़ा जाता है?

    धार्मिक दृष्टि से भोजन पर नियंत्रण को कई साधना परंपराओं में आत्मसंयम का हिस्सा माना गया है। साधु-संत अपने संकल्प के अनुसार कुछ खाद्य पदार्थों का त्याग करते हैं और इसे अपनी आध्यात्मिक साधना से जोड़ते हैं।

    इसी वजह से फलाहारी संतों की जीवनशैली आम लोगों से काफी अलग नजर आती है। उनके लिए यह केवल खान-पान का बदलाव नहीं, बल्कि धार्मिक अनुशासन और संकल्प का हिस्सा हो सकता है।

    क्या हर फलाहारी संत का आहार एक जैसा होता है?

    ऐसा जरूरी नहीं है। फलाहारी कोई एक तय डाइट चार्ट नहीं है। अलग-अलग संत अपनी साधना और परंपरा के अनुसार अलग नियम अपना सकते हैं।

    इसलिए किसी एक फलाहारी संत के भोजन के आधार पर सभी फलाहारी साधुओं की जीवनशैली के बारे में निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। किसी संत के बारे में यह जानने के लिए उनके स्वयं बताए गए नियमों और परंपरा को ही आधार माना जाना चाहिए।

    फलाहारी महाराज को लेकर हालिया विवाद ने भले ही उनके नाम को चर्चा में ला दिया हो, लेकिन ‘फलाहारी’ शब्द का मूल संबंध साधु-संतों की आहार संबंधी तपस्या और अनाज त्याग की परंपरा से है।

  • अक्टूबर में सबसे ज्यादा: गर्मी कब पड़ी थी? इस साल टूटा था रिकॉर्ड, फिर कब आई थी गुलाबी ठंड.

    अक्टूबर में सबसे ज्यादा: गर्मी कब पड़ी थी? इस साल टूटा था रिकॉर्ड, फिर कब आई थी गुलाबी ठंड.

    अक्टूबर में सबसे ज्यादा: गर्मी कब पड़ी थी? इस साल टूटा था रिकॉर्ड, फिर कब आई थी गुलाबी ठंड.

    अक्टूबर का महीना आमतौर पर मानसून की विदाई और मौसम में बदलाव के लिए जाना जाता है। इस दौरान दिन की तेज गर्मी धीरे-धीरे कम होने लगती है और सुबह-शाम हल्की ठंडक महसूस होने लगती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मौसम के बदलते मिजाज ने इस सामान्य पैटर्न को काफी प्रभावित किया है।

    मौसम विभाग के ऐतिहासिक आंकड़ों के मुताबिक, 2024 का अक्टूबर भारत के लिए बेहद गर्म रहा था। 1901 के बाद के उपलब्ध आंकड़ों में इसे देश के सबसे गर्म अक्टूबर महीनों में दर्ज किया गया। इस दौरान औसत तापमान सामान्य से काफी ऊपर रहा।

    इतिहास में सबसे गर्म अक्टूबर कब रहा?

    अगर किसी एक साल के अक्टूबर में दर्ज औसत अधिकतम तापमान की बात करें, तो 1951 का अक्टूबर खास तौर पर गर्म रहा था। उस दौरान दिल्ली के सफदरजंग मौसम केंद्र पर अक्टूबर का औसत अधिकतम तापमान करीब 36.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था।

    इसके अलावा 1941 में औसत अधिकतम तापमान करीब 35.8 डिग्री और 1907 में करीब 35.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। ये आंकड़े बताते हैं कि अक्टूबर में असामान्य गर्मी कोई बिल्कुल नई घटना नहीं है, हालांकि हाल के वर्षों में तापमान और मौसम के पैटर्न में बदलाव को लेकर चिंता बढ़ी है।

    वहीं, 2024 में देश के औसत अक्टूबर तापमान ने भी नया रिकॉर्ड बनाया और यह महीना लंबे समय के औसत की तुलना में काफी गर्म रहा।

    फिर कब आती है गुलाबी ठंड?

    अक्टूबर के दूसरे हिस्से में आमतौर पर उत्तर भारत के कई इलाकों में रात और सुबह के तापमान में धीरे-धीरे गिरावट शुरू हो जाती है। इसी हल्की ठंडक को आम बोलचाल में ‘गुलाबी ठंड’ कहा जाता है।

    हालांकि इसकी कोई एक निश्चित तारीख नहीं होती। किसी साल अक्टूबर के मध्य में ही सुबह-शाम ठंडक महसूस होने लगती है, जबकि गर्म मौसम वाले वर्षों में नवंबर तक गर्मी बनी रह सकती है।

    1951 या 2024 जैसे गर्म अक्टूबर को देखते हुए यह कहना सही नहीं होगा कि पूरे देश में एक ही तारीख को गुलाबी ठंड ने दस्तक दी थी। मौसम का बदलाव स्थान, हवाओं, बारिश और तापमान के हिसाब से अलग-अलग समय पर होता है।

    अक्टूबर में गर्मी बढ़ने की क्या वजह होती है?

    मानसून की वापसी के बाद भी अगर बारिश और बादल बने रहें तथा हवा में नमी ज्यादा हो, तो कई इलाकों में उमस बनी रह सकती है। दूसरी ओर, उत्तर भारत में ठंडी हवाओं की शुरुआत देर से होने पर तापमान लंबे समय तक सामान्य से ऊपर रह सकता है।

    पश्चिमी विक्षोभ भी उत्तर भारत के मौसम को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण मौसमी प्रणालियों में शामिल हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में बारिश या बर्फबारी होने पर वहां से आने वाली ठंडी हवाएं मैदानी इलाकों के तापमान को प्रभावित कर सकती हैं।

    इसके अलावा बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बनने वाली मौसम प्रणालियां भी देश के अलग-अलग हिस्सों में नमी, बादल और बारिश के हालात बदल सकती हैं।

    मौसम में बदलाव क्यों है चिंता की बात?

    अक्टूबर में गर्मी बढ़ना सिर्फ असहज मौसम तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक तापमान सामान्य से ऊपर रहने पर बिजली की मांग, फसलों, स्वास्थ्य और स्थानीय मौसम चक्र पर भी असर पड़ सकता है।

    इसी तरह, ठंड की शुरुआत में देरी होने पर सर्दियों का सामान्य पैटर्न भी प्रभावित हो सकता है। हालांकि हर साल मौसम का व्यवहार अलग होता है, इसलिए किसी एक साल के रिकॉर्ड के आधार पर पूरे भविष्य के मौसम का अनुमान लगाना सही नहीं होगा।

    इतिहास के आंकड़े बताते हैं कि अक्टूबर में अत्यधिक गर्मी पहले भी पड़ चुकी है, लेकिन बदलते जलवायु पैटर्न के बीच ऐसे असामान्य तापमान और उनके प्रभावों पर लगातार नजर रखना जरूरी है।

  • दुनिया में कब-कब ‘कहर’ बरपा चुका है प्लेग? इन महामारियों में गई थी करोड़ों लोगों की जान.

    दुनिया में कब-कब ‘कहर’ बरपा चुका है प्लेग? इन महामारियों में गई थी करोड़ों लोगों की जान.

    दुनिया में कब-कब ‘कहर’ बरपा चुका है प्लेग? इन महामारियों में गई थी करोड़ों लोगों की जान.

    नई दिल्ली: प्लेग का नाम आते ही इतिहास की उन भयावह महामारियों की याद आती है, जिन्होंने अलग-अलग दौर में दुनिया की बड़ी आबादी को प्रभावित किया। यर्सिनिया पेस्टिस नामक बैक्टीरिया से होने वाली यह बीमारी मुख्य रूप से संक्रमित पिस्सुओं के जरिए फैलती है और इसके कुछ रूप बेहद गंभीर हो सकते हैं। हालांकि आज आधुनिक चिकित्सा के कारण प्लेग का इलाज संभव है, लेकिन दुनिया के कुछ हिस्सों में यह बीमारी अब भी मौजूद है।

    हाल ही में रूस के साइबेरिया क्षेत्र में एक महिला लैब कर्मचारी की मौत के बाद गंभीर निमोनिया और प्लेग को लेकर चर्चा तेज हुई थी। हालांकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, रूस या विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उसकी मौत को प्लेग संक्रमण से होने की पुष्टि नहीं की थी। यह मामला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि महिला ऐसे संस्थान में काम करती थी जहां प्लेग से जुड़े बैक्टीरिया पर शोध किया जाता है।

    इतिहास में प्लेग कई बार बड़े स्तर पर तबाही मचा चुका है।

    जस्टिनियन प्लेग: छठी शताब्दी की भयावह महामारी

    541 ईस्वी के आसपास शुरू हुई जस्टिनियन प्लेग महामारी बीजान्टिन साम्राज्य के बड़े हिस्से में फैल गई थी। कॉन्स्टेंटिनोपल समेत कई क्षेत्रों में इसका गंभीर असर देखने को मिला।

    माना जाता है कि व्यापारिक मार्गों के जरिए यह संक्रमण अलग-अलग इलाकों तक पहुंचा। उस समय बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और महामारी की कई लहरों ने लंबे समय तक समाज को प्रभावित किया। मृतकों की संख्या को लेकर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग अनुमान हैं, इसलिए इसके आंकड़े निश्चित नहीं माने जाते।

    इस महामारी ने बीजान्टिन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था, सैन्य क्षमता और सामाजिक व्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव डाला।

    ब्लैक डेथ: यूरोप की आबादी पर सबसे बड़ा असर

    1347 से 1353 के बीच फैली ब्लैक डेथ यानी काली मौत को मानव इतिहास की सबसे विनाशकारी महामारियों में गिना जाता है। यह यूरोप के साथ एशिया और मध्य पूर्व के कई हिस्सों तक पहुंची।

    व्यापारिक रास्तों के जरिए संक्रमण बंदरगाहों और फिर घनी आबादी वाले शहरों में फैल गया। अलग-अलग ऐतिहासिक अध्ययनों में मृतकों की संख्या के अलग-अलग अनुमान मिलते हैं, लेकिन माना जाता है कि करोड़ों लोगों की जान गई थी।

    यूरोप के कई इलाकों में आबादी का बड़ा हिस्सा खत्म हो गया। इसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव कई दशकों तक महसूस किए गए।

    तीसरी प्लेग महामारी: 1855 से शुरू हुआ लंबा दौर

    1855 में चीन के युन्नान प्रांत से शुरू हुई तीसरी प्लेग महामारी धीरे-धीरे दुनिया के कई हिस्सों तक पहुंची। उस समय अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार बढ़ रहा था, जिसके कारण संक्रमण चीन से हांगकांग और फिर भारत सहित दूसरे क्षेत्रों तक फैल गया।

    इस महामारी के दौरान दुनिया भर में करोड़ों लोगों की मौत हुई। भारत भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ और कई शहरों में बड़े पैमाने पर संक्रमण और मौतें दर्ज की गईं।

    इसी दौर में प्लेग को समझने में बड़ी वैज्ञानिक प्रगति हुई। 1894 में यर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरिया की पहचान प्लेग के कारण के रूप में की गई। इसके बाद बीमारी और चूहों-पिस्सुओं के बीच संबंध को समझने में भी वैज्ञानिकों को मदद मिली।

    लंदन का ग्रेट प्लेग

    1665 में लंदन में प्लेग का एक बड़ा प्रकोप सामने आया, जिसे ग्रेट प्लेग ऑफ लंदन के नाम से जाना जाता है। करीब एक साल के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और शहर की आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा प्रभावित हुआ।

    बीमारी के फैलने के साथ शहर के अमीर और सक्षम लोग दूसरे इलाकों की ओर चले गए, जबकि गरीब आबादी के पास शहर छोड़ने के विकल्प सीमित थे। प्रशासन ने संक्रमण रोकने के लिए संक्रमित घरों को अलग रखने और आवाजाही पर नियंत्रण जैसे कदम उठाए।

    1666 की लंदन की भीषण आग के बाद प्लेग के मामलों में कमी आई, लेकिन केवल आग को ही बीमारी के खत्म होने की वजह मानना सही नहीं होगा। बीमारी के प्रसार में स्वच्छता, मौसम, आबादी की स्थिति और अन्य कई कारकों की भूमिका थी।

    क्या आज भी मौजूद है प्लेग?

    प्लेग को अब केवल इतिहास की बीमारी नहीं माना जा सकता। दुनिया के कुछ हिस्सों में इसके मामले आज भी सामने आते हैं। यह मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में मौजूद रहता है जहां संक्रमित जंगली कृंतक और पिस्सू पाए जाते हैं।

    हालांकि आधुनिक चिकित्सा ने स्थिति को काफी बदल दिया है। समय पर पहचान और उचित एंटीबायोटिक उपचार मिलने पर प्लेग का इलाज संभव है। इसके अलावा निगरानी, स्वच्छता, संक्रमित जानवरों और पिस्सुओं के संपर्क से बचाव जैसे सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय बीमारी के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    प्लेग का इतिहास यह दिखाता है कि किसी संक्रामक बीमारी की शुरुआती पहचान, वैज्ञानिक निगरानी और समय पर उपचार कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। सदियों पहले जहां इस बीमारी ने बड़े पैमाने पर जनहानि की, वहीं आज चिकित्सा विज्ञान के विकास ने इसके प्रभाव को काफी हद तक नियंत्रित करना संभव बनाया है।

  • अमेरिका को हर साल: कितनी दवाएं भेजता है भारत? अरबों डॉलर का है फार्मा कारोबार, जेनेरिक दवाओं में बड़ी हिस्सेदारी.

    अमेरिका को हर साल: कितनी दवाएं भेजता है भारत? अरबों डॉलर का है फार्मा कारोबार, जेनेरिक दवाओं में बड़ी हिस्सेदारी.

    अमेरिका को हर साल: कितनी दवाएं भेजता है भारत? अरबों डॉलर का है फार्मा कारोबार, जेनेरिक दवाओं में बड़ी हिस्सेदारी.

    नई दिल्ली: भारत का फार्मास्युटिकल सेक्टर दुनिया के सबसे बड़े दवा बाजारों में अपनी मजबूत मौजूदगी रखता है। खास तौर पर अमेरिका भारतीय दवा कंपनियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बाजारों में से एक है। भारत हर साल अरबों डॉलर की दवाएं अमेरिका को निर्यात करता है और वहां जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति में भारतीय कंपनियों की बड़ी भूमिका है।

    उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, भारत से अमेरिका को हर साल करीब 8.7 अरब डॉलर से 10 अरब डॉलर मूल्य की दवाओं का निर्यात होता है। भारत का कुल फार्मा निर्यात लगभग 25.8 अरब डॉलर बताया जाता है। इस लिहाज से अमेरिकी बाजार भारतीय दवा निर्यात के लिए बेहद अहम है।

    अमेरिकी जेनेरिक दवा बाजार में भारत की बड़ी भूमिका

    अमेरिका के जेनेरिक दवा बाजार में भारतीय कंपनियों की मौजूदगी काफी मजबूत है। अलग-अलग आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली जेनेरिक दवाओं की बड़ी हिस्सेदारी भारतीय कंपनियों से आती है। कई रिपोर्टों में यह हिस्सा करीब 40 से 47 फीसदी तक बताया गया है।

    जेनेरिक दवाएं पेटेंट अवधि समाप्त होने के बाद तैयार की जाने वाली ऐसी दवाएं होती हैं, जिनमें मूल दवा के समान सक्रिय घटक होते हैं और आमतौर पर उनकी कीमत कम होती है। इसी वजह से अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था में इनकी मांग काफी अधिक है।

    अमेरिका में भारतीय दवाओं की इतनी मांग क्यों है?

    भारतीय फार्मा कंपनियों की सबसे बड़ी ताकत उनकी उत्पादन क्षमता और अपेक्षाकृत कम लागत में दवाएं तैयार करने की क्षमता है। भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाओं का निर्माण करती हैं।

    इनमें टैबलेट, कैप्सूल, सिरप, एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक और कई तरह की अन्य दवाएं शामिल हैं। यही वजह है कि अमेरिकी बाजार में भारतीय फार्मा कंपनियों की मौजूदगी लंबे समय से बनी हुई है।

    भारत में बड़ी संख्या में US FDA मानकों वाले प्लांट

    भारतीय फार्मा उद्योग की एक महत्वपूर्ण खासियत यह भी है कि देश में बड़ी संख्या में ऐसे दवा निर्माण संयंत्र हैं, जो अमेरिकी नियामकीय मानकों के अनुरूप उत्पादन करते हैं। भारत के पास अमेरिका के बाहर दुनिया में सबसे बड़ी संख्या में US FDA-निरीक्षित या स्वीकृत दवा निर्माण सुविधाओं में से एक है।

    यह बुनियादी ढांचा भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाजार में दवाओं की सप्लाई करने में मदद करता है। हालांकि किसी प्लांट की US FDA स्थिति को उसकी स्वीकृति, पंजीकरण या निरीक्षण की प्रकृति के आधार पर अलग-अलग समझना जरूरी है।

    अमेरिका के दवा आयात में भारत की हिस्सेदारी

    अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े फार्मास्युटिकल बाजारों में शामिल है और बड़ी मात्रा में दवाओं का आयात भी करता है। भारतीय कंपनियां इस आयात श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

    सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, ल्यूपिन, सिप्ला, जायडस लाइफसाइंसेज और अरबिंदो फार्मा जैसी भारतीय कंपनियों की अमेरिकी बाजार में मजबूत मौजूदगी है। कई कंपनियों ने अमेरिका में अपनी मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च और वितरण गतिविधियां भी स्थापित कर रखी हैं।

    भारत को क्यों कहा जाता है ‘दुनिया का दवाखाना’?

    भारत को लंबे समय से ‘दुनिया का दवाखाना’ कहा जाता है। इसकी वजह देश की विशाल दवा निर्माण क्षमता, जेनेरिक दवाओं का बड़ा उत्पादन और अपेक्षाकृत कम लागत है।

    अमेरिका भारत का एक प्रमुख फार्मा बाजार है, लेकिन भारतीय दवाओं की पहुंच केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। यूरोप, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, ब्राजील और एशिया के कई देशों में भी भारतीय दवा कंपनियां अपने उत्पाद निर्यात करती हैं।

    भारतीय फार्मा उद्योग की सबसे बड़ी ताकत

    भारतीय दवा उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक ताकत मुख्य रूप से कम उत्पादन लागत, बड़े पैमाने पर निर्माण क्षमता और जेनेरिक दवाओं के अनुभव पर आधारित है। इससे भारत वैश्विक स्तर पर किफायती दवाओं की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है।

    अमेरिकी बाजार के लिए भी भारतीय कंपनियों की भूमिका महत्वपूर्ण है, क्योंकि जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता स्वास्थ्य सेवाओं की लागत को नियंत्रित रखने में मदद कर सकती है। यही कारण है कि भारत और अमेरिका के बीच फार्मास्युटिकल कारोबार दोनों देशों के लिए आर्थिक और स्वास्थ्य क्षेत्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण बना हुआ है।

  • क्या पुलिस बिना नेम: प्लेट के कर सकती है ड्यूटी? जानिए पहचान और जवाबदेही को लेकर क्या हैं नियम.

    क्या पुलिस बिना नेम: प्लेट के कर सकती है ड्यूटी? जानिए पहचान और जवाबदेही को लेकर क्या हैं नियम.

    क्या पुलिस बिना नेम: प्लेट के कर सकती है ड्यूटी? जानिए पहचान और जवाबदेही को लेकर क्या हैं नियम.

    नई दिल्ली: पुलिस की वर्दी पर नाम और पहचान से जुड़ी जानकारी सिर्फ पहचान के लिए नहीं होती, बल्कि यह पुलिस कार्रवाई में जवाबदेही सुनिश्चित करने का भी महत्वपूर्ण माध्यम है। खासकर गिरफ्तारी, हिरासत या बल प्रयोग जैसी परिस्थितियों में पुलिसकर्मी की स्पष्ट पहचान बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कोई पुलिसकर्मी बिना नेम प्लेट के ड्यूटी कर सकता है?

    आम तौर पर वर्दी में तैनात पुलिसकर्मियों के लिए नाम और पहचान संबंधी विभागीय नियम लागू होते हैं। हालांकि, अलग-अलग राज्यों और पुलिस बलों के नियमों में कुछ अंतर हो सकता है। इसलिए हर स्थिति में इसे सीधे तौर पर एक ही नियम से जोड़ना सही नहीं होगा।

    नेम प्लेट क्यों जरूरी मानी जाती है?

    पुलिसकर्मी की वर्दी पर नेम प्लेट या पहचान संबंधी विवरण होने से आम नागरिक उसके नाम और पद की पहचान कर सकता है। किसी कार्रवाई के दौरान शिकायत या कानूनी प्रक्रिया की जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारी की पहचान स्थापित करना भी आसान होता है।

    यही वजह है कि पुलिस विभागों के वर्दी संबंधी नियमों में नेम प्लेट और बैज को महत्वपूर्ण माना जाता है। बिना अनुमति इन्हें हटाना सामान्य ड्यूटी नियमों के अनुरूप नहीं माना जाता।

    गिरफ्तारी के दौरान क्या कहता है कानून?

    भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 36 गिरफ्तारी की प्रक्रिया में पुलिस अधिकारी की स्पष्ट पहचान से जुड़े प्रावधानों को महत्व देती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गिरफ्तारी करने वाले पुलिसकर्मी की पहचान स्पष्ट हो और कार्रवाई की जवाबदेही तय की जा सके।

    गिरफ्तारी के दौरान पुलिस अधिकारी की पहचान दर्ज होना इसलिए भी महत्वपूर्ण है ताकि किसी विवाद या शिकायत की स्थिति में यह पता लगाया जा सके कि कार्रवाई किस अधिकारी ने की थी।

    डी.के. बसु मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश

    पुलिस हिरासत और गिरफ्तारी के मामलों में डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य का फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान पुलिस की जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कई दिशानिर्देश जारी किए थे।

    इनका मकसद गिरफ्तारी के दौरान होने वाले अधिकारों के उल्लंघन को रोकना और यह सुनिश्चित करना था कि पुलिस कार्रवाई की जिम्मेदारी तय की जा सके।

    प्रदर्शन के दौरान नेम प्लेट हटाने का सवाल

    विरोध-प्रदर्शन या संवेदनशील कानून-व्यवस्था की स्थिति में पुलिसकर्मियों की पहचान सार्वजनिक होने को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी सामने आती हैं। अधिकारियों की ओर से कई बार यह तर्क दिया जाता है कि नाम और तस्वीर सार्वजनिक होने के बाद जवानों या उनके परिवारों को ऑनलाइन धमकी, ट्रोलिंग या उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है।

    लेकिन ऐसी परिस्थितियों में भी पहचान छिपाने के लिए अपनाए गए किसी कदम को संबंधित विभागीय नियमों और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुरूप होना जरूरी है।

    सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी कब तैनात हो सकते हैं?

    पुलिस कई परिस्थितियों में सादे कपड़ों में भी काम कर सकती है, खासकर खुफिया जानकारी जुटाने, निगरानी या विशेष अभियानों में। लेकिन सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग जैसी कार्रवाई में पुलिसकर्मियों की पहचान और उनकी जवाबदेही का सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।

    अगर कोई व्यक्ति सादे कपड़ों में पुलिस कार्रवाई का हिस्सा है, तो उसकी पहचान को लेकर स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है। किसी भी बल प्रयोग की वैधता परिस्थितियों, आदेशों और लागू कानूनों पर निर्भर करती है।

    पुलिस की पहचान स्पष्ट होना क्यों जरूरी है?

    कानून-व्यवस्था संभालते समय पुलिस को कई बार बल प्रयोग करना पड़ सकता है, लेकिन ऐसी कार्रवाई भी कानून के दायरे में होनी चाहिए। यदि किसी नागरिक को चोट लगती है या उसे लगता है कि उसके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो शिकायत और जांच के लिए संबंधित पुलिसकर्मियों की पहचान महत्वपूर्ण हो जाती है।

    इसलिए नेम प्लेट का उद्देश्य सिर्फ पुलिसकर्मी को पहचानना नहीं, बल्कि पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखना भी है।

    हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि बिना नेम प्लेट दिखने भर से किसी पुलिसकर्मी की पूरी कार्रवाई स्वतः अवैध नहीं हो जाती। किसी मामले में अंतिम कानूनी स्थिति संबंधित विभागीय नियमों, परिस्थितियों, पुलिसकर्मी की ड्यूटी और लागू कानून के आधार पर तय होती है।

  • इजरायल स्वतंत्रता: दिवस पर क्यों जलाई जाती हैं 12 मशालें? जानिए इस अनोखी परंपरा का इतिहास.

    इजरायल स्वतंत्रता: दिवस पर क्यों जलाई जाती हैं 12 मशालें? जानिए इस अनोखी परंपरा का इतिहास.

    इजरायल स्वतंत्रता: दिवस पर क्यों जलाई जाती हैं 12 मशालें? जानिए इस अनोखी परंपरा का इतिहास.

    यरुशलम: इजरायल के स्वतंत्रता दिवस से जुड़ी एक खास परंपरा दुनिया भर में चर्चा का विषय रहती है। इस दिन यरुशलम स्थित माउंट हर्जल पर 12 प्रतीकात्मक मशालें जलाई जाती हैं। यह समारोह सिर्फ आजादी के जश्न की शुरुआत नहीं माना जाता, बल्कि इजरायल के इतिहास, राष्ट्रीय एकता और उन लोगों के सम्मान से भी जुड़ा है जिन्होंने देश और समाज के लिए उल्लेखनीय योगदान दिया है।

    12 मशालें क्यों जलाई जाती हैं?

    इजरायल के स्वतंत्रता दिवस समारोह में जलाई जाने वाली 12 मशालें प्राचीन इजरायल की 12 जनजातियों का प्रतीक मानी जाती हैं। इनका उद्देश्य देश के इतिहास और विभिन्न समुदायों की एकता को दर्शाना है।

    यह परंपरा 1950 में शुरू हुई थी। मशाल प्रज्ज्वलन समारोह को इजरायल के राष्ट्रीय कैलेंडर में बेहद महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

    स्वतंत्रता दिवस की शुरुआत कैसे होती है?

    इजरायल में स्वतंत्रता दिवस को योम हा’अत्समाउत कहा जाता है। इसका आयोजन हिब्रू कैलेंडर के अनुसार होता है, इसलिए ग्रेगोरियन कैलेंडर में इसकी तारीख हर साल बदलती रहती है।

    स्वतंत्रता दिवस का समारोह योम हाजिकारोन यानी देश के लिए जान गंवाने वाले सैनिकों और आतंकवादी हमलों में मारे गए लोगों की स्मृति के दिन के बाद शुरू होता है। इसी बदलाव के दौरान माउंट हर्जल पर मशाल प्रज्ज्वलन समारोह आयोजित किया जाता है।

    मशाल जलाने का सम्मान किसे मिलता है?

    हर व्यक्ति को इस समारोह में मशाल जलाने का मौका नहीं मिलता। इसके लिए ऐसे लोगों का चयन किया जाता है जिन्होंने सामाजिक सेवा, शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति, कला, मानवता या दूसरे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया हो।

    चुने गए लोग मंच पर आकर अपने संदेश देते हैं और फिर राष्ट्रीय सम्मान के साथ मशाल प्रज्ज्वलित करते हैं। इस वजह से यह सम्मान इजरायल में काफी प्रतिष्ठित माना जाता है।

    इजरायल का स्वतंत्रता दिवस कब शुरू हुआ?

    आधुनिक इजरायल के गठन की घोषणा 14 मई 1948 को डेविड बेन-गुरियन ने तेल अवीव में की थी। इसके बाद इजरायल और अरब देशों के बीच युद्ध शुरू हुआ।

    इजरायल के स्वतंत्रता दिवस की तारीख हिब्रू कैलेंडर पर आधारित होने के कारण हर साल बदलती रहती है। इसलिए अंग्रेजी कैलेंडर में यह पर्व अलग-अलग तारीखों पर पड़ता है।

    इजरायल के बनने की पृष्ठभूमि क्या थी?

    आधुनिक इजरायल की स्थापना से पहले यह क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन ब्रिटिश मैंडेट फॉर फिलिस्तीन का हिस्सा था। 19वीं और 20वीं सदी में यहूदी राष्ट्र की स्थापना के समर्थन में जायोनिस्ट आंदोलन मजबूत हुआ।

    द्वितीय विश्व युद्ध और होलोकॉस्ट के बाद यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और महत्वपूर्ण हो गया। 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन के क्षेत्र में अरब और यहूदी राज्यों के गठन की योजना प्रस्तावित की। इसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदला और मई 1948 में इजरायल ने स्वतंत्रता की घोषणा की।

    भारतीय पायलट को भी मिला था खास सम्मान

    मूल खबर में भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार को स्वतंत्रता दिवस के मशाल समारोह से जोड़कर विशेष निमंत्रण दिए जाने का उल्लेख किया गया है। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी समारोह में शामिल होने का निमंत्रण दिए जाने की बात कही गई है।

    हालांकि, ऐसे समसामयिक निमंत्रण और किसी व्यक्ति को दिए गए सम्मान से जुड़ी जानकारी को संबंधित आधिकारिक स्रोतों से अलग से सत्यापित करना जरूरी है।

    कुल मिलाकर, इजरायल की 12 मशालों की परंपरा सिर्फ रोशनी का कार्यक्रम नहीं है। यह देश के ऐतिहासिक अतीत, 12 प्राचीन जनजातियों की प्रतीकात्मक स्मृति और आधुनिक इजरायल की राष्ट्रीय एकता से जुड़ा महत्वपूर्ण समारोह है।

  • इस गांव में आज भी चलता है ‘राजा’ का राज! अपनी संसद और नियमों के लिए मशहूर है मलाणा, जानिए क्या यहां लागू नहीं होता कानून’

    इस गांव में आज भी चलता है ‘राजा’ का राज! अपनी संसद और नियमों के लिए मशहूर है मलाणा, जानिए क्या यहां लागू नहीं होता कानून’

    इस गांव में आज भी चलता है ‘राजा’ का राज! अपनी संसद और नियमों के लिए मशहूर है मलाणा, जानिए क्या यहां लागू नहीं होता कानून’

    कुल्लू: हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में करीब 12 हजार फीट की ऊंचाई पर बसा मलाणा गांव अपनी अनोखी संस्कृति और सदियों पुरानी सामुदायिक व्यवस्था के लिए जाना जाता है। गांव की सामाजिक व्यवस्था इतनी अलग है कि इसे देखने और समझने के लिए देश-विदेश से लोग पहुंचते हैं। यहां आज भी पारंपरिक संस्थाओं के जरिए कई स्थानीय मामलों का फैसला किया जाता है और देवता जमलू को सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्ता माना जाता है।

    हालांकि, इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि मलाणा भारत के संविधान या कानून से बाहर है। यह भारत का ही हिस्सा है और देश के कानून यहां भी लागू होते हैं। फर्क इतना है कि गांव के कई आंतरिक सामाजिक मामलों को पारंपरिक व्यवस्था के अनुसार सुलझाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।

    अपनी पारंपरिक संसद के लिए मशहूर है मलाणा

    मलाणा की सबसे खास बात इसकी पारंपरिक शासन व्यवस्था है। गांव में सामुदायिक मामलों और विवादों पर चर्चा के लिए पारंपरिक संस्थाएं मौजूद हैं। इन्हें आम तौर पर ज्येष्ठंग और कनिष्ठंग से जोड़कर देखा जाता है।

    इन संस्थाओं के जरिए गांव के अंदर के कई सामाजिक और सामुदायिक मामलों पर सामूहिक निर्णय लेने की परंपरा रही है। इस व्यवस्था की जड़ें काफी पुरानी मानी जाती हैं और यही मलाणा को दूसरे हिमालयी गांवों से अलग पहचान देती है।

    देवता जमलू को माना जाता है सर्वोच्च सत्ता

    मलाणा की सामाजिक व्यवस्था में धार्मिक मान्यताओं का भी महत्वपूर्ण स्थान है। गांव के लोग देवता जमलू को अपना प्रमुख देवता मानते हैं। पारंपरिक मान्यता के अनुसार महत्वपूर्ण मामलों में देवता की इच्छा को सर्वोच्च माना जाता है।

    किसी विवाद का समाधान स्थानीय पारंपरिक व्यवस्था से नहीं निकलने पर धार्मिक रीति-रिवाजों के जरिए निर्णय लेने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। इस तरह यहां की सामाजिक व्यवस्था में धर्म, परंपरा और सामुदायिक निर्णय एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

    क्या मलाणा में भारतीय कानून लागू नहीं होता?

    यह बात अक्सर मलाणा को लेकर कही जाती है, लेकिन इसे सही संदर्भ में समझना जरूरी है। मलाणा भारत की कानूनी व्यवस्था से बाहर नहीं है। भारतीय संविधान और देश के कानून यहां भी लागू होते हैं।

    हां, गांव के अंदर पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था का प्रभाव काफी मजबूत है। समुदाय अपने आंतरिक मामलों में सदियों से चली आ रही परंपराओं का पालन करता आया है। यही वजह है कि मलाणा को अक्सर अपनी अलग सामाजिक और स्वशासन प्रणाली के लिए जाना जाता है।

    बाहरी लोगों के लिए क्यों हैं कड़े नियम?

    मलाणा की अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराएं हैं। गांव में आने वाले पर्यटकों से स्थानीय नियमों का सम्मान करने की अपेक्षा की जाती है। बाहरी लोगों को कई स्थानीय स्थानों, घरों और धार्मिक स्थलों को छूने से मना किया जाता है।

    कुछ पारंपरिक नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने का प्रावधान भी स्थानीय स्तर पर बताया जाता है। इसलिए पर्यटकों के लिए जरूरी है कि वे गांव में स्थानीय लोगों के निर्देशों और निर्धारित नियमों का पालन करें।

    खरीदारी का तरीका भी है अलग

    मलाणा में बाहरी लोगों और स्थानीय निवासियों के बीच लेन-देन को लेकर भी पारंपरिक तरीके का उल्लेख मिलता है। कई जगहों पर पर्यटकों को सामान और पैसे सीधे हाथ में देने के बजाय जमीन पर रखने के लिए कहा जाता है।

    यह परंपरा गांव की सामाजिक मान्यताओं और बाहरी लोगों से बनाए गए पारंपरिक अंतर से जुड़ी हुई मानी जाती है।

    गांव के अंदर ठहरने को लेकर भी नियम

    मलाणा की पारंपरिक व्यवस्था में पर्यटकों के लिए कुछ प्रतिबंध बताए जाते हैं। आम तौर पर पर्यटकों को गांव की पारंपरिक बस्ती के भीतर मनमाने तरीके से रहने की अनुमति नहीं होती। इसलिए यहां जाने वाले लोगों को स्थानीय प्रशासन और समुदाय द्वारा निर्धारित ठहरने की व्यवस्था और नियमों का पालन करना चाहिए।

    सिकंदर से जुड़ी वंशावली की मान्यता

    मलाणा के लोगों के बीच एक प्रसिद्ध स्थानीय मान्यता यह भी है कि वे सिकंदर महान की सेना के साथ भारत आए सैनिकों के वंशज हैं। हालांकि यह मुख्य रूप से स्थानीय ऐतिहासिक परंपरा और मान्यता है, इसे निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

    मलाणा की असली खासियत उसकी अलग भाषा, संस्कृति, धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक सामुदायिक व्यवस्था में है। यही वजह है कि हिमालय की पहाड़ियों में बसा यह छोटा सा गांव आज भी लोगों के लिए रहस्य और आकर्षण का विषय बना हुआ है।

  • मकान में दिखें ये खतरनाक: संकेत तो तुरंत हो जाएं सावधान, घर खाली करने तक की आ सकती है नौबत.

    मकान में दिखें ये खतरनाक: संकेत तो तुरंत हो जाएं सावधान, घर खाली करने तक की आ सकती है नौबत.

    मकान में दिखें ये खतरनाक: संकेत तो तुरंत हो जाएं सावधान, घर खाली करने तक की आ सकती है नौबत.

    नई दिल्ली: मकान अचानक गिरने की घटनाएं बेहद खतरनाक होती हैं, लेकिन कई मामलों में इमारत ढहने से पहले उसके ढांचे में कुछ बदलाव नजर आने लगते हैं। दरवाजों का अचानक फंसना, फर्श का झुकना, बीम-पिलर में गंभीर दरारें, सरिया का बाहर दिखाई देना और लंबे समय तक बनी सीलन जैसे संकेतों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।

    जरूरी नहीं कि केवल बहुत पुराने मकान ही कमजोर हों। निर्माण की खराब गुणवत्ता, नींव की समस्या, पानी का लगातार रिसाव, जमीन का धंसना या इमारत के ढांचे में बिना विशेषज्ञ सलाह के बदलाव भी भवन की मजबूती को प्रभावित कर सकते हैं।

    दरवाजे और खिड़कियां अचानक फंसने लगें

    अगर पहले आसानी से खुलने-बंद होने वाले दरवाजे अचानक चौखट में फंसने लगें या खिड़कियों के फ्रेम टेढ़े नजर आने लगें, तो इस बदलाव पर ध्यान देना चाहिए। हालांकि मौसम की नमी या लकड़ी के फूलने से भी ऐसी समस्या हो सकती है, लेकिन अगर इसके साथ दीवारों या फर्श में नई दरारें भी दिखाई दे रही हैं, तो भवन की तकनीकी जांच कराना जरूरी है।

    फर्श में झुकाव या टाइलों में बदलाव

    घर का फर्श अचानक एक तरफ झुका हुआ महसूस हो या टाइलें टूटकर ऊपर उठने लगें, तो इसे सामान्य समस्या मानकर छोड़ना ठीक नहीं है। खासकर अगर इसके साथ दीवारों में तिरछी दरारें या दरवाजों के फ्रेम में बदलाव भी दिखाई दे रहा हो, तो नींव और जमीन की स्थिति की जांच जरूरी हो सकती है।

    बीम-पिलर में गहरी दरार और सरिया दिखना

    बीम और पिलर इमारत के महत्वपूर्ण संरचनात्मक हिस्से होते हैं। इनमें गहरी या बढ़ती हुई दरारें दिखाई दें, कंक्रीट टूटकर गिरने लगे या अंदर की सरिया बाहर नजर आने लगे तो विशेषज्ञ से तत्काल जांच करानी चाहिए।

    अगर सरिया में जंग दिखाई दे रही है या पिलर और दीवार के बीच असामान्य गैप बन गया है, तो केवल पुट्टी या सीमेंट लगाकर उसे छिपाना सही तरीका नहीं है। ऐसी स्थिति में स्ट्रक्चरल इंजीनियर से भवन की मजबूती का आकलन कराना चाहिए।

    नींव के आसपास जमीन धंसने लगे

    मकान की नींव के आसपास की जमीन अचानक बैठने लगे, बाउंड्री के पास मिट्टी धंसती दिखाई दे या नींव की दीवारों में नई दरारें बनने लगें, तो इसकी वजह पानी का रिसाव, खराब ड्रेनेज या जमीन से जुड़ी दूसरी समस्या हो सकती है।

    ऐसे बदलाव लगातार बढ़ रहे हों तो विशेषज्ञ से जांच कराना जरूरी है, क्योंकि नींव की समस्या पूरे ढांचे की स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।

    लगातार सीलन और कंक्रीट का टूटना

    दीवारों और छत में लंबे समय तक रहने वाली सीलन को सिर्फ खूबसूरती से जुड़ी समस्या समझना ठीक नहीं है। पानी का लगातार प्रवेश कंक्रीट और उसमें मौजूद स्टील को नुकसान पहुंचा सकता है। स्टील में जंग लगने से वह फैल सकता है और आसपास के कंक्रीट में दरारें पैदा हो सकती हैं।

    इसलिए छत से पानी टपकना, कंक्रीट का झड़ना, प्लास्टर का लगातार उखड़ना या सरिया दिखाई देना जैसी समस्याओं की वजह का पता लगाना जरूरी है।

    कब तुरंत मकान खाली करना चाहिए?

    अगर किसी इमारत में तेजी से बढ़ती संरचनात्मक दरारें, छत या फर्श का स्पष्ट झुकाव, पिलर या बीम का गंभीर क्षतिग्रस्त होना, कंक्रीट का बड़े हिस्से में गिरना या इमारत के एक तरफ झुकने जैसे स्पष्ट संकेत दिखाई दें, तो वहां रहना जोखिम भरा हो सकता है।

    ऐसी स्थिति में लोगों को सुरक्षित स्थान पर जाना चाहिए और स्थानीय प्रशासन या योग्य स्ट्रक्चरल इंजीनियर से तत्काल संपर्क करना चाहिए। यदि इमारत अचानक अस्थिर लग रही हो, तो खुद जांच करने या क्षतिग्रस्त हिस्से के नीचे जाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

    हर दरार का मतलब यह नहीं होता कि मकान तुरंत गिरने वाला है। लेकिन नई, बढ़ती हुई या संरचनात्मक हिस्सों में दिखाई देने वाली दरारों को नजरअंदाज भी नहीं करना चाहिए। समय पर विशेषज्ञ से जांच कराना किसी बड़े हादसे को रोकने में मदद कर सकता है।