
पितृपक्ष के दौरान देशभर में लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति और मुक्ति की कामना से श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। इस बीच वाराणसी के प्रसिद्ध पिशाचमोचन तीर्थ पर ऑनलाइन श्राद्ध और पिंडदान को लेकर बड़ा फैसला सामने आया है। यहां ऑनलाइन माध्यम से श्राद्ध, तर्पण या अन्य पितृ कर्मकांड कराने का विरोध किया जा रहा है।
तीर्थ से जुड़े लोगों का कहना है कि यहां होने वाले पितृ कर्मकांड श्रद्धालुओं को स्वयं उपस्थित होकर विधि-विधान से करने चाहिए। आखिर ऑनलाइन श्राद्ध का विरोध क्यों किया जा रहा है और पिशाचमोचन तीर्थ का धार्मिक महत्व क्या है, आइए जानते हैं।
अकाल मृत्यु से जुड़ी है पिशाचमोचन तीर्थ की मान्यता
वाराणसी का पिशाचमोचन तीर्थ प्राचीन श्राद्ध और पिंडदान स्थलों में शामिल माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जिन लोगों की अकाल मृत्यु हो जाती है, उनकी आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए यहां त्रिपिंडी श्राद्ध सहित कई तरह के कर्मकांड किए जाते हैं।
पिशाचमोचन कुंड को भी धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है और ऐसी मान्यता है कि यहां किए जाने वाले पितृ कर्मों से पूर्वजों की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है।
इसी धार्मिक विश्वास के चलते पितृपक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और अपने दिवंगत परिजनों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं।
महंत ने ऑनलाइन श्राद्ध का किया विरोध
पिशाचमोचन तीर्थ के महंत नीरज पांडेय के मुताबिक, यहां श्राद्ध, तर्पण, त्रिपिंडी श्राद्ध, पिंडदान और नारायण बलि जैसे कर्मकांडों की विशेष धार्मिक परंपरा है।

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