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  • सिंधु जल समझौता स्थगित, फिर भी पाकिस्तान की ओर बहता पानी तुरंत क्यों नहीं रोका जा सकता? समझिए पूरी वजह.

    सिंधु जल समझौता स्थगित, फिर भी पाकिस्तान की ओर बहता पानी तुरंत क्यों नहीं रोका जा सकता? समझिए पूरी वजह.

    सिंधु जल समझौता स्थगित, फिर भी पाकिस्तान की ओर बहता पानी तुरंत क्यों नहीं रोका जा सकता? समझिए पूरी वजह.

    भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद 1960 के सिंधु जल समझौते को तत्काल प्रभाव से स्थगित यानी abeyance में रखने का फैसला किया था। भारत ने यह कदम तब तक जारी रखने की बात कही है, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को लेकर विश्वसनीय और स्थायी कदम नहीं उठाता।

    लेकिन इसके बाद एक सवाल लगातार उठता रहा है कि अगर समझौता स्थगित हो चुका है, तो भारत पाकिस्तान की ओर बहने वाली पश्चिमी नदियों का पानी पूरी तरह रोक क्यों नहीं देता? इसकी सबसे बड़ी वजह है जल भंडारण और नदी के बहाव को नियंत्रित करने वाला पर्याप्त बुनियादी ढांचा।

    दरअसल, किसी अंतरराष्ट्रीय जल समझौते को स्थगित कर देना और किसी विशाल नदी के पानी को तुरंत रोक देना दो अलग-अलग चीजें हैं।

    पहलगाम हमले के बाद भारत ने क्या फैसला लिया?

    22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। इसके अगले दिन भारत सरकार ने कई कड़े कदमों के साथ सिंधु जल समझौते को तत्काल प्रभाव से स्थगित करने का निर्णय लिया। सरकार ने कहा था कि यह स्थिति तब तक जारी रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन से विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय रूप से पीछे नहीं हटता।

    विदेश मंत्रालय ने भी मई 2025 में स्पष्ट किया था कि सिंधु जल समझौता फिलहाल abeyance में है।

    यहां यह समझना जरूरी है कि इसे सीधे तौर पर “भारत ने संधि रद्द कर दी” कहना पूरी तरह सटीक नहीं है। आधिकारिक भाषा में भारत ने समझौते को स्थगित रखा है।

    सिंधु जल समझौते में नदियों का बंटवारा कैसे हुआ था?

    1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मदद से सिंधु जल समझौता हुआ था। इसके तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया।

    पूर्वी नदियां — रावी, ब्यास और सतलुज

    इन नदियों के पानी के इस्तेमाल का अधिकार मुख्य रूप से भारत को दिया गया। विश्व बैंक के दस्तावेज के अनुसार इन तीन नदियों का औसत वार्षिक प्रवाह लगभग 33 मिलियन एकड़-फीट यानी 33 MAF था।

    पश्चिमी नदियां — सिंधु, झेलम और चिनाब

    इन नदियों के पानी का अधिकांश हिस्सा पाकिस्तान के इस्तेमाल के लिए निर्धारित किया गया। हालांकि, संधि में भारत को भी इन नदियों पर कुछ सीमित अधिकार दिए गए थे।

    भारत को घरेलू उपयोग, सीमित कृषि और पनबिजली उत्पादन के साथ-साथ पश्चिमी नदियों पर निर्धारित सीमा के भीतर पानी स्टोर करने की अनुमति थी। कुल स्टोरेज की सीमा 3.6 MAF रखी गई थी।

    फिर भारत तुरंत पाकिस्तान का पानी क्यों नहीं रोक सकता?

    यही इस पूरे मामले की सबसे अहम बात है।

    नदी का पानी किसी पाइप या नल की तरह नहीं है, जिसे एक आदेश देकर तुरंत बंद किया जा सके। पानी को रोकने के लिए बड़े बांध, जलाशय, बैराज, सुरंगें और दूसरी जल परियोजनाएं चाहिए होती हैं।

    विशेष रूप से सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी नदियों का प्रवाह बहुत बड़ा है। इन नदियों में हिमपिघलन और बारिश के कारण मौसम के अनुसार पानी की मात्रा काफी बदलती रहती है।

    इसलिए यदि भारत को इन नदियों के पानी का बड़ा हिस्सा अपने इस्तेमाल के लिए रोकना या मोड़ना है, तो उसके लिए बड़े पैमाने पर स्टोरेज और डायवर्जन इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा।

    3.6 MAF की सीमा भी क्यों महत्वपूर्ण है?

    1960 की संधि में भारत के लिए पश्चिमी नदियों पर कुल 3.6 MAF स्टोरेज की अनुमति का प्रावधान था।

    इसमें अलग-अलग उद्देश्यों के लिए स्टोरेज शामिल था। उपलब्ध सरकारी दस्तावेज के अनुसार 3.6 MAF में सामान्य स्टोरेज, पनबिजली से संबंधित स्टोरेज और बाढ़ नियंत्रण से जुड़ी क्षमता शामिल थी।

    इसका मतलब यह है कि संधि के दौरान भी भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ मात्रा में पानी नियंत्रित करने की अनुमति थी। लेकिन इस क्षमता का इस्तेमाल करने के लिए भी बड़े स्तर पर परियोजनाओं की जरूरत थी।

    यही कारण है कि समझौते के स्थगित होने के बाद भी पानी को तुरंत रोक देना तकनीकी रूप से संभव नहीं हो जाता।

    बड़े बांध और जलाशय बनाने में क्यों लगता है लंबा समय?

    किसी बड़ी नदी पर जल परियोजना बनाना बेहद जटिल प्रक्रिया है।

    सबसे पहले जमीन और नदी घाटी का सर्वे किया जाता है। इसके बाद परियोजना की तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता देखी जाती है। फिर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, पर्यावरणीय मंजूरियां, भूमि से जुड़े मामलों और वित्तीय स्वीकृतियों जैसी प्रक्रियाएं होती हैं।

    इसके बाद बांध, सुरंग, पावरहाउस, जलाशय और संबंधित नहरों का निर्माण शुरू होता है।

    इतनी बड़ी परियोजनाओं को पूरा होने में कई साल लग सकते हैं। इसलिए 2025 में लिया गया राजनीतिक और कूटनीतिक फैसला अपने आप में अगले ही दिन बड़े पैमाने पर जल भंडारण क्षमता में नहीं बदल सकता।

    गर्मियों और मानसून में सबसे बड़ी चुनौती

    चिनाब, झेलम और सिंधु जैसी नदियों का पानी सालभर एक जैसा नहीं रहता।

    हिमालयी क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान बर्फ पिघलने से नदियों में प्रवाह बढ़ता है। मानसून के दौरान बारिश के कारण इसमें और वृद्धि हो सकती है।

    ऐसे समय में पानी की बड़ी मात्रा को रोकने के लिए विशाल जलाशयों की जरूरत होती है। केवल छोटे बांध या रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएं इतनी बड़ी मात्रा में पानी को लंबे समय तक जमा करने का विकल्प नहीं बन सकतीं।

    यही वजह है कि संधि स्थगित करना और पानी का भौतिक नियंत्रण हासिल करना दो अलग-अलग चरण हैं।

    क्या भारत अब अपनी जल परियोजनाएं तेजी से आगे बढ़ा सकता है?

    संधि को abeyance में रखने के बाद भारत के सामने पश्चिमी नदियों पर अपने जल संसाधनों के उपयोग को बढ़ाने का अवसर जरूर बढ़ा है। सरकार ने भी लंबे समय से अटकी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग पर जोर दिया है।

    जल शक्ति मंत्रालय से जुड़े दस्तावेजों में भी पश्चिमी नदियों से संबंधित परियोजनाओं और जल भंडारण क्षमता बढ़ाने की दिशा में काम का उल्लेख मिलता है।

    हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत रातोंरात पाकिस्तान की ओर जाने वाला पूरा पानी रोक सकता है।

    इसके लिए नई परियोजनाओं का निर्माण, मौजूदा ढांचे का विस्तार और नदी के पानी को स्टोर या डायवर्ट करने की पर्याप्त क्षमता विकसित करना जरूरी होगा।

    आसान भाषा में समझें पूरा मामला

    अगर किसी नदी में हर साल बहुत बड़ी मात्रा में पानी बहता है और उसे रोकने के लिए आपके पास पर्याप्त बड़ा जलाशय नहीं है, तो केवल सरकारी आदेश जारी करके उस पानी को जमा नहीं किया जा सकता।

    सिंधु जल समझौते का स्थगन भारत को जल संसाधनों के इस्तेमाल के मामले में नई नीति और परियोजनाओं की दिशा में आगे बढ़ने का आधार देता है, लेकिन पानी को जमीन पर रोकने के लिए बांध, जलाशय और दूसरी परियोजनाएं बनाना जरूरी है।

    इसीलिए समझौता स्थगित होने के बावजूद पाकिस्तान की ओर पानी का बहाव तुरंत पूरी तरह बंद दिखाई नहीं देता। असली चुनौती अब जल कूटनीति से आगे बढ़कर जल भंडारण और बुनियादी ढांचे की क्षमता तैयार करने की है।

  • सिमडेगा: जमीन विवाद में देवर की हत्या की आरोपी महिला गिरफ्तार, चार आरोपी पहले ही जा चुके हैं जेल’

    सिमडेगा: जमीन विवाद में देवर की हत्या की आरोपी महिला गिरफ्तार, चार आरोपी पहले ही जा चुके हैं जेल’

    सिमडेगा: जमीन विवाद में देवर की हत्या की आरोपी महिला गिरफ्तार, चार आरोपी पहले ही जा चुके हैं जेल’

    बोलबा थाना क्षेत्र के पालेमुंडा कुम्हारटोली में जमीन विवाद को लेकर हुई हत्या के मामले में फरार चल रही महिला प्राथमिकी अभियुक्त को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने गुरुवार को सलडेगा टोंगरीटोली, सिमडेगा से सुकरमुनी देवी (50), पति बसंत महतो, निवासी पालेमुंडा कुम्हारटोली को पकड़ा। गिरफ्तार आरोपित को न्यायिक हिरासत में भेजने की कार्रवाई की जा रही है।

    पुलिस के अनुसार बीते 25 जुलाई को पालेमुंडा कुम्हारटोली में जमीन विवाद को लेकर दो भाइयों के बीच लंबे समय से आपसी रंजिश चल रही थी। इसी विवाद में बड़े भाई बसंत महतो (58) ने अपने बेटों के साथ मिलकर छोटे भाई भुनेश्वर महतो (58) पर चाकू और तलवार से हमला कर दिया था। हमले में भुनेश्वर महतो की मौत हो गई थी।

    गिरफ्तारी के लिए टीम गठित कर छापेमारी

    पुलिस उपाधीक्षक रणवीर सिंह ने बताया कि इस मामले में मृतक के पुत्र परशुराम महतो के लिखित आवेदन पर बोलबा थाना कांड संख्या 17/26, दिनांक 25 जुलाई 2026 को बीएनएस की धारा 103(1)/3(5) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। घटना के बाद पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए टीम गठित कर छापेमारी शुरू की गई थी।

    डीएसपी ने कहा कि पूर्व में चार आरोपितों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका है। वहीं फरार आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए लगातार छापेमारी की जा रही थी। इसी क्रम में गुरुवार को पुलिस को सफलता मिली और महिला आरोपित सुकरमुनी देवी को गिरफ्तार कर लिया गया।

  • किन देशों को बिजली सप्लाई करता है भारत…

    किन देशों को बिजली सप्लाई करता है भारत…

    किन देशों को बिजली सप्लाई करता है भारत…

    भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ सिर्फ व्यापार और परिवहन के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि बिजली के मामले में भी सहयोग करता है। सीमा पार ट्रांसमिशन नेटवर्क के जरिए भारत कई देशों को बिजली की आपूर्ति करता है। इनमें नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार प्रमुख हैं।

    अब नेपाल एक बार फिर अपनी बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए भारत से बड़ी मात्रा में बिजली खरीदने जा रहा है। नेपाल की कई पनबिजली परियोजनाओं को हाल में आई आपदा से नुकसान पहुंचा है। इसके कारण वहां बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ है और परियोजनाओं की मरम्मत के दौरान अतिरिक्त बिजली की जरूरत पड़ रही है।

    रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल दिसंबर 2026 से मई 2027 के बीच भारत से जरूरत के अनुसार 1100 मेगावाट तक बिजली आयात करने की योजना बना रहा है।

    भारत नेपाल को क्यों दे रहा है अतिरिक्त बिजली?

    नेपाल की बिजली व्यवस्था में हाइड्रोपावर की बड़ी भूमिका है। देश में बिजली उत्पादन के लिए नदियों और जलविद्युत परियोजनाओं पर काफी निर्भरता है।

    सर्दियों में कई नदियों में पानी का बहाव कम हो जाता है, जिससे हाइड्रोपावर प्लांट का उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा हाल की प्राकृतिक आपदा में कुछ पनबिजली परियोजनाओं को नुकसान पहुंचने से स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो गई है।

    ऐसे समय में भारत से बिजली आयात करके नेपाल अपनी घरेलू जरूरत पूरी करने की कोशिश कर रहा है।

    भारत अभी कितनी बिजली देने की मंजूरी दे चुका है?

    नेपाल की तत्काल जरूरत को देखते हुए भारत ने प्रतिदिन 18 घंटे तक बिजली आपूर्ति की अनुमति दी है। जरूरत के हिसाब से यह सप्लाई करीब 654 मेगावाट से बढ़कर 1100 मेगावाट तक जा सकती है।

    इसका मतलब यह नहीं है कि 1100 मेगावाट बिजली पूरे समय एक समान मात्रा में सप्लाई होगी। वास्तविक आपूर्ति नेपाल की मांग, उपलब्धता और तय व्यवस्था पर निर्भर करेगी।

    भारत नेपाल को किस भाव पर बिजली बेचता है?

    नेपाल को मिलने वाली बिजली की दर ट्रांसमिशन लाइन के वोल्टेज स्तर के अनुसार अलग-अलग रखी गई है।

    132 kV ट्रांसमिशन लाइन: NPR 8.22 प्रति यूनिट

    33 kV ट्रांसमिशन लाइन: NPR 8.91 प्रति यूनिट

    11 kV ट्रांसमिशन लाइन: NPR 9.55 प्रति यूनिट

    यहां NPR का मतलब नेपाली रुपया है।

    यानी जिस ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए बिजली नेपाल तक पहुंचाई जाएगी, उसके हिसाब से दर लागू होगी। दी गई तीन दरों में 132 kV लाइन की कीमत सबसे कम और 11 kV लाइन की कीमत सबसे ज्यादा है।

    क्या बाजार के हिसाब से बिजली की कीमत बदल सकती है?

    हां, बिजली व्यापार में बाजार की स्थिति का भी असर पड़ सकता है। खासकर जब अतिरिक्त बिजली की जरूरत अचानक बढ़ती है या बिजली की मांग में बड़ा बदलाव आता है, तब एक्सचेंज के जरिए खरीदी जाने वाली बिजली की कीमत अलग हो सकती है।

    कुछ परिस्थितियों में भारतीय पावर एक्सचेंज से मिलने वाली बिजली की औसत कीमत करीब NPR 11 प्रति यूनिट तक पहुंचने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। इसलिए तय ट्रांसमिशन दर और बाजार से खरीदी जाने वाली बिजली की कीमत को एक ही चीज नहीं माना जाना चाहिए।

    भारत किन-किन देशों को बिजली देता है?

    भारत सीमा पार बिजली व्यापार के जरिए अपने कई पड़ोसी देशों के साथ बिजली का आदान-प्रदान करता है।

    इनमें मुख्य रूप से:

    • नेपाल
    • बांग्लादेश
    • भूटान
    • म्यांमार

    शामिल हैं।

    इन देशों के साथ अलग-अलग ट्रांसमिशन लाइनों और बिजली व्यापार व्यवस्थाओं के जरिए बिजली का कारोबार होता है।

    बांग्लादेश को भी भारत देता है बिजली

    भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से सीमा पार बिजली व्यापार चल रहा है। दोनों देशों के बिजली ग्रिड आपस में जुड़े हुए हैं, जिसके जरिए भारत से बांग्लादेश को बिजली पहुंचाई जाती है।

    इसके अलावा भारत के ट्रांसमिशन नेटवर्क की मदद से नेपाल में पैदा होने वाली बिजली को भी क्षेत्रीय बिजली व्यापार के तहत बांग्लादेश तक पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की गई है।

    इस तरह भारत का बिजली ग्रिड सिर्फ भारत और उसके किसी एक पड़ोसी देश के बीच व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग में भी भूमिका निभाता है।

    भूटान और म्यांमार के साथ भी बिजली कारोबार

    भारत का भूटान और म्यांमार के साथ भी सीमा पार बिजली व्यापार होता है। दोनों देशों के साथ बिजली ट्रांसमिशन और ग्रिड कनेक्टिविटी की व्यवस्थाएं मौजूद हैं।

    भूटान के मामले में बिजली व्यापार दोनों दिशाओं में हो सकता है। भूटान अपनी हाइड्रोपावर परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली भारत को देता है, जबकि जरूरत पड़ने पर भारत से बिजली भी खरीद सकता है।

    नेपाल के लिए भारत की बिजली क्यों महत्वपूर्ण है?

    नेपाल के लिए भारत से बिजली खरीदने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जब घरेलू उत्पादन कम होता है, तब अतिरिक्त बिजली उपलब्ध कराई जा सकती है।

    खासकर सर्दियों में जब नदियों का जलस्तर कम होने से हाइड्रोपावर उत्पादन प्रभावित हो सकता है, तब आयातित बिजली नेपाल की मांग पूरी करने में मदद कर सकती है।

    वहीं, क्षतिग्रस्त पनबिजली परियोजनाओं की मरम्मत के दौरान भारत से मिलने वाली बिजली वहां की बिजली व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव को कम कर सकती है।

    भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है सीमा पार बिजली व्यापार

    भारत के लिए पड़ोसी देशों के साथ बिजली कारोबार क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग का हिस्सा है। इससे अतिरिक्त बिजली के लिए नए बाजार मिलते हैं और पड़ोसी देशों के साथ बिजली ग्रिड की कनेक्टिविटी मजबूत होती है।

    नेपाल के मामले में तस्वीर खास तौर पर दिलचस्प है, क्योंकि दोनों देशों के बीच बिजली का व्यापार सिर्फ एकतरफा नहीं है। परिस्थितियों के अनुसार नेपाल भारत से बिजली खरीदता है और नेपाल की जलविद्युत परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली का निर्यात भी भारत की दिशा में किया जाता है।

    यानी आने वाले समय में भारत और नेपाल के बीच बिजली व्यापार सिर्फ जरूरत के समय बिजली खरीदने-बेचने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्रीय ऊर्जा नेटवर्क और सीमा पार बिजली बाजार के विस्तार में भी इसकी भूमिका बढ़ सकती है।

  • दिल्ली में लापता ‘बाउंसर’ अजय डेढ़ा की हत्या? नाले से शव बरामद; ऑटो ड्राइवर पर शक’

    दिल्ली में लापता ‘बाउंसर’ अजय डेढ़ा की हत्या? नाले से शव बरामद; ऑटो ड्राइवर पर शक’

    दिल्ली में लापता ‘बाउंसर’ अजय डेढ़ा की हत्या? नाले से शव बरामद; ऑटो ड्राइवर पर शक’

    पूर्वी दिल्ली में चिल्ला गांव से 24 सितंबर से लापता बाउंसर का शव पटपड़गंज औद्योगिक थाना क्षेत्र स्थित नाले से मिला है। मृतक के शरीर पर चाकू के निशान मिले हैं। इससे हत्या की आशंका जताई जा रही है।

    वहीं, मृतक की पहचान अजय डेढ़ा के रूप में हुई है। पुलिस ने शव को पोस्टमॉर्टम के लिए लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल की मोर्चरी में रखवाया है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद मौत के कारणों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

    चिल्ला गांव में रहते थे

    अजय डेढ़ा चिल्ला गांव में पत्नी और दो बच्चों के साथ रहते थे। वह नोएडा के एक बिल्डर के यहां बाउंसर के तौर पर काम करते थे।

    परिजनों ने दर्ज कराई थी गुमशुदगी

    परिजनों के अनुसार, 24 सितंबर की रात ड्यूटी खत्म करने के बाद अजय ऑटो से घर लौट रहे थे। रास्ते में उन्होंने पत्नी को अपनी और ऑटो की फोटो भेजी थी। इसके कुछ देर बाद पत्नी ने उन्हें फोन किया, लेकिन मोबाइल बंद मिला। काफी तलाश के बाद भी उनका पता नहीं चलने पर परिजनों ने पटपड़गंज थाने में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई।

    1 अक्टूबर को पुलिस ने परिजनों को सूचना दी कि अजय का शव नाले से बरामद हुआ है। शव मिलने की जानकारी के बाद परिवार में कोहराम मच गया। परिजनों ने अजय को घर छोड़ने वाले ऑटो चालक पर हत्या का शक जताया है।

    पुलिस आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालने के साथ ही ऑटो चालक समेत अन्य लोगों से पूछताछ कर रही है।

  • पाकिस्तान का लंबा: चक्कर छोड़ चीन के होटन एयर रूट की जरूरत क्यों पड़ी, भारत को क्या होगा फायदा?

    पाकिस्तान का लंबा: चक्कर छोड़ चीन के होटन एयर रूट की जरूरत क्यों पड़ी, भारत को क्या होगा फायदा?

    पाकिस्तान का लंबा: चक्कर छोड़ चीन के होटन एयर रूट की जरूरत क्यों पड़ी, भारत को क्या होगा फायदा?

    भारत और पाकिस्तान के बीच हवाई क्षेत्र को लेकर जारी पाबंदियों का असर अब भारतीय एयरलाइंस की अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान का एयरस्पेस भारतीय विमानों के लिए बंद होने के कारण यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाली कई उड़ानों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है।

    इसी समस्या का विकल्प तलाशते हुए भारत अब चीन के शिनजियांग क्षेत्र में स्थित होटन के ऊपर से संभावित एयर कॉरिडोर को लेकर बातचीत कर रहा है। नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने सितंबर 2026 में बताया कि दोनों देशों के बीच इस रूट को लेकर चर्चा चल रही है और विदेश मंत्रालय इस मामले में चीन के साथ संपर्क में है। अभी इस रूट को लेकर कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है।

    अगर भविष्य में इस कॉरिडोर को मंजूरी मिलती है, तो कुछ पश्चिमी देशों के लिए जाने वाली भारतीय उड़ानों को मौजूदा लंबे दक्षिणी रास्ते की तुलना में छोटा विकल्प मिल सकता है।

    पाकिस्तान का एयरस्पेस बंद होने से क्या बदला?

    अप्रैल 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ने के बाद पाकिस्तान ने भारतीय पंजीकृत और भारतीय एयरलाइंस द्वारा संचालित विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया था। इस प्रतिबंध को कई बार बढ़ाया गया है और मौजूदा NOTAM के अनुसार यह 24 अक्टूबर 2026 तक लागू है।

    इसके कारण दिल्ली, मुंबई और उत्तर-पश्चिम भारत से यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका जाने वाली उड़ानों को पाकिस्तान के ऊपर से गुजरने के बजाय वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

    कई उड़ानों को अरब सागर और ओमान की दिशा में लंबा चक्कर लगाना पड़ता है। रूट के आधार पर उड़ान का समय करीब 45 मिनट से लेकर 2 घंटे तक बढ़ सकता है।

    लंबा रास्ता यानी ज्यादा ईंधन और ज्यादा खर्च

    विमान जितनी देर तक हवा में रहेगा, उतना ही ज्यादा ईंधन खर्च होगा। लंबी उड़ान का असर सिर्फ ईंधन पर नहीं पड़ता, बल्कि विमान के इस्तेमाल का समय, चालक दल की ड्यूटी और परिचालन लागत भी बढ़ सकती है।

    लंबे रूट का एक और असर यह है कि एक विमान को अपनी यात्रा पूरी करने में ज्यादा समय लगता है। इससे उसी विमान को अगली उड़ान के लिए उपलब्ध कराने में भी अधिक समय लग सकता है।

    यानी एयरस्पेस बंद होने का असर सिर्फ एक उड़ान के अतिरिक्त किलोमीटर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी एयरलाइन के ऑपरेशन पर पड़ सकता है।

    एयर इंडिया को कितना नुकसान हुआ?

    पाकिस्तानी एयरस्पेस बंद होने का आर्थिक असर एयर इंडिया पर विशेष रूप से पड़ा है, क्योंकि कंपनी दिल्ली और मुंबई से यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका के लिए बड़ी संख्या में लंबी दूरी की उड़ानें संचालित करती है।

    एयर इंडिया के पूर्व सीईओ कैंपबेल विल्सन ने 2025 में अनुमान लगाया था कि पाकिस्तान के एयरस्पेस प्रतिबंध के कारण एयरलाइन को एक साल में करीब 4,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त नुकसान हुआ। यह आंकड़ा उस समय का अनुमान था, इसलिए इसे मौजूदा साल का निश्चित नुकसान नहीं माना जाना चाहिए।

    क्या है चीन के होटन एयर रूट का प्रस्ताव?

    भारत जिस विकल्प पर बातचीत कर रहा है, उसमें दिल्ली और मुंबई जैसी जगहों से पश्चिम की ओर जाने वाली कुछ उड़ानों को उत्तर दिशा में ले जाकर लद्दाख के आसपास से चीन के शिनजियांग क्षेत्र में प्रवेश कराने की संभावना है।

    प्रस्तावित रूट में विमान होटन के आसपास के चीनी हवाई क्षेत्र से गुजरकर किर्गिस्तान और मध्य एशिया की ओर बढ़ सकते हैं। इसके बाद वे यूरोप, ब्रिटेन और उत्तरी अमेरिका जाने वाले मौजूदा अंतरराष्ट्रीय एयर रूट से जुड़ सकते हैं।

    इसका फायदा यह हो सकता है कि कुछ उड़ानों को अरब सागर और ओमान की तरफ लंबा दक्षिणी चक्कर न लगाना पड़े।

    भारत को इससे क्या फायदा हो सकता है?

    अगर चीन इस एयर कॉरिडोर को मंजूरी देता है और सभी तकनीकी व्यवस्थाएं तैयार हो जाती हैं, तो संभावित फायदे कई स्तर पर हो सकते हैं।

    पहला फायदा—समय की बचत। कुछ पश्चिमी गंतव्यों के लिए उड़ान का रास्ता छोटा हो सकता है।

    दूसरा—ईंधन की बचत। कम दूरी का मतलब कुछ मार्गों पर कम ईंधन खपत हो सकती है।

    तीसरा—परिचालन लागत में कमी। कम उड़ान समय से विमान और चालक दल के इस्तेमाल की लागत पर असर पड़ सकता है।

    चौथा—विमान के बेहतर इस्तेमाल की संभावना। अगर लंबी दूरी और उड़ान समय कम होता है, तो एयरलाइन अपने विमान को अधिक कुशलता से शेड्यूल कर सकती है।

    होटन रूट से जॉर्जिया, बाकू, मध्य एशिया और उत्तरी यूरोप जैसे कुछ गंतव्यों के लिए विशेष रूप से समय और लागत में बचत की संभावना बताई गई है।

    लेकिन चीन का रास्ता इतना आसान भी नहीं

    होटन एयर कॉरिडोर को लेकर सबसे बड़ी बात यह है कि यह अभी सिर्फ बातचीत और संभावित विकल्प के स्तर पर है। चीन की अनुमति के बिना भारतीय विमान उसके हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं कर सकते।

    इसके अलावा शिनजियांग का भौगोलिक क्षेत्र भी चुनौतीपूर्ण है। आसपास ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र हैं और आपात स्थिति में विमानों को सुरक्षित रूप से नीचे उतरने के लिए पर्याप्त वैकल्पिक रास्तों तथा हवाई अड्डों की जरूरत होती है।

    इसलिए किसी भी नए कॉरिडोर को शुरू करने से पहले एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट, सुरक्षा, आपातकालीन डायवर्जन और चीन के नागरिक एवं अन्य संबंधित हवाई प्राधिकरणों के साथ समन्वय जैसे मुद्दों पर विस्तृत व्यवस्था करनी होगी।

    क्या यह पाकिस्तान वाले रास्ते की पूरी भरपाई कर देगा?

    जरूरी नहीं। होटन कॉरिडोर अगर शुरू भी होता है तो उसका फायदा हर अंतरराष्ट्रीय रूट को समान रूप से नहीं मिलेगा। अलग-अलग गंतव्यों के लिए दूरी, मौसम, हवाई क्षेत्र की अनुमति और उपलब्ध एयर रूट अलग हो सकते हैं।

    फिर भी भारत के लिए यह एक अतिरिक्त विकल्प बन सकता है। अभी पाकिस्तान का एयरस्पेस बंद होने के कारण जिन उड़ानों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है, उनके लिए कोई छोटा वैकल्पिक कॉरिडोर परिचालन लागत और उड़ान समय को कम करने में मदद कर सकता है।

    फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि भारत और चीन के बीच होटन रूट को लेकर बातचीत जारी है, लेकिन इस रास्ते को खोलने की कोई अंतिम तारीख या समझौता घोषित नहीं हुआ है।

    अगर सहमति बनती है, तो यह भारत की यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाली कुछ उड़ानों के लिए पाकिस्तान के एयरस्पेस बंद होने के बीच एक नया विकल्प बन सकता है।

  • बंगाल: जिस मां ने जन्म दिया, कलयुगी संतान ने उसी का गला घोंटकर की हत्या

    बंगाल: जिस मां ने जन्म दिया, कलयुगी संतान ने उसी का गला घोंटकर की हत्या

    बंगाल: जिस मां ने जन्म दिया, कलयुगी संतान ने उसी का गला घोंटकर की हत्या

    सिलीगुड़ी। मां-बेटे के पवित्र रिश्ते को तार-तार करने वाली सनसनीखेज घटना माटीगाड़ा ब्लॉक के पत्थरघाटा अंचल स्थित फाउरी बस्ती से सामने आई है। आरोप है कि नशे में धुत युवक ने अपने दोस्त के साथ मिलकर अपनी ही मां की गला दबाकर हत्या कर दी।

    इतना ही नहीं, हत्या के बाद वह मां के शव के बगल में ही सो गया। इस दौरान आरोपित ने अपने छोटे भाई को रस्सी से बांध दिया था। किसी तरह बंधन से मुक्त होकर छोटे बेटे ने अपनी जान बचाई। शुक्रवार तड़के आसपास के लोगों को घटना की जानकारी दी।

    मृतका की पहचान सीता भुइयां (45) के रूप में हुई है। घटना में पुलिस ने उसके बड़े बेटे करण भुइयां को गिरफ्तार किया है। वहीं, उसके दोस्त राहुल की तलाश शुरू कर दी गई है।

    स्थानीय सूत्रों की माने तो सीता श्रमिक थीं। उनके दो बेटे हैं। छोटा बेटा करीब 6 वर्ष का बताया जा रहा है। करण बड़ा बेटा था और उसे नशे की बुरी लत थी। बताया गया कि गुरुवार देर रात करण अपने दोस्त राहुल के साथ घर पहुंचा था। उस समय भी वह नशे में था। घर में उसकी मां और छोटा भाई मौजूद थे।

    आरोप है कि किसी बात को लेकर करण का मां से विवाद हो गया। इसके बाद उसने अपने छोटे भाई को रस्सी से बांध दिया। इसी दौरान उसने कथित रूप से गला दबाकर मां की हत्या कर दी। हत्या के बाद भी वह घर से नहीं भागा और मां के शव के पास ही सो गया।

    किसी तरह छोटा बेटा बंधन से मुक्त होकर घर से बाहर निकला और तड़के आसपास के लोगों को घटना की जानकारी दी। इसके बाद स्थानीय लोग घर पहुंचे। महिला का शव जमीन पर पड़ा था। उसके शरीर पर कपड़े भी नहीं थे। लोगों ने करण को पकड़कर पुलिस को सूचना दी।

    माटीगाड़ा थाना की पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए उत्तर बंगाल मेडिकल कालेज एवं अस्पताल भेज दिया। गिरफ्तार आरोपित को शुक्रवार को अदालत में पेश किया जाएगा। पुलिस मामले की जांच के साथ उसके दोस्त राहुल की तलाश में जुटी है।

  • बुखार में क्यों कांपने लगता; है पूरा शरीर, शरीर के अंदर उस वक्त क्या होता है?

    बुखार में क्यों कांपने लगता; है पूरा शरीर, शरीर के अंदर उस वक्त क्या होता है?

    बुखार में क्यों कांपने लगता; है पूरा शरीर, शरीर के अंदर उस वक्त क्या होता है?

    कई बार हल्का बुखार आते ही शरीर में अचानक ठंड लगने लगती है और हाथ-पैर कांपने लगते हैं। कुछ लोगों को इतनी तेज कंपकंपी होती है कि दांत तक बजने लगते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब शरीर का तापमान बढ़ रहा होता है, तो फिर ठंड क्यों महसूस होती है?

    दरअसल, बुखार के दौरान शरीर के तापमान को नियंत्रित करने वाली प्रक्रिया में बदलाव होता है। शरीर का यह प्राकृतिक सिस्टम संक्रमण से लड़ने के लिए तापमान बढ़ाने की कोशिश कर सकता है और इसी दौरान कंपकंपी महसूस होती है।

    बुखार में शरीर का ‘सेट पॉइंट’ बदल सकता है

    हमारे दिमाग में हाइपोथैलेमस शरीर के तापमान को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सामान्य स्थिति में यह शरीर के तापमान को एक निश्चित सीमा में बनाए रखने में मदद करता है।

    जब शरीर में संक्रमण होता है, तो प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय हो जाता है। कुछ रसायनों और सूजन से जुड़ी प्रक्रियाओं के कारण हाइपोथैलेमस शरीर का तापमान सामान्य से ऊपर करने का संकेत दे सकता है।

    यहीं से ठंड लगने और कंपकंपी की शुरुआत हो सकती है।

    तापमान बढ़ रहा होता है, फिर भी ठंड क्यों लगती है?

    मान लीजिए शरीर का तापमान सामान्य से बढ़कर किसी नए स्तर तक पहुंचना चाहता है, लेकिन उस समय शरीर अभी उस तापमान तक नहीं पहुंचा है। दिमाग को शरीर अपेक्षाकृत ठंडा लग सकता है।

    इसके बाद शरीर गर्मी पैदा करने के लिए कई प्रतिक्रियाएं शुरू करता है। त्वचा की रक्त वाहिकाएं सिकुड़ सकती हैं, जिससे शरीर की गर्मी बाहर कम निकलती है। साथ ही मांसपेशियां तेजी से सिकुड़ने और ढीली होने लगती हैं।

    इसी अनैच्छिक मांसपेशीय गतिविधि को हम कंपकंपी या शivering के रूप में महसूस करते हैं।

    कांपने से शरीर गर्मी कैसे पैदा करता है?

    मांसपेशियों के बार-बार तेजी से सिकुड़ने से ऊर्जा खर्च होती है और गर्मी पैदा होती है। यह शरीर का एक प्राकृतिक तरीका है, जिससे वह अपना तापमान बढ़ाने की कोशिश करता है।

    इसलिए बुखार के शुरुआती दौर में व्यक्ति को एक साथ दो अलग-अलग चीजें महसूस हो सकती हैं—शरीर का तापमान बढ़ रहा होता है, लेकिन अंदर से ठंड लग रही होती है।

    जब शरीर नया तापमान हासिल कर लेता है, तो कंपकंपी कम हो सकती है।

    बुखार उतरते समय भी पसीना क्यों आता है?

    बुखार के दौरान शरीर का तापमान बढ़ाने वाला ‘सेट पॉइंट’ बाद में सामान्य स्तर पर लौट सकता है। तब शरीर को अतिरिक्त गर्मी बाहर निकालने की जरूरत पड़ती है।

    इसके लिए त्वचा की रक्त वाहिकाएं फैल सकती हैं और पसीना आ सकता है। यही वजह है कि कई लोगों को बुखार उतरने के दौरान अचानक बहुत पसीना आता है।

    हर कंपकंपी सिर्फ बुखार की वजह से नहीं होती

    यह समझना जरूरी है कि शरीर का कांपना हमेशा बुखार का संकेत नहीं होता। ठंडा वातावरण, डर या तनाव, लो ब्लड शुगर, कुछ दवाओं का असर और कई अन्य स्थितियों में भी कंपकंपी हो सकती है।

    वहीं संक्रमण के दौरान होने वाली तेज कंपकंपी को कई बार चिल्स या रिगर्स कहा जाता है। यह सिर्फ शरीर का तापमान बढ़ने की सामान्य अनुभूति से अलग हो सकती है।

    कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

    अगर बुखार के साथ कंपकंपी बहुत तेज हो, बार-बार हो रही हो या व्यक्ति की हालत तेजी से बिगड़ रही हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    खास तौर पर सांस लेने में परेशानी, भ्रम या अत्यधिक कमजोरी, लगातार उल्टी, गर्दन अकड़ना, दौरा पड़ना, तेज सिरदर्द या गंभीर निर्जलीकरण जैसे लक्षण हों तो तुरंत चिकित्सकीय मदद लेना जरूरी है।

    बुखार खुद कोई अलग बीमारी नहीं, बल्कि कई बार शरीर में चल रही किसी समस्या या संक्रमण का लक्षण होता है। इसलिए सिर्फ तापमान कम करने के बजाय बुखार के कारण को समझना भी जरूरी है।

  • लोकेंद्र कैसे बना ‘दृश्यम’ वाला विजय सालगांवकर’? घर में पत्नी की हत्या कर जलाई लाश, 12 KM दूर यमुना में फेंकीं हड्डियां; अब मामा के पास रहेगी बेटी

    लोकेंद्र कैसे बना ‘दृश्यम’ वाला विजय सालगांवकर’? घर में पत्नी की हत्या कर जलाई लाश, 12 KM दूर यमुना में फेंकीं हड्डियां; अब मामा के पास रहेगी बेटी

    लोकेंद्र कैसे बना ‘दृश्यम’ वाला विजय सालगांवकर’? घर में पत्नी की हत्या कर जलाई लाश, 12 KM दूर यमुना में फेंकीं हड्डियां; अब मामा के पास रहेगी बेटी

    (आगरा)। अछनेरा के गांव कुकथला में फिल्म दृश्यम की तरह पत्नी की हत्या करके शव को घर में फूंकने के बाद अवशेष बोरे में भरकर यमुना नदी में ठिकाने वाले पति को पुलिस ने बुधवार को गिरफ्तार कर लिया था। गुरुवार को पुलिस ने चांदनी के पति और जेठ को न्यायालय में पेश किया। न्यायालय ने दोनों को जेल भेज दिया। दो वर्ष की बेटी को मामा अपने साथ ले गए।

    गांव कुकथला निवासी 32 वर्ष की चांदनी की पति ने लोकेंद्र सोलंकी ने मंगलवार की दोपहर विवाद के बाद हत्या कर दी थी। पति ने चर्चित फिल्म दृश्यम के अंदाज में पूरी वारदात को अंजाम दिया था। पत्नी चांदनी के शव को घर के पीछे बने बाड़े में भूसे और उपलों पर रखा और बाइक की टंकी से पेट्रोल निकालकर जला दिया।

    बोरे में भरकर 12 किलोमीटर दूर यमुना में बहा अवशेष

    साक्ष्य मिटाने के लिए शव के अवशेषों को पति लोकेंद्र सोलंकी बोरे में भरकर बाइक से 12 किलोमीटर दूर शहर में लाकर यमुना नदी में बहा दिया था। इसके बाद खुद ही पुलिस को पत्नी के गायब होने की सूचना देकर गुमराह करने का प्रयास किया था।

    हत्यारोपित पति।

    पत्नी की हत्या कर घर में फूंक दिया था शव

    सिकंदरा थाना क्षेत्र गांव अकबरा निवासी चांदनी के भाई मनोज और मोहित द्वारा जीजा लोकेंद्र सोलंकी पर बहन को गायब करने का शक जताने पर बुधवार दोपहर पुलिस ने उसे हिरासत में लिया। कई घंटे पुलिस को गुमराह करने के बाद लोकेंद्र ने पत्नी की हत्या करके शव को घर में फूंकने और अवशेषों को यमुना में बहाने की बात स्वीकार की थी। चांदनी के भाई मनोज ने लोकेंद्र सोलंकी, उसके भाई मानवेंद्र समेत छह लोगों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराया था।

    चांदनी की शादी वर्ष 2022 में लोकेंद्र सोलंकी से हुई थी। दो वर्ष की बेटी सिद्धि है। पुलिस ने फिलहाल बेटी को मामा मनोज की सिपुर्दगी में दिया है। मायके वालों का कहना था कि वह बहन के हत्यारों के यहां मासूम को नहीं छोड़ सकते हैं।

  • क्या मखाना खाने से कंट्रोल: रहता है बीपी? वजन घटाने और दिल की सेहत पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट, जानिए.

    क्या मखाना खाने से कंट्रोल: रहता है बीपी? वजन घटाने और दिल की सेहत पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट, जानिए.

    क्या मखाना खाने से कंट्रोल: रहता है बीपी? वजन घटाने और दिल की सेहत पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट, जानिए.

    क्या आप भी दिल को सेहतमंद रखने और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखने के लिए मखाने का सेवन करते हैं? भारतीय घरों में स्नैक्स के तौर पर खाया जाने वाला मखाना (Fox Nuts) न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि इसमें मौजूद पोटैशियम, मैग्नीशियम और एंटी-ऑक्सीडेंट्स इसे सेहत के लिए काफी खास बनाते हैं। अक्सर माना जाता है कि मखाना वजन घटाने से लेकर हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में अहम भूमिका निभा सकता है। लेकिन क्या सच में यह दिल की बीमारियों के जोखिम को कम करने में असरदार है और हेल्थ एक्सपर्ट्स इसे रोजाना खाने को लेकर क्या राय देते हैं?

    एम्स के पूर्व कंसल्टेंट और साओल हार्ट सेंटर के फाउंडर एंड डायरेक्टर डॉ बिमल झांजेर के मुताबिक मखाने को संतुलित डाइट का हिस्सा बनाया जा सकता है और खासकर हार्ट हेल्थ, वजन मैनेजमेंट और बेहतर पोषण के लिए इसका सेवन उपयोगी हो सकता है। मखाना को एक पौष्टिक स्नैक्स के तौर पर रोज खाया जा सकता है। इसमें फाइबर, प्रोटीन और कई तरह के मिनरल्स पाए जाते हैं जो बॉडी को हेल्दी रखने में मदद करते हैं। आइए एक्सपर्ट से जानते है्ं कि दिल के लिए क्यों फायदेमंद है मखाना, और ये बीपी को कैसे रखता है नॉर्मल। रोजाना मखाना का सेवन कैसे सेहत को फायदा पहुंचाता है, जानिए।

    दिल की सेहत के लिए कैसे फायदेमंद है मखाना?

    डॉ. बिमल छाजेड़ के अनुसार मखाने में मौजूद पोषक तत्व दिल की कार्यप्रणाली को सुचारू रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसमें मौजूद पोटैशियम और मैग्नीशियम की अधिक मात्रा दिल की मांसपेशियों को हेल्दी रखने और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाने में बेहद असरदार साबित होती है। इसमें सोडियम की बहुत कम मात्रा होती है जो दिल के मरीजों के लिए इसे एक सुरक्षित स्नैक का विकल्प बनाती है। मखाने में मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स शरीर में फ्री-रेडिकल्स से होने वाले ऑक्सीडेटिव तनाव (Oxidative Stress) को कम करने में मदद करते हैं, जिससे दिल की बीमारियों का जोखिम कम होता है। मखाने में फाइबर और कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं। डाइट में पर्याप्त फाइबर लेने से कोलेस्ट्रॉल और एलडीएल जैसे कुछ हार्ट रिस्क फैक्टर्स को मैनेज करने में मदद मिल सकती है।

    पाचन को दुरुस्त करता है मखाना

    मखाने में फाइबर भरपूर पाया जाता है, जो पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराने में मदद कर सकता है। फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करने से कुल कैलोरी सेवन को मैनेज करने में मदद मिल सकती है। इसका सेवन करने से वेट लॉस जर्नी आसान होती है। वेट लॉस करने के लिए भुना हुआ मखाना एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है।

    क्या मखाना वजन कम करने में मदद करता है?

    मखाना अपने आप वजन कम नहीं करता, लेकिन इसे ज्यादा कैलोरी वाले स्नैक्स की जगह सीमित मात्रा में लिया जाए तो कुल कैलोरी सेवन को कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है। डॉक्टर के मुताबिक, मखाना खाने से पेट जल्दी भरने का एहसास हो सकता है। इसमें प्रोटीन भी होता है जो वेट लॉस करने में मददगार साबित होता है।

    एंटीऑक्सीडेंट्स से भी मिल सकता है फायदा

    मखाने में कुछ ऐसे बायोएक्टिव कंपाउंड और एंटीऑक्सीडेंट यौगिक पाए जाते हैं, जो शरीर में बनने वाले फ्री रेडिकल्स से होने वाले ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में भूमिका निभा सकते हैं। शरीर में फ्री रेडिकल्स की मात्रा बढ़ने पर कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे में एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव डैमेज से बचाने में मदद करते हैं। मखाना का सेवन कैंसर, हार्ट डिजीज या बढ़ती उम्र से जुड़ी बीमारियों से बचाव करने में मददगार साबित होता है।

    डायबिटीज में मखाना खाना कितना सही?

    मखाने में कार्बोहाइड्रेट होते हैं, इसलिए डायबिटीज के मरीजों को इसकी मात्रा का ध्यान रखना चाहिए। बिना चीनी और कम नमक में भुना हुआ मखाना तले हुए या मीठे स्नैक्स की तुलना में एक बेहतर विकल्प हो सकता है। डायबिटीज मरीज सीमित मात्रा में मखाना का सेवन करें तो पेट लम्बे समय तक भरा रहेगा और खाने के बाद ब्लड शुगर बढ़ने का भी खतरा नहीं रहेगा।

    हाई ब्लड प्रेशर में मखाना कैसे खाएं?

    मखाने में पोटैशियम और मैग्नीशियम जैसे मिनरल्स पाए जाते हैं, जो शरीर में बीपी को नॉर्मल रखने में अहम किरदार निभाते हैं। हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों को मखाने में अतिरिक्त नमक डालने से बचना चाहिए। ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए रोजाना बीपी की दवा लेना,कम सोडियम वाली डाइट और नियमित शारीरिक गतिविधि बेहद जरूरी है।

    मखाना कैसे खाना ज्यादा बेहतर है?

    मखाने को भूनकर और बिना ज्यादा नमक या तेल के खाना बेहतर विकल्प हो सकता है। इसे शाम के स्नैक के तौर पर लिया जा सकता है। अगर स्वाद के लिए नमक डाल रहे हैं तो इसकी मात्रा कम रखें, खासकर हाई ब्लड प्रेशर वाले लोग। मखाने को घी, मक्खन, चीनी या ज्यादा नमक के साथ लेने से इसका कैलोरी और सोडियम कंटेंट बढ़ सकता है।

    डिस्क्लेमर: मखाने में मौजूद पोषक तत्व और एंटीऑक्सीडेंट हेल्थ के लिए उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन यह किसी बीमारी का इलाज या रोकथाम का विकल्प नहीं हैं। हार्ट डिजीज, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या अन्य स्वास्थ्य समस्या होने पर मखाने का सेवन अपनी व्यक्तिगत जरूरत और डॉक्टर की सलाह के अनुसार करें।

  • 400 से ज्यादा ‘कमरों’ वाला मुगल मेहमान के लिए बना महल, फिर भी कभी नहीं बसा कोई शाही परिवार.

    400 से ज्यादा ‘कमरों’ वाला मुगल मेहमान के लिए बना महल, फिर भी कभी नहीं बसा कोई शाही परिवार.

    400 से ज्यादा ‘कमरों’ वाला मुगल मेहमान के लिए बना महल, फिर भी कभी नहीं बसा कोई शाही परिवार.

    मध्य प्रदेश के दतिया शहर में एक ऐसा ऐतिहासिक महल मौजूद है, जिसकी भव्यता देखकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं। सात मंजिला सतखंडा महल, जिसे वीर सिंह देव पैलेस के नाम से भी जाना जाता है, बुंदेला काल की शानदार स्थापत्य कला का उदाहरण है।

    महल की सबसे दिलचस्प बात इसकी ऊंचाई या सैकड़ों कमरों की संख्या नहीं, बल्कि इससे जुड़ी वह कहानी है जिसके मुताबिक इसे खास शाही मेहमान के स्वागत और ठहरने के लिए बनवाया गया था। इतना विशाल भवन तैयार होने के बावजूद यह लंबे समय तक किसी शाही परिवार का स्थायी निवास नहीं बन सका।

    जहांगीर से दोस्ती ने रखी महल की नींव

    सतखंडा महल का संबंध बुंदेला शासक राजा वीर सिंह देव और मुगल राजकुमार सलीम से जोड़ा जाता है। यही सलीम आगे चलकर मुगल सम्राट जहांगीर बने।

    ऐतिहासिक विवरणों में वीर सिंह देव और सलीम के बीच करीबी संबंधों का उल्लेख मिलता है। इसी संबंध और मुगल दरबार से उनके जुड़ाव के दौर में दतिया में एक भव्य महल के निर्माण की परंपरा को इस इमारत की कहानी से जोड़ा जाता है।

    मान्यता है कि महल का उद्देश्य शाही मेहमान के लिए ऐसा आवास तैयार करना था, जो उसकी प्रतिष्ठा और हैसियत के अनुरूप हो।

    17वीं सदी में शुरू हुआ निर्माण

    सतखंडा महल के निर्माण की तारीख को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। कई स्रोत इसकी नींव 1614 के आसपास रखे जाने की बात बताते हैं, जबकि कुछ दस्तावेज निर्माण अवधि को 1614 से 1620 के दशक के बीच रखते हैं।

    महल के निर्माण में कई वर्ष लगे और उस दौर के हिसाब से इस पर बड़ी रकम खर्च होने की बात कही जाती है। विशाल संरचना को तैयार करने में कारीगरों ने पत्थर, ईंट और चूने जैसी पारंपरिक निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किया।

    इतना बड़ा महल, फिर भी क्यों रहा खाली?

    सतखंडा महल की कहानी का सबसे रहस्यमय हिस्सा इसके इस्तेमाल से जुड़ा है।

    स्थानीय परंपराओं और कुछ ऐतिहासिक विवरणों में जहांगीर के दतिया आने का जिक्र मिलता है, लेकिन महल में उनके लंबे समय तक रहने का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। यही वजह है कि यह भव्य इमारत उस तरह का शाही निवास नहीं बन पाई, जैसा इसके निर्माण के समय कल्पना की गई होगी।

    बाद के समय में भी बुंदेला शासकों के नियमित निवास के रूप में इसका इस्तेमाल नहीं हुआ। 19वीं सदी में ब्रिटिश अधिकारियों के दौर से जुड़े विवरणों में भी इस विशाल भवन के खाली रहने का उल्लेख मिलता है।

    इसी वजह से स्थानीय लोगों के बीच यह महल धीरे-धीरे एक ऐसी इमारत के रूप में पहचाना जाने लगा, जो बेहद भव्य होने के बावजूद कभी आबाद नहीं हो सकी।

    बिना लकड़ी और लोहे के निर्माण की खासियत

    सतखंडा महल की वास्तुकला इसे और खास बनाती है। इसकी संरचना में पारंपरिक भारतीय निर्माण तकनीकों का इस्तेमाल दिखाई देता है।

    महल के निर्माण में पत्थर, ईंट और चूने का प्रमुख इस्तेमाल बताया जाता है। विशाल दीवारों और मजबूत संरचना की वजह से यह इमारत सदियों बाद भी दतिया के ऐतिहासिक परिदृश्य में खड़ी है।

    महल के भूमिगत हिस्से और तहखाने भी इसकी वास्तुकला का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनका इस्तेमाल मौसम से राहत और अन्य आवश्यकताओं के लिए किया जाता रहा होगा।

    400 से ज्यादा कमरे और खूबसूरत झरोखे

    सतखंडा महल के कमरों की संख्या को लेकर भी अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं। कई विवरणों में यहां करीब 400 से ज्यादा कमरे होने की बात कही जाती है।

    महल में बड़े आंगन, झरोखे, बालकनियां और गलियारे इसकी भव्यता को बढ़ाते हैं। बुंदेला स्थापत्य शैली की छाप इसके डिजाइन और सजावट में स्पष्ट दिखाई देती है।

    महल की ऊंचाई और इसकी चट्टानी स्थिति इसे दूर से भी बेहद प्रभावशाली बनाती है। यहां से आसपास के क्षेत्र का खूबसूरत दृश्य दिखाई देता है और दक्षिणी दिशा की ओर कर्ण सागर झील का नजारा भी देखा जा सकता है।

    बुंदेला और मुगल प्रभाव का मेल

    दतिया और बुंदेलखंड की ऐतिहासिक इमारतों में स्थानीय बुंदेला स्थापत्य के साथ मुगल प्रभाव भी देखने को मिलता है। सतखंडा महल इसी सांस्कृतिक संपर्क का एक उदाहरण माना जाता है।

    महल परिसर से जुड़े विवरणों में धार्मिक और सांस्कृतिक संरचनाओं की मौजूदगी का भी उल्लेख मिलता है, जो उस समय के सामाजिक और स्थापत्य परिवेश की विविधता को दर्शाती है।

    आज दतिया की पहचान है सतखंडा महल

    जिस इमारत को कभी शाही मेहमान के स्वागत के लिए तैयार किया गया था, वह आज खुद इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

    करीब चार सदियों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी सतखंडा महल दतिया की पहचान से जुड़ा हुआ है। इसकी विशालता, स्थापत्य शैली और इससे जुड़ी अधूरी शाही मेहमाननवाजी की कहानी इसे मध्य प्रदेश की चर्चित ऐतिहासिक इमारतों में शामिल करती है।

    महल की सबसे दिलचस्प बात शायद यही है कि इतनी भव्य इमारत बनाने के पीछे शाही ठहराव की कल्पना थी, लेकिन इतिहास ने इसे एक स्थायी शाही निवास बनने का मौका ही नहीं दिया।