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  • दाउदनगर में लापता 3.5 ‘वर्षीय’ मासूम की बेरहमी से हत्या, नहर से मिला शव; परिजनों में कोहराम’

    दाउदनगर में लापता 3.5 ‘वर्षीय’ मासूम की बेरहमी से हत्या, नहर से मिला शव; परिजनों में कोहराम’

    दाउदनगर में लापता 3.5 ‘वर्षीय’ मासूम की बेरहमी से हत्या, नहर से मिला शव; परिजनों में कोहराम’

    (औरंगाबाद)। दाउदनगर थाना क्षेत्र के मनार पंचायत के गंगा बिगहा गांव में साढ़े तीन वर्षीय मासूम की हत्या से इलाके में सनसनी फैल गई। गुरुवार शाम करीब चार बजे घर के पास से लापता हुए मासूम का शव शुक्रवार की सुबह गांव के समीप नहर से बरामद किया गया।

    शव मिलते ही परिवार में कोहराम मच गया। मां और स्वजन की चीख-पुकार से गांव का माहौल गमगीन हो गया। हत्या के कारण का पता नहीं चल सका है।‌

    गुरुवार शाम घर के पास से अचानक गायब हो गया

    बताया जाता है कि विकास के पुत्र भोला गुरुवार शाम घर के पास से अचानक गायब हो गया था। काफी देर तक उसके नहीं लौटने पर स्वजन ने आसपास के इलाके में तलाश शुरू की। पुलिस को भी इसकी सूचना दी गई। रातभर खोजबीन के बावजूद मासूम का कोई सुराग नहीं मिला।

    शुक्रवार की सुबह ग्रामीणों की नजर नहर में पड़े बच्चे के शव पर गई। पहचान होने पर पता चला कि शव लापता भोला का है। सूचना पर पुलिस टीम मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए सदर अस्पताल औरंगाबाद भेज दिया है।

    एसडीपीओ चंद्रभूषण ने बताया कि फिलहाल मौत के कारणों के संबंध में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है। मामले की गंभीरता को देखते हुए डाग स्क्वायड समेत विशेष टीमों को बुलाया गया है। पुलिस सभी बिंदुओं पर जांच कर रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद मौत के वास्तविक कारणों का पता चल सकेगा।

  • सेहत के लिए ‘अमृत’ है मूली, इन 7 चीजों के साथ खाएंगे तो सेहत को हो सकता है नुकसान,

    सेहत के लिए ‘अमृत’ है मूली, इन 7 चीजों के साथ खाएंगे तो सेहत को हो सकता है नुकसान,

    सेहत के लिए ‘अमृत’ है मूली, इन 7 चीजों के साथ खाएंगे तो सेहत को हो सकता है नुकसान,

    सर्दियों के मौसम में मूली खाने का चलन काफी बढ़ जाता है। मूली को सलाद, सब्जी, पराठे या दूसरी कई तरह की डिश में शामिल किया जाता है। इसमें फाइबर, विटामिन C और कई अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं, इसलिए संतुलित डाइट का हिस्सा होने के नाते इसका सेवन फायदेमंद हो सकता है।

    हालांकि, आयुर्वेद में सिर्फ किसी खाद्य पदार्थ के फायदे ही नहीं, बल्कि किन चीजों के साथ उसका सेवन किया जा रहा है, इस पर भी ध्यान देने की बात कही गई है। इसे आयुर्वेद में ‘विरुद्ध आहार’ की अवधारणा से जोड़ा जाता है।

    आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. प्रताप चौहान के अनुसार मूली को कुछ खाद्य पदार्थों के साथ लेने से बचने की सलाह दी जाती है। हालांकि, इन संयोजनों से होने वाले नुकसान को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण हर मामले में समान नहीं हैं। इसलिए इन्हें आयुर्वेदिक आहार संबंधी मान्यता के रूप में समझना चाहिए, न कि यह मान लेना चाहिए कि मूली के साथ इन चीजों का सेवन करने से हर व्यक्ति को नुकसान होगा।

    आयुर्वेद में मूली की तासीर कैसी मानी गई है?

    आयुर्वेद में मूली को गर्म यानी उष्ण प्रकृति का खाद्य पदार्थ माना जाता है। इसके तीखे स्वाद और कुछ गुणों को पाचन से जोड़ा जाता है। पारंपरिक आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार मूली कफ और भारीपन को कम करने में मदद कर सकती है।

    वहीं, आधुनिक पोषण के नजरिए से मूली में फाइबर और विटामिन C जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। कच्ची मूली कुछ लोगों में गैस या पेट फूलने जैसी समस्या भी पैदा कर सकती है, खासकर अगर इसे अधिक मात्रा में खाया जाए।

    क्या होता है विरुद्ध आहार?

    आयुर्वेद में विरुद्ध आहार का मतलब ऐसे खाद्य संयोजन या भोजन करने के तरीकों से है जिन्हें शरीर के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। आयुर्वेदिक मान्यताओं में खाद्य पदार्थों की प्रकृति, उनके गुण, मात्रा और सेवन के समय जैसे पहलुओं को महत्व दिया जाता है।

    इसी आधार पर कुछ विशेषज्ञ मूली को कुछ खाद्य पदार्थों के साथ लेने से बचने की सलाह देते हैं।

    1. मूली और संतरा

    आयुर्वेदिक सलाह के अनुसार मूली के साथ संतरा लेने से बचने की बात कही जाती है। खासकर एक ही समय पर या लगातार दोनों का सेवन करने को अनुकूल संयोजन नहीं माना जाता।

    हालांकि, आधुनिक चिकित्सा में ऐसा मजबूत प्रमाण नहीं है कि सामान्य मात्रा में मूली और संतरा साथ खाने से हर व्यक्ति को नुकसान होगा। अगर किसी व्यक्ति को इस तरह के भोजन के बाद पेट संबंधी परेशानी होती है, तो उसे अपने खान-पान पर ध्यान देना चाहिए।

    2. मूली और करेला

    मूली और करेले दोनों का इस्तेमाल भारतीय भोजन में लंबे समय से होता रहा है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में दोनों को एक साथ खाने से बचने की सलाह कुछ विशेषज्ञ देते हैं।

    अगर किसी व्यक्ति को दोनों सब्जियां खाने के बाद पेट में असहजता, गैस या ब्लोटिंग महसूस होती है, तो इन्हें अलग-अलग समय पर लेना एक विकल्प हो सकता है।

    3. मूली और दूध

    मूली के साथ दूध का सेवन आयुर्वेद में विरुद्ध आहार के उदाहरणों में बताया जाता है। इसका आधार दोनों खाद्य पदार्थों के अलग-अलग गुण और प्रकृति माने जाते हैं।

    भारतीय घरों में मूली के पराठे या मूली की सब्जी के साथ दूध का सेवन आम है। इसलिए इसे लेकर घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन अगर किसी व्यक्ति को इस संयोजन के बाद पाचन संबंधी परेशानी होती है तो दोनों के सेवन के बीच अंतर रखा जा सकता है।

    4. मूली और शहद

    आयुर्वेदिक मान्यताओं में मूली और शहद को भी एक साथ लेने से बचने की सलाह दी जाती है। दोनों की प्रकृति अलग मानी जाती है और इसी वजह से इन्हें विरुद्ध आहार की श्रेणी में रखने की बात कही जाती है।

    हालांकि, इस संयोजन को लेकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में ऐसा स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि सामान्य मात्रा में इन्हें साथ लेने से निश्चित रूप से विषाक्त प्रभाव होगा। इसलिए इसे आयुर्वेदिक आहार संबंधी सलाह के तौर पर ही समझना उचित है।

    5. मूली और दही

    कई लोग भोजन के साथ मूली का सलाद और दही दोनों लेते हैं। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से इस संयोजन से बचने की सलाह दी जाती है।

    अगर किसी व्यक्ति को मूली और दही साथ लेने पर पेट फूलना, गैस या अन्य पाचन संबंधी परेशानी होती है, तो इन्हें अलग-अलग समय पर लेना बेहतर विकल्प हो सकता है।

    6. मूली और कुछ खट्टे खाद्य पदार्थ

    आयुर्वेदिक आहार पद्धति में मूली के साथ कुछ खट्टे खाद्य पदार्थों के संयोजन को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह मिलती है। इसका उद्देश्य पाचन तंत्र पर अनावश्यक दबाव से बचना माना जाता है।

    हालांकि, हर व्यक्ति की पाचन क्षमता अलग होती है और सामान्य मात्रा में किसी खाद्य पदार्थ का सेवन सभी पर एक जैसा असर नहीं डालता।

    7. मूली का जरूरत से ज्यादा सेवन

    किसी भी स्वस्थ खाद्य पदार्थ का जरूरत से ज्यादा सेवन परेशानी पैदा कर सकता है। मूली में फाइबर और कुछ ऐसे कार्बोहाइड्रेट होते हैं जो संवेदनशील लोगों में गैस, पेट फूलना या असहजता पैदा कर सकते हैं।

    इसलिए मूली को अपनी डाइट में संतुलित मात्रा में शामिल करना बेहतर है। अगर पहले से पाचन संबंधी समस्या है, तो कच्ची मूली की मात्रा कम रखना या डॉक्टर/डायटीशियन से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।

    मूली खाते समय किन बातों का ध्यान रखें?

    मूली को अच्छी तरह धोकर और साफ करके खाना चाहिए। बहुत अधिक मात्रा में कच्ची मूली खाने से कुछ लोगों को गैस या ब्लोटिंग हो सकती है। अगर किसी विशेष खाद्य संयोजन से बार-बार परेशानी होती है, तो उसे अपनी डाइट से अलग करके देख सकते हैं।

    सबसे जरूरी बात यह है कि मूली को किसी चीज के साथ खाने से वह ‘जहर’ नहीं बन जाती। कुछ संयोजनों को लेकर आयुर्वेदिक मान्यताएं जरूर हैं, लेकिन इन्हें आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ अलग-अलग समझना जरूरी है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी और आयुर्वेदिक मान्यताओं पर आधारित है। किसी खाद्य पदार्थ से एलर्जी, लगातार पाचन संबंधी समस्या या अन्य स्वास्थ्य परेशानी होने पर डॉक्टर या योग्य डायटीशियन से सलाह लें। अपनी डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।

  • टाइटन पर है ‘हाइड्रोकार्बन’ का विशाल भंडार, फिर भी पृथ्वी पर क्यों नहीं ला सकते यह ईंधन?

    टाइटन पर है ‘हाइड्रोकार्बन’ का विशाल भंडार, फिर भी पृथ्वी पर क्यों नहीं ला सकते यह ईंधन?

    टाइटन पर है ‘हाइड्रोकार्बन’ का विशाल भंडार, फिर भी पृथ्वी पर क्यों नहीं ला सकते यह ईंधन?

    सौरमंडल में कई ऐसी जगहें हैं जो वैज्ञानिकों के लिए आज भी रहस्य बनी हुई हैं। शनि का सबसे बड़ा चंद्रमा टाइटन भी इन्हीं में शामिल है। इसकी खासियत सिर्फ इसका आकार या घना वातावरण नहीं है, बल्कि यहां मौजूद तरल हाइड्रोकार्बन भी वैज्ञानिकों की दिलचस्पी का बड़ा कारण हैं।

    टाइटन की सतह पर झीलों और समुद्रों के रूप में तरल मीथेन और एथेन पाए जाते हैं। ये हाइड्रोकार्बन पृथ्वी पर इस्तेमाल होने वाले तेल और प्राकृतिक गैस से रासायनिक रूप से जुड़े पदार्थ हैं। कैसिनी मिशन से मिले आंकड़ों ने टाइटन पर मौजूद इन संसाधनों की विशालता के बारे में वैज्ञानिकों को महत्वपूर्ण जानकारी दी है।

    ऐसे में सवाल उठता है कि अगर टाइटन पर इतना हाइड्रोकार्बन मौजूद है, तो इंसान वहां से ईंधन पृथ्वी पर क्यों नहीं ला सकता?

    पृथ्वी से करीब 1.4 अरब किलोमीटर दूर है टाइटन

    सबसे पहली और बड़ी समस्या दूरी है। टाइटन पृथ्वी से लगभग 1.4 अरब किलोमीटर दूर है। वहां किसी अंतरिक्ष यान को भेजना, सतह पर उतारना, संसाधन इकट्ठा करना और फिर उन्हें लेकर पृथ्वी पर वापस आना बेहद लंबा और जटिल मिशन होगा।

    आज की तकनीक के साथ ऐसा मिशन कई वर्षों तक चल सकता है। अंतरिक्ष यान को इतने लंबे समय तक काम करने के साथ-साथ भारी मात्रा में उपकरण, ईंधन और संभावित रूप से हाइड्रोकार्बन का पेलोड भी संभालना होगा।

    ईंधन लाने की लागत ही सबसे बड़ी समस्या बन जाएगी

    टाइटन पर ईंधन जैसा संसाधन मौजूद होना और उसे पृथ्वी तक पहुंचा पाना दो अलग-अलग बातें हैं।

    किसी दूसरे खगोलीय पिंड से बड़े पैमाने पर संसाधन निकालने के लिए पहले वहां मशीनरी और ऊर्जा की व्यवस्था करनी होगी। इसके बाद हाइड्रोकार्बन को इकट्ठा करना, सुरक्षित तरीके से स्टोर करना और अंतरिक्ष यान में भरना होगा।

    फिर उसे अरबों किलोमीटर की दूरी तय करके पृथ्वी तक लाना पड़ेगा। इस पूरी प्रक्रिया में लगने वाली तकनीक, ऊर्जा, समय और धन की तुलना में पृथ्वी पर उपलब्ध ईंधन के मुकाबले यह तरीका फिलहाल व्यावहारिक नहीं माना जाता।

    जितना ज्यादा ईंधन, उतनी बड़ी चुनौती

    अंतरिक्ष में किसी वस्तु को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में उसका वजन बेहद महत्वपूर्ण होता है। अगर अंतरिक्ष यान को टाइटन से भारी मात्रा में मीथेन या अन्य हाइड्रोकार्बन लेकर वापस आना है, तो उसे उस अतिरिक्त वजन को भी अंतरिक्ष में आगे बढ़ाना होगा।

    इसके लिए ज्यादा ऊर्जा और प्रोपेलेंट की जरूरत पड़ सकती है। यानी एक तरह से समस्या यह बन जाती है कि ईंधन लाने के लिए भी काफी मात्रा में ईंधन और ऊर्जा की जरूरत होगी।

    यही कारण है कि किसी दूर के चंद्रमा से संसाधन निकालकर सीधे पृथ्वी पर लाने की योजना तकनीकी रूप से बेहद कठिन है।

    टाइटन पर मीथेन है, लेकिन ऑक्सीजन की कमी है

    टाइटन के वातावरण में मुख्य रूप से नाइट्रोजन मौजूद है और वहां मीथेन भी पाया जाता है। लेकिन मीथेन को जलाने के लिए ऑक्सीजन या किसी उपयुक्त ऑक्सीडाइजर की जरूरत होती है।

    इसलिए टाइटन पर बड़ी मात्रा में मीथेन का होना अपने आप में ऐसा नहीं है कि वहां पृथ्वी की तरह तैयार इस्तेमाल योग्य ईंधन व्यवस्था मौजूद है।

    अगर टाइटन का मीथेन पृथ्वी पर लाया जाए तो उसे ऊर्जा उत्पादन के लिए इस्तेमाल करने के दौरान ऑक्सीजन की जरूरत पृथ्वी से ही पूरी की जा सकती है।

    फिर टाइटन का मीथेन आखिर काम किस आएगा?

    यहीं टाइटन की सबसे दिलचस्प संभावना सामने आती है। वैज्ञानिकों के लिए भविष्य में टाइटन के संसाधनों का सबसे उपयोगी इस्तेमाल शायद उन्हें पृथ्वी पर लाना नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में ही इस्तेमाल करना हो सकता है।

    भविष्य में अगर इंसान शनि और उसके आसपास के क्षेत्र में नियमित अंतरिक्ष मिशन भेजने लगे, तो टाइटन पर मौजूद मीथेन और अन्य संसाधनों का इस्तेमाल स्थानीय स्तर पर किया जा सकता है।

    इसके लिए वहां संसाधनों को निकालने, प्रोसेस करने और अंतरिक्ष यान के लिए उपयोगी ईंधन या प्रोपेलेंट में बदलने की तकनीक विकसित करनी होगी।

    क्या टाइटन भविष्य का ‘स्पेस गैस स्टेशन’ बन सकता है?

    कल्पना कीजिए कि भविष्य में कोई अंतरिक्ष यान पृथ्वी से लंबी यात्रा करके शनि के क्षेत्र तक पहुंचता है। अगर टाइटन पर संसाधन निकालने और ईंधन तैयार करने की तकनीक उपलब्ध हो जाए, तो अंतरिक्ष यान वहां दोबारा ईंधन भर सकता है।

    इस तरह टाइटन पृथ्वी पर ईंधन भेजने की जगह अंतरिक्ष में मौजूद मिशनों के लिए एक तरह के संसाधन केंद्र के रूप में ज्यादा उपयोगी साबित हो सकता है।

    इससे गहरे अंतरिक्ष अभियानों को पृथ्वी से हर जरूरी संसाधन साथ लेकर जाने की जरूरत कम हो सकती है।

    असली खजाना पृथ्वी पर लाना नहीं, वहीं इस्तेमाल करना हो सकता है

    टाइटन पर मौजूद हाइड्रोकार्बन की विशाल मात्रा निश्चित रूप से वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन आज के समय में उन्हें पृथ्वी पर लाकर पेट्रोल या गैस की जरूरत पूरी करना व्यावहारिक विकल्प नहीं है।

    मुख्य अड़चन संसाधन की कमी नहीं, बल्कि दूरी, लागत, ऊर्जा, भारी पेलोड और अंतरिक्ष में संसाधन निकालने की तकनीकी कठिनाई है।

    भविष्य में अगर मानव सभ्यता शनि और उससे आगे के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अंतरिक्ष अभियानों की शुरुआत करती है, तो टाइटन के संसाधन वहीं मौजूद मिशनों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं। यानी टाइटन का असली महत्व शायद पृथ्वी के लिए ईंधन का भंडार बनने से ज्यादा भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए संसाधन केंद्र बनने में हो।

  • फिरोजाबाद में महिला: की संदिग्ध मौत: घर में गोली लगने से हुई मृत्यु, पुलिस जांच में जुटी ‘

    फिरोजाबाद में महिला: की संदिग्ध मौत: घर में गोली लगने से हुई मृत्यु, पुलिस जांच में जुटी ‘

    फिरोजाबाद में महिला: की संदिग्ध मौत: घर में गोली लगने से हुई मृत्यु, पुलिस जांच में जुटी ‘

    फिरोजाबाद। जसराना के गांव अकबरपुर में गुरुवार रात सनसनीखेज वारदात हुई। घर में मौजूद महिला ने तमंचे से खुद को सिर में गोली मार ली। इससे मौके पर ही मृत्यु हो गई। गोली चलने की आवाज सुनकर स्वजन की नींद खुल गई। कमरे में महिला का खून से लथपथ शव देखकर चीख पुकार मच गई।पुलिस हत्या और आत्महत्या दोनों बिंदुओं पर जांच कर रही है।

    गांव अकबरपुर निवासी 35 वर्षीय सुशीला देवी ने गुरुवार रात एक बजे घर में सिर में गोली मारकर आत्महत्या कर ली। गोली चलने की आवाज सुनकर स्वजन की आंख खुली तो महिला का शव खून से लथपथ पड़ा हुआ था। महिला के बेटे ध्रुव कुमार यादव ने 112 पर काल करके पुलिस को सूचना दी। पुलिस और फोरेंसिक टीम ने मौके पर पहुंचकर जांच की। आत्महत्या का कारण स्पष्ट नहीं हो सका।

    तमंचा पहले से घर में रखा हुआ था। थाना प्रभारी भगवान सिंह गुर्जर ने बताया स्वजन आत्महत्या की वजह नहीं बता सके हैं। महिला के पति भुवनेश यादव खेती करते हैं। परिवार में दो बेटे हैं। पुलिस हत्या और आत्महत्या दोनों बिंदुओं पर जांच कर रही है। फोरेंसिक टीम ने भी मौके से साक्ष्य जुटाए हैं। तमंचा को कब्जे में लेकर लैब भेजा जा रहा है।

  • क्या संक्रमण से भी हो सकता है कैंसर? HPV और H. pylori को लेकर सामने आई अहम जानकारी, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

    क्या संक्रमण से भी हो सकता है कैंसर? HPV और H. pylori को लेकर सामने आई अहम जानकारी, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

    क्या संक्रमण से भी हो सकता है कैंसर? HPV और H. pylori को लेकर सामने आई अहम जानकारी, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

    कैंसर का नाम आते ही अक्सर लोगों के मन में धूम्रपान, तंबाकू, खराब खान-पान, मोटापा, शराब या जेनेटिक कारणों का ख्याल आता है। लेकिन कैंसर के कुछ मामलों में लंबे समय तक बने रहने वाले संक्रमण भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। खास तौर पर कुछ वायरस और बैक्टीरिया ऐसे हैं, जिनका लंबे समय तक शरीर में रहना कुछ प्रकार के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा पाया गया है।

    ‘द लैंसेट ऑन्कोलॉजी’ में प्रकाशित एक अध्ययन में संक्रमण से जुड़े कैंसर के वैश्विक बोझ का आकलन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में दुनियाभर में करीब 23 लाख नए कैंसर मामले संक्रमण से जुड़े थे। भारत में ऐसे मामलों की अनुमानित संख्या करीब 1.9 लाख बताई गई है।

    हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को HPV, H. pylori या कोई अन्य संक्रमण होने पर उसे कैंसर होना तय है। कैंसर का विकास कई कारकों पर निर्भर करता है और संक्रमण के मामले में भी उसका प्रकार, संक्रमण की अवधि तथा व्यक्ति की अन्य स्वास्थ्य स्थितियां महत्वपूर्ण होती हैं।

    HPV भारत में संक्रमण से जुड़े कैंसर का बड़ा कारण

    भारत में संक्रमण से जुड़े कैंसर के मामलों में ह्यूमन पैपिलोमा वायरस यानी HPV की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है। HPV के कुछ हाई-रिस्क प्रकार सर्वाइकल कैंसर के विकास से जुड़े हैं।

    HPV संक्रमण आम है और कई मामलों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इसे खुद नियंत्रित कर लेती है। लेकिन कुछ मामलों में हाई-रिस्क HPV संक्रमण लंबे समय तक बना रह सकता है और गर्भाशय ग्रीवा की कोशिकाओं में बदलाव का कारण बन सकता है। समय के साथ यही बदलाव कुछ महिलाओं में कैंसर का रूप ले सकते हैं।

    HPV से जुड़े कैंसर के खतरे को कम करने के लिए टीकाकरण और नियमित सर्वाइकल कैंसर स्क्रीनिंग महत्वपूर्ण माने जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार केवल वैक्सीन ही नहीं, बल्कि जरूरत के अनुसार जांच और असामान्य परिणाम आने पर समय पर इलाज भी जरूरी है।

    H. pylori से पेट के कैंसर का खतरा

    Helicobacter pylori यानी H. pylori एक बैक्टीरिया है जो पेट में संक्रमण पैदा कर सकता है। लंबे समय तक रहने वाला संक्रमण पेट की अंदरूनी परत में सूजन और अन्य बदलावों से जुड़ा हो सकता है।

    अध्ययन में 2024 के दौरान दुनियाभर में करीब 7.6 लाख कैंसर मामलों को H. pylori संक्रमण से संबंधित बताया गया है। इसका संबंध मुख्य रूप से पेट के कैंसर से है।

    हालांकि H. pylori संक्रमण होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को निश्चित रूप से पेट का कैंसर होगा। लेकिन कुछ लोगों में लंबे समय तक रहने वाला संक्रमण जोखिम बढ़ा सकता है। इसलिए जिन लोगों में डॉक्टर संक्रमण की जांच या इलाज की सलाह दें, उनके लिए उचित चिकित्सकीय देखभाल महत्वपूर्ण हो सकती है।

    दुनिया में ये पांच संक्रमण कैंसर से सबसे ज्यादा जुड़े

    अध्ययन में कई संक्रमण पैदा करने वाले एजेंट्स का आकलन किया गया। इनमें पांच प्रमुख संक्रमणों को संक्रमण से जुड़े वैश्विक कैंसर मामलों के बड़े हिस्से के लिए जिम्मेदार पाया गया।

    • H. pylori: करीब 7.6 लाख कैंसर मामले
    • HPV: करीब 7.5 लाख मामले
    • हेपेटाइटिस B वायरस: करीब 3.6 लाख मामले
    • Epstein-Barr virus (EBV): करीब 2.6 लाख मामले
    • हेपेटाइटिस C वायरस: करीब 1.6 लाख मामले

    रिपोर्ट के मुताबिक संक्रमण से जुड़े कैंसर का बोझ एशिया सहित निम्न और मध्यम आय वाले देशों में काफी अधिक है। ऐसे में टीकाकरण, संक्रमण की पहचान और समय पर इलाज कैंसर की रोकथाम की रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

    हेपेटाइटिस B और C भी बढ़ा सकते हैं लिवर कैंसर का जोखिम

    लंबे समय तक रहने वाला हेपेटाइटिस B या हेपेटाइटिस C संक्रमण लिवर कैंसर, विशेष रूप से हेपैटोसेलुलर कार्सिनोमा, के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा है।

    हेपेटाइटिस B के खिलाफ प्रभावी वैक्सीन उपलब्ध है, इसलिए टीकाकरण संक्रमण से बचाव का महत्वपूर्ण तरीका है। दूसरी ओर, हेपेटाइटिस B और C की समय पर जांच भी जरूरी है, क्योंकि कई लोगों में संक्रमण लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के रह सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार संक्रमण की पहचान होने पर डॉक्टर की सलाह के अनुसार निगरानी और उपचार किया जाना चाहिए।

    सिर्फ वैक्सीन नहीं, स्क्रीनिंग भी जरूरी

    विशेषज्ञों के मुताबिक संक्रमण से जुड़े कैंसर का बोझ कम करने के लिए कई स्तरों पर काम करने की जरूरत है। इनमें HPV और हेपेटाइटिस B का टीकाकरण, जरूरत के अनुसार H. pylori तथा हेपेटाइटिस B और C की जांच, संक्रमण का उचित इलाज और कैंसर स्क्रीनिंग शामिल हैं।

    सर्वाइकल कैंसर के मामले में नियमित स्क्रीनिंग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि शुरुआती चरण में कैंसर से पहले होने वाले कुछ बदलावों की पहचान की जा सकती है और समय पर उपचार से आगे के जोखिम को कम किया जा सकता है।

    क्या हर संक्रमण कैंसर का कारण बनता है?

    नहीं। यह समझना बहुत जरूरी है कि हर वायरस, बैक्टीरिया या संक्रमण कैंसर का कारण नहीं बनता।

    वैज्ञानिक शोध में केवल कुछ विशेष संक्रमणों और कुछ खास प्रकार के कैंसर के बीच संबंध स्थापित किया गया है। इसके अलावा संक्रमण होने के बाद कैंसर विकसित होगा या नहीं, यह व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली, संक्रमण की अवधि, अन्य जोखिम कारकों और कई जैविक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

    इसलिए किसी संक्रमण की रिपोर्ट पॉजिटिव आने पर घबराने के बजाय डॉक्टर से सही सलाह लेना और जरूरत पड़ने पर उपचार कराना अधिक महत्वपूर्ण है।

    2050 तक बढ़ सकता है कैंसर का वैश्विक बोझ

    अध्ययन में दुनिया में कैंसर के नए मामलों में आने वाले दशकों में बड़ी वृद्धि का अनुमान भी सामने रखा गया है। 2024 में करीब 2 करोड़ नए कैंसर मामलों से यह संख्या 2050 तक लगभग 3.5 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।

    इस वृद्धि में मुख्य

  • UN में स्थायी सीट मिल: जाए तो क्या बदल जाएगा? जानिए भारत की वैश्विक भूमिका पर कितना पड़ेगा असर.

    UN में स्थायी सीट मिल: जाए तो क्या बदल जाएगा? जानिए भारत की वैश्विक भूमिका पर कितना पड़ेगा असर.

    UN में स्थायी सीट मिल: जाए तो क्या बदल जाएगा? जानिए भारत की वैश्विक भूमिका पर कितना पड़ेगा असर.

    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में स्थायी सदस्यता भारत की लंबे समय से चली आ रही प्रमुख कूटनीतिक मांगों में शामिल है। सितंबर 2026 में रूस ने एक बार फिर भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन किया है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में सुरक्षा परिषद में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बेहतर प्रतिनिधित्व की जरूरत पर जोर दिया।

    फिलहाल सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य हैं। इनमें अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन पांच स्थायी सदस्य हैं, जबकि 10 सदस्य दो साल के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं।

    ऐसे में सवाल उठता है कि अगर भविष्य में सुरक्षा परिषद का विस्तार होता है और भारत को स्थायी सीट मिलती है, तो इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका में क्या बदलाव आ सकता है?

    सबसे बड़ा बदलाव क्या होगा?

    स्थायी सदस्य बनने से भारत को सुरक्षा परिषद में लगातार मौजूद रहने का अधिकार मिलेगा। अभी भारत जब भी गैर-स्थायी सदस्य के रूप में चुना जाता है, तो उसका कार्यकाल दो साल का होता है। स्थायी सदस्यता की स्थिति में बार-बार चुनाव लड़कर परिषद में लौटने की जरूरत नहीं होगी।

    सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों पर विचार करती है। इसलिए स्थायी सदस्य के तौर पर भारत को इन चर्चाओं और निर्णय प्रक्रियाओं में लगातार भाग लेने का अवसर मिलेगा।

    क्या भारत को वीटो पावर भी मिलेगी?

    यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सुरक्षा परिषद के सुधार का अंतिम मॉडल क्या तय करता है।

    मौजूदा व्यवस्था में पांच स्थायी सदस्यों के पास वीटो का अधिकार है। किसी गैर-प्रक्रियात्मक प्रस्ताव को पारित करने के लिए कम से कम नौ वोटों के साथ स्थायी सदस्यों की सहमति जरूरी होती है। अगर पांच स्थायी सदस्यों में से कोई एक नकारात्मक वोट देता है, तो प्रस्ताव रुक सकता है।

    भारत की वर्तमान स्थिति यह है कि अगर उसे नया स्थायी सदस्य बनाया जाता है तो नए स्थायी सदस्यों को मौजूदा स्थायी सदस्यों के समान अधिकार और जिम्मेदारियां मिलनी चाहिए। भारत ने सुरक्षा परिषद सुधार की वार्ताओं में नए स्थायी सदस्यों के लिए वीटो के मुद्दे पर यही रुख रखा है।

    हालांकि यह अभी तय व्यवस्था नहीं है। संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद के सुधार को लेकर अलग-अलग देशों और समूहों के बीच मतभेद हैं। कुछ देश नए स्थायी सदस्यों को वीटो देने के पक्ष में हैं, जबकि कुछ प्रस्ताव स्थायी सदस्यता के विस्तार का ही विरोध करते हैं।

    वैश्विक फैसलों में भारत की लगातार मौजूदगी

    स्थायी सदस्यता से भारत को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर लंबे समय तक लगातार अपनी स्थिति रखने का अवसर मिलेगा।

    युद्ध, संघर्ष, शांति स्थापना और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सुरक्षा परिषद की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे मामलों पर चर्चा के दौरान भारत की मौजूदगी किसी दो साल के कार्यकाल तक सीमित नहीं रहेगी।

    इससे भारत को बहुपक्षीय कूटनीति में अपनी प्राथमिकताओं को लगातार सामने रखने का अधिक संस्थागत अवसर मिल सकता है।

    ग्लोबल साउथ के मुद्दों को उठाने का मंच

    भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों और कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों की भागीदारी बढ़ाने की बात करता रहा है।

    सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट मिलने की स्थिति में भारत एशिया और व्यापक ग्लोबल साउथ से जुड़े मुद्दों को परिषद की स्थायी सदस्यता के जरिए उठाने की कोशिश कर सकता है।

    हालांकि इसे केवल भारत के प्रतिनिधित्व के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। सुरक्षा परिषद सुधार में अफ्रीका, एशिया-प्रशांत और लैटिन अमेरिका समेत विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व को लेकर अलग-अलग प्रस्ताव मौजूद हैं। G4 यानी भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील भी सुरक्षा परिषद के विस्तार की वकालत करते हैं।

    भारत की कूटनीतिक स्थिति पर क्या असर पड़ सकता है?

    स्थायी सदस्यता भारत को दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण बहुपक्षीय सुरक्षा संस्थाओं में से एक में स्थायी स्थान देगी।

    इससे भारत को दूसरे देशों के साथ बातचीत, गठबंधन निर्माण और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी स्थिति रखने के लिए एक स्थायी संस्थागत मंच मिलेगा।

    हालांकि इसका यह मतलब नहीं होगा कि सुरक्षा परिषद का हर फैसला भारत के पक्ष में होगा या भारत अकेले किसी अंतरराष्ट्रीय निर्णय को नियंत्रित कर सकेगा। सुरक्षा परिषद की व्यवस्था सामूहिक मतदान और दूसरे स्थायी तथा निर्वाचित सदस्यों के रुख पर भी निर्भर करती है।

    क्या इससे NSG की सदस्यता पक्की हो जाएगी?

    स्थायी UNSC सदस्यता और न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप यानी NSG की सदस्यता दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट मिलने से भारत की NSG सदस्यता अपने आप सुनिश्चित नहीं होगी।

    हां, स्थायी सदस्यता से भारत की बहुपक्षीय कूटनीतिक स्थिति मजबूत हो सकती है और इससे अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बातचीत के लिए उसका संस्थागत प्रभाव बढ़ सकता है। लेकिन NSG में सदस्यता का फैसला अपने अलग नियमों और सदस्य देशों की सहमति से जुड़ा है।

    स्थायी सीट के साथ बढ़ेंगी जिम्मेदारियां भी

    सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता सिर्फ अधिक अधिकारों का मामला नहीं होगी। इसके साथ अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े जटिल मामलों पर लगातार जिम्मेदारी भी आएगी।

    संघर्षों, प्रतिबंधों, शांति अभियानों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रस्तावों पर भारत को लगातार अपना रुख तय करना होगा। वीटो का अधिकार मिलने की स्थिति में यह जिम्मेदारी और महत्वपूर्ण हो सकती है।

    अभी कहां खड़ा है मामला?

    भारत की स्थायी सदस्यता को लेकर रूस सहित कई देशों ने समर्थन व्यक्त किया है, लेकिन सुरक्षा परिषद की संरचना बदलना एक जटिल अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के बीच व्यापक सहमति और चार्टर में आवश्यक बदलावों की प्रक्रिया से गुजरना होगा।

    इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत को कब स्थायी सीट मिलेगी या नए स्थायी सदस्यों को वीटो का अधिकार किस रूप में दिया जाएगा। फिलहाल सुरक्षा परिषद सुधार पर संयुक्त राष्ट्र में बातचीत जारी है।

    अगर भारत को भविष्य में स्थायी सदस्यता मिलती है, तो सबसे बड़ा संस्थागत बदलाव यह होगा कि वह सुरक्षा परिषद की निर्णय प्रक्रिया में स्थायी रूप से शामिल होगा। वीटो सहित उसके अधिकारों की अंतिम स्थिति सुरक्षा परिषद सुधार के जिस मॉडल पर सदस्य देश सहमत होंगे, उसी पर निर्भर करेगी।

  • तीन दिन में मोबाइल ठीक: नहीं हुआ तो तलवार लेकर दुकान पहुंचा ग्राहक, दुकानदार को दी धमकी.

    तीन दिन में मोबाइल ठीक: नहीं हुआ तो तलवार लेकर दुकान पहुंचा ग्राहक, दुकानदार को दी धमकी.

    तीन दिन में मोबाइल ठीक: नहीं हुआ तो तलवार लेकर दुकान पहुंचा ग्राहक, दुकानदार को दी धमकी.

    नागपुर: महाराष्ट्र के नागपुर से मोबाइल रिपेयरिंग को लेकर विवाद का हैरान करने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि मोबाइल तीन दिन में ठीक नहीं होने से नाराज एक युवक तलवार लेकर रिपेयरिंग की दुकान पर पहुंच गया और दुकानदार को धमकाने लगा। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।

    मोबाइल ठीक होने में हुई देरी तो भड़का ग्राहक

    मामला नागपुर के पारडी इलाके का बताया जा रहा है। पुलिस के अनुसार, सूरज वाघमारे नाम के युवक ने अपना मोबाइल रिपेयर कराने के लिए पवन घुमडे की दुकान पर दिया था। तीन दिन बीत जाने के बाद भी मोबाइल ठीक नहीं हुआ तो वह नाराज हो गया।

    आरोप है कि इसके बाद सूरज तलवार लेकर दुकान पर पहुंचा और मोबाइल की मरम्मत में देरी को लेकर दुकानदार से विवाद करने लगा। इसी दौरान उसने तलवार दिखाकर दुकानदार को धमकी दी।

    दुकान में मची अफरा-तफरी

    तलवार लेकर युवक के दुकान में पहुंचने के बाद वहां मौजूद लोगों के बीच अफरा-तफरी का माहौल बन गया। इसी दौरान किसी व्यक्ति ने पूरी घटना को अपने मोबाइल कैमरे में रिकॉर्ड कर लिया।

    वीडियो में आरोपी युवक तलवार हाथ में लिए दिखाई दे रहा है। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस तक मामला पहुंचा।

    पुलिस ने आरोपी को किया गिरफ्तार

    पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए आरोपी के खिलाफ केस दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के मुताबिक, सूरज वाघमारे के खिलाफ पहले से भी कई मामले दर्ज हैं।

    पुलिस अब उसके पुराने आपराधिक मामलों की जानकारी जुटाने के साथ यह भी पता लगा रही है कि घटना के दौरान इस्तेमाल की गई तलवार उसके पास कहां से आई।

    पारडी पुलिस ने घटना से जुड़े वीडियो और अन्य साक्ष्यों को जांच में शामिल किया है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि दुकान पर विवाद किस बात को लेकर बढ़ा और घटना के दौरान वास्तव में क्या-क्या हुआ।

    पारडी पुलिस थाने की इंस्पेक्टर नंदा बर्वे के अनुसार, आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है और मामले में आगे की जांच जारी है। फिलहाल पुलिस घटना से जुड़े अन्य पहलुओं की पड़ताल कर रही है।

  • Gut Health : बदलते मौसम में पाचन ठीक रखने में मदद करेंगे ये 3 विंटर फ्रूट्स, एक्सपर्ट्स से जानें सही तरीका.

    Gut Health : बदलते मौसम में पाचन ठीक रखने में मदद करेंगे ये 3 विंटर फ्रूट्स, एक्सपर्ट्स से जानें सही तरीका.

    Gut Health : बदलते मौसम में पाचन ठीक रखने में मदद करेंगे ये 3 विंटर फ्रूट्स, एक्सपर्ट्स से जानें सही तरीका.

    सर्दी का मौसम आते ही हमारे खानपान की आदतें बदलने लगती हैं, जिसका सीधा असर हमारे पाचन तंत्र (Digestive System) पर पड़ता है। मौसम में बदलाव के कारण अक्सर पेट में भारीपन, गैस या ब्लोटिंग जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं। हालांकि, सही डाइट और मौसमी फलों को अपनी डेली डाइट में शामिल करके गट हेल्थ (Gut Health) को आसानी से बेहतर रखा जा सकता है। हेल्थ एक्सपर्ट्स और डायटीशियनों के अनुसार, सर्दियों में मिलने वाले कुछ खास फल न केवल पाचन क्रिया को सुचारू बनाते हैं, बल्कि आंतों के गुड बैक्टीरिया को भी बढ़ावा देते हैं।

    सीनियर न्यूट्रिशन एडिटर और डायटीशियन जेसिका बॉल के मुताबिक, मौसम बदलने पर अपनी डाइट में फाइबर से भरपूर फल शामिल करना पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद हो सकता है। सेब, नाशपाती और बेरीज जैसे फलों में डाइटरी फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और दूसरे पोषक तत्व पाए जाते हैं। फाइबर आंतों की सेहत बनाए रखने और मल त्याग को नियमित रखने में मदद करता है।इन फलों को आप दिन में स्नैक के तौर पर या नाश्ते के साथ खा सकते हैं। हालांकि, हर व्यक्ति का पाचन तंत्र अलग होता है। कुछ लोगों को सेब और नाशपाती जैसे फलों से गैस या पेट फूलने की समस्या हो सकती है, खासकर अगर उन्हें फ्रुक्टोज पचाने में परेशानी होती है। इसलिए अपनी पाचन क्षमता के अनुसार फलों का चुनाव और मात्रा तय करना बेहतर है। आइए जानते हैं कि सेब, नाशपाती और बेरीज पाचन तंत्र के लिए किस तरह फायदेमंद हो सकते हैं।

    सेब का करें सेवन

    सेब सर्दी के मौसम का प्रमुख फल है जिसकी कई किस्में सर्द मौसम में मौजूद रहती हैं। Journal of Food Science and Technology (2017) में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक सेब के छिलके (Apple Peel) में गूदे की तुलना में 2 से 3 गुना अधिक फेनोलिक कंपाउंड और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं। छिलके में मौजूद क्वेरसेटिन (Quercetin) और कैटेचिन (Catechin) आंतों की अंदरूनी परत को सूजन से बचाते हैं। Nutrients जर्नल (2020) की रिसर्च बताती है कि 100 ग्राम सेब में औसतन 2.4 ग्राम फाइबर होता है । सेब का फाइबर पाचन तंत्र में पानी को सोखकर स्टूल (Stool) के वॉल्यूम को बढ़ाता है, जिससे कब्ज की समस्या दूर होती है।

    सेब को आप सीधे खा सकते हैं या सलाद, डेजर्ट और दूसरे व्यंजनों में शामिल कर सकते हैं। एक सेब में लगभग 4 ग्राम फाइबर होता है, जो पेट को लंबे समय तक भरा रखने और मल त्याग को नियमित रखने में मदद कर सकता है। सेब में कुछ फेनोलिक कंपाउंड भी पाए जाते हैं, जो पेट और छोटी आंत में पाचन प्रक्रिया को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। सेब खाते समय कोशिश करें कि उसे छिलके के साथ खाएं, क्योंकि छिलके सहित सेब में छिले हुए सेब की तुलना में फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा ज्यादा होती है।

    नाशपाती का करें सेवन

    नाशपाती भी इस मौसम में मिलने वाला पौष्टिक फल है जिसे आप छिलके के साथ खा सकते हैं। Frontiers in Nutrition और Microorganisms (2021) में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, नाशपाती में प्रचुर मात्रा में घुलनशील फाइबर पेक्टिन पाया जाता है। पेक्टिन आंतों में पहुंचकर एक जेल (Gel Layer) बनाता है, जो पाचन को सुचारू बनाता है। पेक्टिन आंतों में Bifidobacteria और Lactobacillus जैसे गुड बैक्टीरिया के लिए प्रीबायोटिक के रूप में काम करता है, जिससे शॉर्ट-चेन फैटी एसिड (SCFAs) का निर्माण होता है और गट हेल्थ मजबूत होती है। American Journal of Clinical Nutrition के अनुसार, नाशपाती में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले सोर्बिटोल और फ्रुक्टोज में माइल्ड लैक्सेटिव गुण होते हैं, जो प्राकृतिक रूप से पेट साफ करने में मदद करते हैं।

    इसे आप सीधे खा सकते हैं या केक, टार्ट और दूसरे व्यंजनों में इस्तेमाल कर सकते हैं। नाशपाती में लगभग 6 ग्राम फाइबर पाया जाता है। इसमें मौजूद घुलनशील फाइबर पेक्टिन आंत में जेल जैसा पदार्थ बनाता है, जिससे मल में मात्रा बढ़ाने और उसे आसानी से बाहर निकालने में मदद मिल सकती है। पेक्टिन एक प्रीबायोटिक की तरह भी काम कर सकता है, यानी यह आंत में मौजूद गुड बैक्टीरिया के लिए भोजन का काम करता है। नाशपाती में मौजूद फ्रुक्टोज, सोर्बिटोल और फाइबर के कारण इसका हल्का प्राकृतिक लैक्सेटिव प्रभाव भी हो सकता है।

    बेरीज का करें सेवन

    USDA Food Data Central और Journal of Agricultural and Food Chemistry के अनुसार, 1 कप रास्पबेरी या ब्लैकबेरी में लगभग 8 ग्राम फाइबर होता है। इनके छोटे-छोटे बीजों में अघुलनशील फाइबर होता है, जो आंतों की पेरीस्टाल्टिक मूवमेंट को बढ़ाता है। Nutrients (2018) और Food & Function जर्नल की रिसर्च में पाया गया कि बेरीज में मौजूद एंथोसायनिन (Anthocyanins) और पॉलीफेनॉल्स (Polyphenols) आंतों की सूजन (Intestinal Inflammation) को कम करते हैं। यह गट बैरियर को मजबूत बनाकर इंफ्लेमेटरी बाउल डिसीज (IBD) और पेट से जुड़ी दूसरी समस्याओं से राहत दिलाने में मददगार साबित होते हैं।

    ब्लैकबेरी और रास्पबेरी जैसी बेरीज को स्मूदी, दही या दूसरे व्यंजनों में आसानी से शामिल किया जा सकता है। ये पाचन तंत्र के लिए भी उपयोगी हो सकती हैं। एक कप ब्लैकबेरी या रास्पबेरी में लगभग 8 ग्राम फाइबर पाया जाता है। इनमें मौजूद छोटे-छोटे बीज भी अघुलनशील फाइबर देते हैं, जो आंतों में भोजन और मल की गति को बनाए रखने में मदद करता है। बेरीज में पॉलीफेनॉल नामक एंटीऑक्सीडेंट भी होते हैं। कुछ रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि पॉलीफेनॉल आंतों में सूजन को कम करने में मददगार साबित होता है।

    डिस्क्लेमर : यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से प्रदान की गई है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं है। पाचन से जुड़ी गंभीर समस्या होने पर या डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले अपने डॉक्टर या प्रमाणित डायटीशियन से परामर्श अवश्य लें।

  • चांद पर हथौड़ा और ‘पंख’ एक साथ गिराए जाएं तो कौन पहले पहुंचेगा? जवाब जानकर चौंक जाएंगे.

    चांद पर हथौड़ा और ‘पंख’ एक साथ गिराए जाएं तो कौन पहले पहुंचेगा? जवाब जानकर चौंक जाएंगे.

    चांद पर हथौड़ा और ‘पंख’ एक साथ गिराए जाएं तो कौन पहले पहुंचेगा? जवाब जानकर चौंक जाएंगे.

    अगर किसी भारी हथौड़े और बेहद हल्के पंख को एक ही ऊंचाई से एक साथ नीचे गिराया जाए तो जाहिर तौर पर ज्यादातर लोग यही सोचेंगे कि हथौड़ा पहले जमीन पर पहुंचेगा। आखिर उसका वजन पंख से कई गुना ज्यादा होता है।

    लेकिन अगर यही प्रयोग चांद पर किया जाए तो नतीजा बिल्कुल अलग नहीं, बल्कि हमारी आम धारणा के उलट दिखाई देगा। वहां हथौड़ा और पंख लगभग एक ही समय पर चांद की सतह से टकराएंगे।

    इसके पीछे कोई रहस्य नहीं, बल्कि भौतिक विज्ञान का बेहद महत्वपूर्ण सिद्धांत है।

    चांद पर दोनों एक साथ क्यों गिरते हैं?

    इसका सबसे बड़ा कारण चांद का लगभग निर्वात जैसा वातावरण है। चांद पर पृथ्वी की तरह घना वायुमंडल नहीं है। इसलिए वहां गिरती हुई वस्तुओं को हवा के प्रतिरोध का सामना लगभग नहीं करना पड़ता।

    पृथ्वी पर जब पंख और हथौड़े को एक साथ गिराया जाता है तो हवा पंख को ज्यादा धीमा करती है। पंख का सतह क्षेत्र उसके वजन की तुलना में काफी ज्यादा होता है, इसलिए हवा का प्रतिरोध उस पर अधिक प्रभाव डालता है।

    हथौड़ा ठोस और अपेक्षाकृत सघन होने के कारण हवा से कम प्रभावित होता है। इसलिए पृथ्वी पर हथौड़ा पंख से पहले नीचे पहुंच जाता है।

    लेकिन चांद पर हवा का यह प्रतिरोध लगभग मौजूद ही नहीं है। ऐसे में दोनों वस्तुओं पर चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव समान त्वरण के रूप में दिखाई देता है।

    क्या भारी चीज हमेशा तेजी से गिरती है?

    नहीं। यदि हवा का प्रतिरोध मौजूद न हो तो किसी वस्तु का द्रव्यमान उसके गुरुत्वीय त्वरण को निर्धारित नहीं करता।

    यानी निर्वात में एक भारी हथौड़ा और हल्का पंख, अगर उन्हें एक ही ऊंचाई से एक साथ छोड़ा जाए, तो दोनों एक ही गुरुत्वीय त्वरण से नीचे आएंगे।

    यह बात पृथ्वी पर रोजमर्रा के अनुभव से थोड़ी अलग लगती है, क्योंकि हम सामान्य तौर पर हवा की मौजूदगी में वस्तुओं को गिरते हुए देखते हैं।

    चांद की ग्रेविटी पृथ्वी से कमजोर है

    चांद पर वस्तुएं पृथ्वी की तुलना में धीमी गति से गिरती हैं। इसका कारण यह है कि चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में काफी कमजोर है।

    चांद की सतह पर गुरुत्वीय त्वरण करीब 1.62 मीटर प्रति सेकंड² है, जबकि पृथ्वी पर यह करीब 9.81 मीटर प्रति सेकंड² होता है।

    इसका मतलब यह नहीं है कि भारी चीज हल्की चीज से धीरे गिरेगी। दोनों पर चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण का त्वरण लगभग समान रहेगा।

    गैलीलियो ने सदियों पहले क्या बताया था?

    गिरती हुई वस्तुओं को लेकर वैज्ञानिक गैलीलियो गैलीली ने सदियों पहले महत्वपूर्ण विचार दिया था। उनका तर्क था कि अगर हवा के प्रतिरोध को हटा दिया जाए तो अलग-अलग द्रव्यमान वाली वस्तुएं एक ही दर से गिर सकती हैं।

    इस विचार ने उस समय की प्रचलित धारणा को चुनौती दी थी कि भारी वस्तु हमेशा हल्की वस्तु से तेजी से गिरेगी।

    बाद में प्रयोगों और आधुनिक भौतिकी ने निर्वात में इस सिद्धांत को मजबूती से स्थापित किया।

    अपोलो 15 ने चांद पर करके दिखाया था प्रयोग

  • एमपी के पूर्व CM कमलनाथ की जमीन पर यूपी में जालसाजी! पिता का फर्जी डेथ सर्टिफिकेट बनाकर 26 बीघा पर कब्जे की कोशिश

    एमपी के पूर्व CM कमलनाथ की जमीन पर यूपी में जालसाजी! पिता का फर्जी डेथ सर्टिफिकेट बनाकर 26 बीघा पर कब्जे की कोशिश

    एमपी के पूर्व CM कमलनाथ की जमीन पर यूपी में जालसाजी! पिता का फर्जी डेथ सर्टिफिकेट बनाकर 26 बीघा पर कब्जे की कोशिश

    मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता कमलनाथ के पिता स्वर्गीय महेंद्रनाथ की उत्तर प्रदेश के बिजनौर स्थित करीब 26 बीघा कृषि भूमि पर भू-माफियाओं द्वारा अवैध कब्जे का मामला सामने आया है. जिले के नजीबाबाद तहसील के गांव अमीखानपुर की इस जमीन को फर्जी वसीयत और झूठे मृत्यु प्रमाण पत्र के सहारे हड़पने का प्रयास किया गया. कमलनाथ द्वारा 18 मई 2026 को नजीबाबाद तहसील में जमीन की विरासत अपने नाम दर्ज कराने के आवेदन के बाद इस धोखाधड़ी की जानकारी सामने आई. 30 सितंबर 2026 को नजीबाबाद थाने में केस दर्ज कर पुलिस ने अगले ही दिन 1 अक्टूबर को दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.

    तहसील में आवेदन से खुला फर्जीवाड़े का खेल

    कमलनाथ के पिता महेंद्रनाथ अमीखानपुर गांव के गाटा संख्या 429 और रकबा 2.1560 हेक्टेयर जमीन के असली मालिक थे. उन्होंने यह जमीन बटाई पर दे रखी थी और लंबे समय तक परिवार का कोई सदस्य देखरेख के लिए वहां नहीं गया.

    18 मई 2026 को जब कमलनाथ ने विरासत अपने नाम कराने का आवेदन दिया, तब लेखपाल ने रिपोर्ट भेजकर जमीन को विवादित बताया. इसके बाद धर्मपाल सिंह बनाम ग्राम सभा के पुराने मुकदमे और जमीन पर पेश की गई एक फर्जी वसीयत का पता चला.

    1998 की फर्जी वसीयत और गलत डेथ सर्टिफिकेट

    जांच में सामने आया कि 7 अक्टूबर 1998 की एक अपंजीकृत फर्जी वसीयत के आधार पर जमीन पर दावा ठोका गया था. इतना ही नहीं, जालसाजों ने 10 अप्रैल 2003 का महेंद्रनाथ का फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र भी नजीबाबाद से बनवा लिया था. जबकि असलियत में उनकी मृत्यु 7 सितंबर 2004 को नई दिल्ली के एस्कार्ट अस्पताल में हुई थी. इस दस्तावेज में कमलनाथ की माता का नाम भी गलत दर्ज किया गया था. इन कूटरचित कागजातों के बल पर करीब 26 बीघा जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया गया.

    लेखपाल समेत कई पर साजिश का आरोप

    कमलनाथ की शिकायत में धर्मपाल सिंह, जसबिंदर सिंह ढिल्लो, विजय शंकर पांडे और लेखपाल डेविड कुमार सहित अन्य लोगों पर मिलकर इस पूरी साजिश को रचने का आरोप लगा. आरोपी लंबे समय से जमीन की देखरेख न होने का फायदा उठाकर बाकी जमीन को भी खुर्द-बुर्द करने की फिराक में थे.

    पुलिस एक्शन में दो आरोपी गिरफ्तार

    शिकायत मिलने के बाद 30 सितंबर 2026 को नजीबाबाद थाने में धोखाधड़ी और जालसाजी की बीएनएस धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज हुआ. पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 1 अक्टूबर को महावतपुर बिल्लौच निवासी धर्मपाल सिंह और नजीबाबाद निवासी विजय शंकर को गिरफ्तार कर लिया. फिलहाल पुलिस अन्य नामजद आरोपियों और फर्जी कागजातों की बारीकी से जांच कर रही है ताकि जमीन वापस दिलाई जा सके.