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  • पाकिस्तान में 100 साल पुराना हिंदू मंदिर ढहाया गया, जमीन मदरसे में मिलाने का आरोप..

    पाकिस्तान में 100 साल पुराना हिंदू मंदिर ढहाया गया, जमीन मदरसे में मिलाने का आरोप..

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    पाकिस्तान में 100 साल से अधिक पुराना मंदिर ढहाया गया। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक सदी से अधिक पुराने एक हिंदू मंदिर को उसकी जमीन को कथित तौर पर एक मदरसे में शामिल करने के लिए ढहा दिया गया। स्थानीय लोगों, अल्पसंख्यक संगठनों और एक राजनीतिक दल ने आरोप लगाया कि कुछ धार्मिक कट्टरपंथियों ने मंदिर को उसकी जमीन को पास के एक मदरसे में मिलाने के लिए ढहा दिया। वहीं, सरकार ने दावा किया कि पुराना मंदिर भारी बारिश के कारण अपने आप ढह गया।

    करीब 1000 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला यह 100 से 125 साल पुराना मंदिर लाहौर से करीब 130 किलोमीटर दूर पंजाब प्रांत के नारोवाल जिले के सिराज गांव में स्थित था। बताया जा रहा है कि 21 अगस्त को मंदिर गिराने वाले लोग प्रतिबंधित कट्टरपंथी इस्लामी संगठन तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (TLP) से जुड़े थे। पाकिस्तान मसीहा मिल्लत पार्टी (PMMP) ने पंजाब सरकार से मंदिर गिराने में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने और मंदिर का पुनर्निर्माण सुनिश्चित करने की मांग की है।

    मंदिर की सुरक्षा में विफल अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग

    पीएमएमपी के अध्यक्ष असलम परवेज सहोत्रा ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि उन्होंने 28 अगस्त को पंजाब के अतिरिक्त गृह सचिव से मुलाकात की और कथित आरोपियों तथा मंदिर की सुरक्षा में विफल रहे अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए एक लिखित आवेदन सौंपा। उन्होंने आरोप लगाया कि मंदिर के शिखर की धातु, अन्य सामग्री और मलबे की ईंटों को भी बाद में वहां से हटा दिया गया।

    हिंदू समुदाय के नेता रतन लाल ने प्राचीन मंदिर को गिराए जाने की निंदा करते हुए सरकार से इसके पुनर्निर्माण का आदेश देने की मांग की। उन्होंने कहा, “जिला प्रशासन और विस्थापितों की संपत्ति का ट्रस्ट बोर्ड (ईटीपीबी) मंदिर स्थल की सुरक्षा करने या कथित कब्जाधारियों को हटाने के लिए पर्याप्त कदम उठाने में विफल रहे जिसके कारण आखिरकार मंदिर को गिरा दिया गया।”

    मंदिर 100 से 125 साल पुराना था

    ईटीपीबी के वरिष्ठ अधिकारी राणा इफ्तिखार ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि मंदिर करीब 100 से 125 साल पुराना था और भारी बारिश के कारण ढह गया। उन्होंने कहा, “हमारे रिकॉर्ड में मंदिर का कोई नाम दर्ज नहीं है। हालांकि, यह बहुत पुराना मंदिर है। यह 100 से 125 साल से अधिक पुराना था।” सहोत्रा ने मंदिर को उसके मूल स्वरूप में दोबारा बनाने और पंजाब में हिंदू मंदिरों, सिख गुरुद्वारों तथा ईसाई चर्च एवं उनसे जुड़ी संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।

    ईटीपीबी अधिकारी इफ्तिखार ने कहा कि मंदिर से लगी जमीन मदरसा स्थापित करने के लिए पट्टे पर दी गई थी लेकिन मंदिर की जमीन किसी को पट्टे पर नहीं दी गई थी। उन्होंने कहा कि मंदिर के पुनर्निर्माण पर ईटीपीबी के वरिष्ठ अधिकारी फैसला करेंगे। नारोवाल जिला शांति कमेटी और पाक धर्मस्थान हिंदू समिति के सदस्य रतन लाल ने कहा, “हम उस स्थान पर जाने से भी डर रहे हैं क्योंकि वहां अब भी मदरसा संचालित है।”

  • हफ्ते में दो बार दही के साथ चावल को फर्मेंट करके खाएं, गट हेल्थ में हो सकता है सुधार, आयुर्वेदिक एक्सपर्ट ने बताया तरीका..

    हफ्ते में दो बार दही के साथ चावल को फर्मेंट करके खाएं, गट हेल्थ में हो सकता है सुधार, आयुर्वेदिक एक्सपर्ट ने बताया तरीका..

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    खराब पाचन, पेट में गैस, ब्लोटिंग और कब्ज की समस्या आजकल बहुत आम हो चुकी है। गट हेल्थ को दुरुस्त रखने के लिए डाइट में सही पोषक तत्वों और प्रोबायोटिक्स का होना बेहद जरूरी है। भारतीय पारंपरिक खानपान में फर्मेंटेड यानी खमीर बने भोजन को पेट के लिए बहुत फायदेमंद माना गया है। आयुर्वेदिक विशेषज्ञ एवं योगाचार्य नित्यानंदम श्री के अनुसार, हफ्ते में दो बार दही और चावल को एक साथ फर्मेंट करके खाने से आंतों में गुड बैक्टीरिया (Good Bacteria) बढ़ते हैं, जिससे पाचन क्रिया सुचारू होती है। हालांकि, इसे तैयार करने का सही तरीका और समय जानना बेहद जरूरी है, ताकि शरीर को इसका पूरा फायदा मिल सके। आइए एक्सपर्ट से समझते हैं कि फर्मेंटेड दही-चावल गट हेल्थ में कैसे सुधार कर सकते है और इसे डाइट में शामिल करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

    फर्मेंटेड फूड्स और गट हेल्थ का कनेक्शन

    आंतों में मौजूद माइक्रोबायोम पाचन और शरीर की कई प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। कुछ फर्मेंटेड खाद्य पदार्थों में मौजूद जीवित सूक्ष्मजीव और उनके मेटाबोलिक उत्पाद आंतों की हेल्थ को सुधारने में मदद करते हैं। फर्मेंटेड फूड का सेवन करने से आंतों में मौजूद खराब बैक्टीरिया खत्म हो सकते हैं और गुड बैक्टीरिया बढ़ने लगते हैं। गट हेल्थ में सुधार करने के लिए डाइट में फर्मेंटेड फूड्स का सेवन करना, फल  और सब्जियों का सेवन करना, पर्याप्त नींद लेना,बॉडी को एक्टिव रखना और बैलेंस डाइट का सेवन करना जरूरी है।

    हफ्ते में एक से दो बार फर्मेंटेड दही और चावल को फर्मेंट करके खाना आपकी आंतों की सेहत में सुधार कर सकता है। लेकिन इसका रोज रोज सेवन नहीं करना चाहिए। किसी भी चीज की अधिकता सेहत को फायदे की जगह नुकसान पहुंचा सकती है।

    फर्मेंटेड दही और चावल कैसे पाचन पर करते हैं असर?

    दही और चावल का कॉम्बिनेशन भारतीय घरों में काफी पसंद किया जाता है। इसे फर्मेंट करके खाने की परंपरा भी कई जगहों पर देखने को मिलती है। फर्मेंटेशन के दौरान भोजन में मौजूद सूक्ष्मजीव सक्रिय होते हैं और उसमें कई तरह के बदलाव होते हैं। ऐसे फर्मेंटेड फूड्स को डाइट में शामिल करने से पाचन और आंतों के माइक्रोबायोम को फायदा मिल सकता है। हालांकि, किसी भी फर्मेंटेड फूड का सेवन संतुलित मात्रा में करना जरूरी है।

    दही खट्टा लगता है तो दूसरे ऑप्शन भी हैं मौजूद

    दही को लंबे समय तक रखने पर उसका स्वाद धीरे-धीरे खट्टा होने लगता है। इसका मुख्य कारण दही में मौजूद लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया द्वारा दूध में मौजूद लैक्टोज को लैक्टिक एसिड में बदलना है। जैसे-जैसे लैक्टिक एसिड की मात्रा बढ़ती है, दही का स्वाद अधिक खट्टा हो जाता है। बहुत खट्टी दही कुछ लोगों को पसंद नहीं आती और संवेदनशील लोगों में गले या पाचन से जुड़ी असहजता महसूस हो सकती है। अगर किसी कारण से दही का सेवन नहीं करना चाहते हैं, तो डाइट में दूसरे फर्मेंटेड फूड्स को शामिल कर सकते हैं। इडली, फर्मेंटेड बैटर से बना चीला और कांजी इसके कुछ उदाहरण हैं। फर्मेंटेड खाद्य पदार्थों में अलग-अलग तरह के सूक्ष्मजीव और उनके मेटाबोलिक उत्पाद मौजूद हो सकते हैं। हालांकि, इनके स्वास्थ्य प्रभाव फूड के प्रकार, फर्मेंटेशन की प्रक्रिया और सेवन की मात्रा पर निर्भर करते हैं।

    खट्टा दही को कैसे चावल के साथ फर्मेंट करके बनाएं हेल्दी

    अगर आपको दही खट्टा लगता है तो आप उसे चावल के साथ फर्मेंट करें। रात में अगर चावल के साथ दही को मिक्स करके रख दें तो सुबह ना सिर्फ दही फर्मेंट होगा बल्कि आपके चावल भी फर्मेंट हो जाएंगे। दही और चावल दोनों फूड आपकी सेहत को फायदा पहुंचाएंगे। दही-चावल को फर्मेंट करने के लिए पके हुए चावल में थोड़ी मात्रा में दही मिलाकर उसे ढककर रख दें। फर्मेंटेशन के बाद चावल और दही का मिश्रण सॉफ्ट हो जाता है और इसका स्वाद भी बदल जाता है। आपको दही और चावल को फर्मेंट करते समय कुछ सावधानी का बरतना जरूरी है।

    खास तौर पर पके हुए चावल को कमरे के तापमान पर लंबे समय तक रखना सुरक्षित नहीं माना जाता। कमरे के तापमान में चावल में Bacillus cereus जैसे बैक्टीरिया बढ़ सकते हैं, जो फूड पॉइजनिंग का कारण बन सकते हैं। इसलिए चावल को जल्दी ठंडा करके रेफ्रिजरेटर में रखना और सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल करना जरूरी है। केवल दही मिलाने से चावल में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया खत्म होने की गारंटी नहीं होती।

    दही-चावल में लगा सकते हैं तड़का

    दही-चावल को स्वादिष्ट बनाने के लिए इसमें हल्का तड़का लगाया जा सकता है। इसके लिए थोड़े से सरसों या तिल के तेल में जीरा, राई या सरसों के दाने डाले जा सकते हैं। इसमें करी पत्ता और स्वाद के अनुसार थोड़ी हल्दी भी मिलाई जा सकती है। तड़का लगाने के बाद उसे थोड़ा ठंडा करके दही-चावल में मिलाना बेहतर रहता है। बहुत अधिक गर्म तेल या तड़के को सीधे दही में डालने से दही की बनावट और स्वाद प्रभावित हो सकता है। दही-चावल में तड़के के लिए थोड़ी मात्रा में तेल या घी का इस्तेमाल किया जा सकता है। दही-चावल में स्वाद के अनुसार सेंधा नमक, हरी मिर्च, टमाटर या दूसरे फूड्स या सब्जी मिलाई जा सकती है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण पर आधारित है। फर्मेंटेड खाद्य पदार्थों के सेवन से होने वाले स्वास्थ्य लाभ व्यक्ति और भोजन की तैयारी के तरीके के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। पाचन संबंधी समस्या, फूड एलर्जी या किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या की स्थिति में विशेषज्ञ डॉक्टर या योग्य डाइटिशियन की सलाह जरूर लें।

  • जापानी लोगों की फिटनेस का राज़ हैं उनकी ये 5 आदतें, वजन कंट्रोल करने में करती हैं मदद, एक्सपर्ट से जानिए कैसे..

    जापानी लोगों की फिटनेस का राज़ हैं उनकी ये 5 आदतें, वजन कंट्रोल करने में करती हैं मदद, एक्सपर्ट से जानिए कैसे..

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    आप डाइटिंग करते हैं, वॉक करते हैं और खाना भी सोच समझकर खाते हैं लेकिन फिर भी पेट अंदर नहीं जा रहा तो इसकी वजह कैलरी नहीं है। सिर्फ कैलोरी कम करने से हर व्यक्ति में पेट की चर्बी कम हो, यह जरूरी नहीं है। आपकी बॉडी में फैट बढ़ाने के लिए एक हॉर्मोन जिम्मेदार है जिसे कॉर्टिसोल हॉर्मोन कहते है। ये तनाव का हॉर्मोन है जो हमारे बिस्तर से उठते ही थोड़ा सा बढ़ने लगता है,जिससे जागने और दिन की शुरुआत में सतर्कता बनाए रखने में मदद मिलती है। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक सुबह जागने के 30 से 45 मिनट के बाद कॉर्टिसोल हॉर्मोन नेचुरली पीक पर होता है। अगर आपके दिन की शुरुआत सुबह जल्दबाजी में शुरू होती है, या आप उठते ही फोन देखते हो, काम की बहुत टेंशन होती है या फिर जल्दी-जल्दी चाय नाश्ता करके ऑफिस भागते हैं तो बॉडी में बार बार सिग्नल जाता है कि कुछ परेशानी हो रही है।

    जब बॉडी में एलर्टनेस का सिग्नल जाता है तो हमारी बॉडी डिफेंसिव मूड में आ जाती है और कॉर्टिसोल हॉर्मोन को रिलीज करती है। इस तरह के तनाव में बॉडी फैट को स्टोर करना शुरु कर देती है। इस तनाव से एलर्ट होकर या उसे खतरा मानकर हमारी बॉडी एनर्जी को जगह-जगह स्टोर करना शुरु कर देती है। सबसे ज्यादा ये एनर्जी हमारे पेट में स्टोर होती है जो फैट के रूप में दिखता है। आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं के एक्सपर्ट डॉक्टर सलीम जैदी ने बताया आप कितनी ही डाइट कंट्रोल कर लें कितना ही वर्कआउट कर लें जब तक आप सुबह के तनाव को कंट्रोल नहीं करेंगे तब तक आप अपना वेट लूज नहीं कर सकते। जापानी लोग इस तनाव को कंट्रोल करने के लिए सुबह-सुबह कुछ आदतों को अपनाते हैं।  जापानी लोग मोटे नहीं होते जिसके लिए वो किसी भी तरह की कोई कठिन डाइट या भारी-भरकम वर्कआउट नहीं करते। कुछ साधारण और अनुशासित आदतें आपका वजन घटाने में और पेट की चर्बी घटाने में और मेटाबॉलिज्म को बूस्ट करने में मदद करती हैं।

    सुबह उठते ही फोन से दूरी बनाएं

    सुबह उठते ही मोबाइल फोन पर नोटिफिकेशन, ईमेल या काम से जुड़ी जानकारी देखने के बजाय कुछ समय शांत रहने की आदत अपनाएं। ये आदत आपको तनाव से दूर रखने में मदद करेगी। कुछ मिनट खुद पर ध्यान देने, शांत बैठने या दिन की योजना आराम से बनाने से सुबह की शुरुआत कम तनावपूर्ण हो सकती है। यह आदत सीधे पेट की चर्बी कम नहीं करती, लेकिन तनाव कंट्रोल कर और बेहतर दिनचर्या का हिस्सा बन सकती है।

    सुबह उठकर गुनगुना पानी पिएं

    सुबह उठने के बाद गुनगुना पानी ना सिर्फ बॉडी को हाइड्रेट करता है बल्कि बॉडी को हेल्दी रखने में भी मदद करता है।  रातभर सोने के दौरान शरीर से कुछ मात्रा में पानी कम हो सकता है, इसलिए दिन की शुरुआत पानी से करना उपयोगी हो सकता है। सुबह गुनगुना पानी सामान्य पानी की तुलना में पेट की चर्बी अधिक तेजी से कम करता है। पानी पीने के बाद आप अपनी पसंद के मुताबिक चाय या कॉफी ले सकते हैं।

    सुबह कुछ देर सूरज की रोशनी में रहें

    सुबह सूरज की रोशनी में कुछ देर रहना आपकी सेहत के लिए बेहद जरूरी है। प्राकृतिक रोशनी में कुछ समय बिताना शरीर की सर्केडियन रिदम यानी आंतरिक बॉडी क्लॉक को नियमित रखने में मदद कर सकता है। सुबह की रोशनी शरीर के नींद-जागने के चक्र को प्रभावित करती है और रात में नींद आने के समय को कंट्रोल करने में मदद कर सकती है। अच्छी नींद वजन कंट्रोल करने और ओवरऑल हेल्थ में सुधार करने में बेहद असरदार है। धूप लेते समय बहुत तेज धूप में लंबे समय तक सीधे देखने से बचना चाहिए।

    डायफ्रामेटिक ब्रीदिंग है जरूरी

    सुबह कुछ मिनट धीमी और गहरी सांस लेने की प्रैक्टिस की जा सकती है। डायफ्रामेटिक ब्रीदिंग में सांस लेते समय पेट का हिस्सा अधिक ऊपर-नीचे होता है, जबकि सांस अपेक्षाकृत धीमी और सहज रखी जाती है। इस तरह की ब्रीदिंग रिलैक्सेशन और तनाव कम करने में मदद कर सकती है। कुछ मिनट गहरी सांस लेने से कॉर्टिसोल 30 से 65 प्रतिशत तक कम हो सकता है और बॉडी हेल्दी रह सकती है।

    सुबह हल्की वॉक है जरूरी

    जापानी लोग हर दिन सुबह वॉक करते हैं, सुबह 20 से 25 मिनट हल्की या मध्यम गति से पैदल चलना दिन की शारीरिक गतिविधि बढ़ाने का आसान तरीका है। नियमित वॉक कैलोरी खर्च बढ़ाने, फिटनेस बेहतर करने और वजन कंट्रोल करने में मदद कर सकती है। पेट की चर्बी कम करने के लिए केवल सुबह की वॉक ही पर्याप्त नहीं होती, लेकिन इसे संतुलित खान-पान, पर्याप्त नींद और पूरे दिन की सक्रियता के साथ शामिल किया जा सकता है।

    सिर्फ इन आदतों से पेट की चर्बी कम नहीं होगी

    इन पांचों आदतों को स्वस्थ दिनचर्या का हिस्सा बनाया जा सकता है, लेकिन इन्हें पेट की चर्बी कम करने का कोई विशेष या अकेला उपाय नहीं माना जाना चाहिए। शरीर में फैट कम करने के लिए लंबे समय तक संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और तनाव कंट्रोल करना जरूरी हैं।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से है। सुबह की ये आदतें तनाव कम करने, नींद और ओवरऑल हेल्थ को बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं, लेकिन इन्हें पेट की चर्बी कम करने का पक्का या वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित इलाज नहीं माना जाना चाहिए। वजन कम करने के लिए संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और स्वस्थ जीवनशैली जरूरी है। किसी बीमारी, दवा या विशेष स्वास्थ्य स्थिति में डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

  • देवताओं की मदद के लिए शिव-पार्वती ने भेजा कार्तिकेय को:  माता-पिता बच्चों को इतना सक्षम बनाएं कि वे कठिन परिस्थितियों का सामना स्वयं कर सकें

    देवताओं की मदद के लिए शिव-पार्वती ने भेजा कार्तिकेय को: माता-पिता बच्चों को इतना सक्षम बनाएं कि वे कठिन परिस्थितियों का सामना स्वयं कर सकें

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    भगवान शिव, माता पार्वती, कार्तिकेय स्वामी और तारकासुर से जुड़ी पौराणिक कथा है। कार्तिकेय स्वामी का पालन-पोषण कृतिकाओं ने एक जंगल में किया था। इसी कारण उनका नाम कार्तिकेय पड़ा। वे अपने माता-पिता शिव और पार्वती से दूर रहे। जब शिव-पार्वती को अपने पुत्र और कृतिकाओं के बारे में पता चला, तो उन्होंने सेवकों को भेजकर कार्तिकेय को कैलाश बुला लिया।

    पुत्र कार्तिकेय के कैलाश लौटने पर शिव और पार्वती प्रसन्न थे, लेकिन उसी समय कैलाश पर देवताओं का आगमन हुआ। सभी देवता तारकासुर के अत्याचार से परेशान थे। तारकासुर को वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल शिव-पुत्र ही कर सकता है। इसलिए देवताओं की आशा अब कार्तिकेय पर टिक गई थी।

    देवताओं ने कार्तिकेय की क्षमता पहचानी। उन्हें विभिन्न विद्याएं, अस्त्र-शस्त्र और दिव्य शक्तियां प्रदान की गईं। देवी लक्ष्मी ने उन्हें दिव्य हार दिया और देवी सरस्वती ने सिद्ध विद्याएं प्रदान कीं। कार्तिकेय को देवताओं ने अपना सेनापति बनने योग्य माना।

    इसके बाद देवताओं ने शिव-पार्वती से निवेदन किया कि कार्तिकेय को उनके साथ युद्ध में भेज दिया जाए। माता-पिता के लिए यह निर्णय आसान नहीं था। उनका पुत्र अभी-अभी उनके पास लौटा था। वे उसे अपने पास रखना चाहते थे। फिर भी शिव-पार्वती ने व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर लोककल्याण को प्राथमिकता दी।

    कार्तिकेय देवताओं के साथ युद्धभूमि में पहुंचे और तारकासुर का सामना किया। उन्होंने अपने साहस, ज्ञान और शक्ति से तारकासुर का वध कर दिया। देवताओं को अत्याचार से मुक्ति मिली और शिव-पार्वती भी अपने पुत्र की सफलता से प्रसन्न हुए।

    इस कथा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि माता-पिता का सच्चा प्रेम केवल संतान को अपने पास रखने में नहीं, बल्कि उसे सही संस्कार देकर योग्य और जिम्मेदार बनाने में है। जब संतान अपनी योग्यता का उपयोग दूसरों के कल्याण के लिए करती है, तब उसका सम्मान पूरे परिवार तक पहुंचता है।

    प्रसंग की सीख

    पहला सूत्र है- संतान को केवल सुविधाएं नहीं, संस्कार दें। माता-पिता का उद्देश्य बच्चों को सिर्फ हर कठिनाई से बचाना नहीं होना चाहिए। उन्हें इतना सक्षम बनाना चाहिए कि वे कठिन परिस्थितियों का सामना स्वयं कर सकें। कार्तिकेय का पालन-पोषण विषम परिस्थितियों के बीच हुआ और इसी अनुभव ने उन्हें मजबूत बनाया।

    दूसरा सूत्र है- योग्यता की पहचान करें। देवताओं ने कार्तिकेय में नेतृत्व की क्षमता देखी। हर व्यक्ति में कोई न कोई विशेष प्रतिभा होती है। परिवार, शिक्षक और संस्थान की जिम्मेदारी है कि उस प्रतिभा को पहचानकर बच्चे को सही दिशा दें। सही व्यक्ति को सही जिम्मेदारी मिल जाए, तो असंभव दिखने वाला काम भी आसान हो सकता है।

    तीसरा सूत्र है- जिम्मेदारी से भागें नहीं। कार्तिकेय चाहते, तो कैलाश पर माता-पिता के साथ सुखपूर्वक रह सकते थे, लेकिन उन्होंने समाज की जरूरत को समझा और जिम्मेदारी स्वीकार की। जीवन में भी जब कोई महत्वपूर्ण दायित्व सामने आए, तो केवल सुविधा देखकर निर्णय नहीं लेना चाहिए।

    चौथा सूत्र है- व्यक्तिगत भावनाओं और व्यापक हित के बीच संतुलन रखें। शिव-पार्वती के लिए पुत्र से अलग होना कठिन था, फिर भी उन्होंने देवताओं और समाज की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। इसका अर्थ यह नहीं कि भावनाओं को दबा देना चाहिए, बल्कि यह है कि बड़े निर्णय लेते समय व्यापक परिणामों को भी देखना चाहिए।

    पांचवां सूत्र है- ज्ञान और शक्ति का सही उपयोग करें। कार्तिकेय को अस्त्र-शस्त्र, विद्या और शक्तियां मिलीं, लेकिन उनका उपयोग अहंकार के लिए नहीं, अत्याचार समाप्त करने के लिए हुआ। आज ज्ञान, धन, पद और तकनीक भी तभी सार्थक हैं, जब उनका उपयोग सकारात्मक उद्देश्य के लिए किया जाए।

    छठा सूत्र है- नेतृत्व सेवा से पैदा होता है। केवल पद मिल जाने से कोई नेता नहीं बनता। सच्चा नेतृत्व तब दिखाई देता है जब व्यक्ति कठिन समय में दूसरों के लिए आगे आता है। कार्तिकेय को सेनापति इसलिए माना गया, क्योंकि वे संकट का सामना करने के लिए तैयार थे।

    सातवां सूत्र है- परिवार की प्रतिष्ठा कर्मों से बनती है। संतान जब अच्छे कर्म करती है तो उसका लाभ केवल उसे नहीं मिलता। उसके आचरण से माता-पिता और पूरे परिवार का सम्मान बढ़ता है। इसलिए बच्चों को सफलता से अधिक चरित्र का महत्व समझाना चाहिए।

  • मालिक के परिवार पर मंडरा रहा था मौत का खतरा, नाग से भिड़ गया टॉमी… जान देकर बचा ली सबकी जिंदगी..

    मालिक के परिवार पर मंडरा रहा था मौत का खतरा, नाग से भिड़ गया टॉमी… जान देकर बचा ली सबकी जिंदगी..

    उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से सामने आई यह घटना इंसान और जानवर के बीच रिश्ते की ऐसी तस्वीर दिखाती है, जिसे सुनकर किसी की भी आंखें नम हो जाएंगी। घर में सो रहे परिवार को शायद अंदाजा भी नहीं था कि आधी रात उनके दरवाजे पर एक जहरीला खतरा दस्तक दे चुका है। लेकिन परिवार के पालतू कुत्ते टॉमी की नजर उस खतरे पर पड़ गई और उसने बिना अपनी जान की परवाह किए मोर्चा संभाल लिया।

    मामला उभांव थाना क्षेत्र का बताया जा रहा है। परिवार के मुताबिक, रविवार तड़के करीब 2 बजे एक जहरीला सांप घर के अंदर दाखिल होने की कोशिश कर रहा था। उस समय परिवार के सभी लोग सो रहे थे। अगर सांप चुपचाप घर के भीतर पहुंच जाता तो किसी बड़ी अनहोनी की आशंका थी।

    खतरा देखा तो टॉमी ने मचा दिया शोर

    सांप को देखते ही टॉमी सतर्क हो गया। उसने जोर-जोर से भौंकना शुरू कर दिया। उसकी आवाज से परिवार को खतरे का अंदाजा हुआ, लेकिन टॉमी यहीं नहीं रुका।

    उसने सांप को घर के अंदर जाने से रोकने के लिए सीधे उस पर हमला कर दिया। इसके बाद दोनों के बीच ऐसी जंग शुरू हुई, जिसमें एक तरफ जहरीला नाग था और दूसरी तरफ अपने परिवार को बचाने के लिए डटा हुआ टॉमी।

    परिजनों का कहना है कि दोनों के बीच करीब एक घंटे तक संघर्ष चलता रहा। टॉमी बार-बार सांप पर हमला करता रहा और उसे घर के अंदर पहुंचने से रोकता रहा।

    आखिरकार नाग को मार गिराया

    लंबी लड़ाई के बाद टॉमी ने जहरीले सांप को मार दिया। परिवार के लिए खतरा टल चुका था, लेकिन इस जीत की कीमत टॉमी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

    दरअसल, संघर्ष के दौरान सांप ने टॉमी को कई जगह डस लिया था। लड़ाई खत्म होने के कुछ समय बाद उसके शरीर में जहर का असर तेजी से फैलने लगा। परिवार ने उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन आखिरकार टॉमी ने अपने मालिक की गोद में दम तोड़ दिया।

    9 साल से था परिवार का हिस्सा

    परिवार के मुताबिक टॉमी करीब नौ साल से उनके साथ रह रहा था। वह सिर्फ घर का पालतू जानवर नहीं था, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह था। इतने वर्षों तक उसने घर की रखवाली की और परिवार के साथ उसका गहरा लगाव बन गया था।

    उस रात भी उसने वही किया, जो शायद कोई अपना ही करता। खतरा उसके सामने था, लेकिन उसने पीछे हटने के बजाय अपने मालिक और परिवार के बीच खुद को ढाल बना दिया।

    टॉमी को नम आंखों से दी अंतिम विदाई

    टॉमी की मौत के बाद परिवार का दुख संभालना मुश्किल हो गया। परिजनों का मानना है कि अगर वह समय रहते सांप को नहीं देखता और उससे भिड़ता नहीं, तो घर में सो रहे लोगों के साथ बड़ा हादसा हो सकता था।

    परिवार ने टॉमी को पूरे सम्मान के साथ दफनाया। उसकी अंतिम विदाई के दौरान हर आंख नम थी। आसपास के लोगों के बीच भी टॉमी के साहस और वफादारी की चर्चा होने लगी।

    टॉमी अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसने अपने परिवार की रक्षा के लिए जो किया, वह उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी पहचान बन गया। इंसानों की दुनिया में वफादारी के बड़े-बड़े किस्से सुनने को मिलते हैं, लेकिन कभी-कभी एक बेजुबान जानवर अपने कर्म से ऐसा उदाहरण छोड़ जाता है, जिसे लोग लंबे समय तक याद रखते हैं।

  • कभी घर तक सीमित थीं ये महिलाएं, अब बन गईं सोलर इंजीनियर! दूर-दराज के गांवों में पहुंचा रहीं बिजली.

    कभी घर तक सीमित थीं ये महिलाएं, अब बन गईं सोलर इंजीनियर! दूर-दराज के गांवों में पहुंचा रहीं बिजली.

    अफ्रीका के तंजानिया में रहने वाली मसाई जनजाति अपनी सदियों पुरानी परंपराओं और अलग जीवनशैली के लिए जानी जाती है। लंबे समय तक इस समुदाय के लोग आधुनिक सुविधाओं से काफी दूर रहे। लेकिन अब इसी समुदाय की महिलाओं की जिंदगी में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।

    जो महिलाएं कभी मुख्य रूप से घर, परिवार और रोजमर्रा के कामों तक सीमित रहती थीं, वे अब तकनीकी प्रशिक्षण हासिल कर रही हैं। उन्हें सोलर एनर्जी सिस्टम लगाने और उसकी देखभाल करने की ट्रेनिंग दी जा रही है। इसके बाद ये महिलाएं दूर-दराज के उन गांवों तक पहुंच रही हैं, जहां बिजली की सुविधा अब तक नहीं पहुंच सकी थी।

    यह बदलाव सिर्फ गांवों को रोशन करने की कहानी नहीं है, बल्कि महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने और अपने समुदाय में नई भूमिका हासिल करने की मिसाल भी है।

    पशुपालन पर निर्भर रहा है मसाई समुदाय

    मसाई समुदाय मुख्य रूप से तंजानिया और केन्या के इलाकों में पाया जाता है। पारंपरिक रूप से इस समुदाय की जीवनशैली पशुपालन और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रही है।

    मसाई लोग अपनी पारंपरिक पोशाक, संस्कृति और रीति-रिवाजों के लिए भी दुनिया भर में पहचाने जाते हैं। हालांकि, आधुनिक सुविधाओं और तकनीकी शिक्षा तक पहुंच हर इलाके में समान नहीं रही है।

    इसी वजह से ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में बिजली जैसी बुनियादी सुविधा भी लंबे समय तक चुनौती बनी रही।

    महिलाओं ने सीखी सोलर तकनीक

    अब कुछ स्थानीय पहलों और संगठनों की मदद से मसाई समुदाय की महिलाओं को सोलर तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

    प्रशिक्षण के दौरान उन्हें सोलर पैनल लगाने, बैटरी और वायरिंग को समझने, सिस्टम की जांच करने और छोटी-मोटी तकनीकी समस्या को ठीक करने जैसी जरूरी बातें सिखाई जाती हैं।

    ट्रेनिंग पूरी करने के बाद महिलाएं अपने गांव के अलावा आसपास के दूसरे इलाकों में भी जाकर सोलर सिस्टम लगाने में मदद करती हैं। कई जगह वे समूह बनाकर काम करती हैं और एक-दूसरे के साथ तकनीकी अनुभव साझा करती हैं।

    इस तरह महिलाएं सिर्फ बिजली की सुविधा पहुंचाने वाली कर्मचारी नहीं बन रही हैं, बल्कि अपने समुदाय के लिए तकनीकी ज्ञान का स्थानीय स्रोत भी तैयार कर रही हैं।

    जिन गांवों में अंधेरा था, वहां जली रोशनी

    दूर-दराज के गांवों में सोलर पैनल लगने के बाद लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में कई बदलाव आए हैं।

    पहले सूरज ढलने के बाद बच्चों के लिए पढ़ाई करना मुश्किल हो जाता था। अब सोलर लाइट की मदद से वे शाम और रात में भी पढ़ सकते हैं।

    घरों में रोशनी होने से महिलाओं के लिए घरेलू काम करना आसान हुआ है। छोटे दुकानदार भी शाम के बाद कुछ अतिरिक्त समय तक अपना काम जारी रख सकते हैं।

    मोबाइल फोन चार्ज करने की सुविधा मिलने से परिवारों का बाहरी दुनिया से संपर्क भी आसान हुआ है। कुछ ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में बिजली की सुविधा मिलने से रात के समय जरूरी सेवाओं को बेहतर तरीके से संचालित करने में मदद मिलती है।

    बड़े बिजली नेटवर्क के बजाय सोलर क्यों?

    दूर-दराज के इलाकों में पारंपरिक बिजली का नेटवर्क पहुंचाना आसान नहीं होता। इसके लिए लंबी दूरी तक बिजली की लाइनें बिछानी पड़ती हैं, जिसमें काफी समय और पैसा लग सकता है।

    इसके मुकाबले सोलर सिस्टम छोटे स्तर पर अपेक्षाकृत आसानी से लगाया जा सकता है। तंजानिया जैसे धूप वाले देश में सौर ऊर्जा ग्रामीण इलाकों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है।

    सबसे खास बात यह है कि जब स्थानीय लोगों को ही सिस्टम की देखभाल की जानकारी मिल जाती है, तो छोटी-मोटी खराबियों के लिए हर बार बाहर से तकनीशियन बुलाने की जरूरत कम हो सकती है।

    महिलाओं को मिल रही आर्थिक आजादी

    इस पहल का असर सिर्फ बिजली तक सीमित नहीं है। सोलर तकनीक सीखने के बाद कई महिलाओं के लिए कमाई के नए रास्ते भी खुल रहे हैं।

    वे सोलर सिस्टम की इंस्टॉलेशन और देखभाल से जुड़े काम कर सकती हैं। कुछ महिलाएं सोलर उत्पादों की बिक्री और छोटे कारोबार की दिशा में भी आगे बढ़ रही हैं।

    इससे उनके परिवार में उनकी आर्थिक भूमिका मजबूत हो रही है। तकनीकी ज्ञान हासिल करने के बाद वे समुदाय के फैसलों में भी ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने की स्थिति में आ रही हैं।

    बदलाव की यह कहानी क्यों है खास?

    मसाई महिलाओं की यह पहल दिखाती है कि तकनीक सिर्फ बिजली पहुंचाने का माध्यम नहीं होती। सही प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर यही तकनीक किसी समुदाय के लोगों को आत्मनिर्भर बनाने का रास्ता भी खोल सकती है।

    जहां कभी बिजली और तकनीकी शिक्षा दूर की चीज लगती थी, वहीं अब उसी समुदाय की महिलाएं सोलर तकनीक सीखकर अपने गांवों में बदलाव की अगुवाई कर रही हैं।

    अंधेरे गांवों में रोशनी पहुंचाने के साथ-साथ ये महिलाएं अपने लिए भी एक नई पहचान बना रही हैं—और यही इस पूरी पहल की सबसे बड़ी खासियत है।

     

     
  • क्या चिया सीड्स खाने से कब्ज की दिक्कत दूर होती है? जानें फायदे, खाने का सही तरीका और कितनी मात्रा है जरूरी.

    क्या चिया सीड्स खाने से कब्ज की दिक्कत दूर होती है? जानें फायदे, खाने का सही तरीका और कितनी मात्रा है जरूरी.

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    भागदौड़ भरी जिंदगी, जंक फूड का सेवन, कम पानी पीना और शारीरिक निष्क्रियता के कारण आजकल कब्ज (Constipation) और अपच की समस्या बेहद आम हो चुकी है। पेट साफ न होने पर दिनभर भारीपन, ब्लोटिंग, सुस्ती और मिजाज़ में चिड़चिड़ापन बना रहता है। पाचन तंत्र को दुरुस्त करने और पुरानी कब्ज से राहत पाने के लिए आजकल चिया सीड्स (Chia Seeds) का इस्तेमाल काफी लोकप्रिय हो रहा है। फाइबर, ओमेगा-3 फैटी एसिड और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर इन छोटे-छोटे बीजों को सुपरफूड माना जाता है। जब चिया सीड्स को पानी में भिगोया जाता है, तो यह एक जेल जैसा रूप ले लेते हैं, जो आंतों की सफाई करने और मल को नरम बनाकर आसानी से बाहर निकालने में मदद करता है।

    होम्योपैथी डॉक्टर Dr. Kanika Singh ने बताया  चिया सीड्स छोटे काले और सफेद रंग के ऐसे बीज होते हैं, जिन्हें सुपरफूड माना जाता है। ये सीड्स सेहत के लिए एक ‘कम्प्लीट सुपरफूड हैं। इन सीड्स का सेवन वजन घटाने से लेकर दिल और हड्डियों की सेहत तक के लिए फायदेमंद माना जाता है। एक्सपर्ट के मुताबिक चिया सीड्स का फायदा तभी मिलता है जब इसे सही तरीके और सही मात्रा में खाया जाए। सूखे चिया सीड्स खाना या बिना पर्याप्त पानी पिए इसका अत्यधिक सेवन करना आंतों में रुकावट और पेट दर्द जैसी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है। आइए एक्सपर्ट्स से जानते हैं कि कब्ज से राहत पाने के लिए चिया सीड्स को कैसे भिगोकर खाएं, इसे कब लेना सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है और एक दिन में कितनी मात्रा में इसका सेवन सुरक्षित है।

    चिया सीड्स कब्ज में कैसे करते हैं मदद?

    चिया सीड्स फाइबर से भरपूर होते हैं। जब इन्हें पर्याप्त पानी के साथ लिया जाता है, तो ये पानी सोखकर मल को नरम करने में मदद कर सकते हैं। इससे मल त्याग आसान हो सकता है और बाउल मूवमेंट दुरुस्त रहती है। कब्ज की समस्या होने पर पेट फूलना, भारीपन और मल त्याग में परेशानी जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। ऐसे में चिया सीड्स को नेचुरल उपाय के तौर पर डाइट में शामिल करना असरदार साबित हो सकता हैं। चिया सीड्स में मौजूद फाइबर और पानी का कॉम्बिनेशन कुछ लोगों में मल को नरम करने और नियमित बाउल मूवमेंट को दुरुस्त करने में मदद कर सकता है। हालांकि, इसके साथ पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी जरूरी है।

    कितनी मात्रा में खाएं चिया सीड्स?

    कब्ज की समस्या में शुरुआत में रोजाना 1 से 2 बड़े चम्मच चिया सीड्स का सेवन करें। अगर शरीर इसे अच्छी तरह सहन करे तो धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाई जा सकती है। चिया सीड्स लेते समय पर्याप्त पानी पीना बेहद जरूरी है, क्योंकि फाइबर को ठीक तरह से काम करने के लिए शरीर में पर्याप्त पानी होना चाहिए।

    चिया सीड्स खाने का सही तरीका क्या है?

    चिया सीड्स को खाने से पहले भिगोना बेहतर माना जाता है। इन्हें दही, स्मूदी में रातभर भिगोकर किया जा सकता है। सूखे चिया सीड्स को एक साथ बड़ी मात्रा में खाने से बचना चाहिए।

    गलत तरीके से खाने पर बढ़ सकती है परेशानी

    अगर आप चिया सीड्स खाने के साथ पर्याप्त पानी नहीं पीते हैं या अचानक बहुत ज्यादा फाइबर लेना शुरू कर देते हैं, तो पेट फूलना, गैस और असहजता जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए डाइट में चिया सीड्स की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाना बेहतर है।

    चिया सीड्स का सेवन करने से सेहत पर कैसा होता है असर

    दिनभर एनर्जी रहती है बूस्ट

    चिया सीड्स में फाइबर, प्रोटीन, हेल्दी फैट और कई जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जो शरीर को लंबे समय तक ऊर्जा देने में मदद कर सकते हैं। इन्हें दही, ओट्स या स्मूदी में मिलाकर खाया जा सकता है। हालांकि, केवल चिया सीड्स खाने से कमजोरी या थकान दूर नहीं होती, इसके लिए संतुलित और पौष्टिक डाइट जरूरी है।

    हार्ट हेल्थ के लिए फायदेमंद

    चिया सीड्स में ओमेगा-3 फैटी एसिड और फाइबर जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो दिल की सेहत को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। इनका नियमित सेवन कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित रखने में सहायक हो सकता है। इसके अलावा, चिया सीड्स में मौजूद पोषक तत्व ब्लड प्रेशर को मैनेज करने में भी असरदार साबित हो सकता है।

    हड्डियों के लिए जरूरी पोषक तत्व

    चिया सीड्स कैल्शियम, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस जैसे जरूरी मिनरल्स का अच्छा स्रोत हैं। ये पोषक तत्व हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। खासतौर पर जो लोग डेयरी उत्पादों का सेवन कम करते हैं, उनके लिए चिया सीड्स डाइट में इन मिनरल्स को शामिल करने का एक विकल्प हो सकते हैं।

    स्किन और बालों की सेहत के लिए उपयोगी

    चिया सीड्स में एंटीऑक्सीडेंट्स के साथ ओमेगा-3 फैटी एसिड और प्रोटीन भी मौजूद होते हैं। एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाव में मदद करते हैं, जबकि प्रोटीन बालों की संरचना के लिए जरूरी पोषक तत्व है। संतुलित डाइट के हिस्से के तौर पर इनका सेवन त्वचा और बालों की ओवरऑल हेल्थ को सपोर्ट कर सकता है।

    ब्लड शुगर मैनेजमेंट में मददगार

    चिया सीड्स में मौजूद फाइबर भोजन के बाद ब्लड शुगर तेजी से बढ़ने से रोकने में मदद कर सकता है। यही वजह है कि इन्हें डायबिटीज मैनेजमेंट वाली डाइट में इन्हें शामिल किया जा सकता है। हालांकि, चिया सीड्स डायबिटीज की दवा या इलाज का विकल्प नहीं हैं। डायबिटीज मरीजों को इनका सेवन अपनी डाइट और डॉक्टर की सलाह के अनुसार करना चाहिए।

    डिस्क्लेमर: चिया सीड्स के ये फायदे सामान्य स्वास्थ्य जानकारी पर आधारित हैं। किसी बीमारी के इलाज के लिए इन्हें दवा का विकल्प न मानें। किसी विशेष स्वास्थ्य समस्या या नियमित दवाओं के सेवन की स्थिति में डॉक्टर की सलाह लें।

  • 45 साल की उम्र में पतले होने के बावजूद हुआ फैटी लिवर, क्यों सिर्फ दुबला-पतला होना मेटाबॉलिक हेल्थ की गारंटी नहीं? डॉक्टर ने दी सारी जानकारी.

    45 साल की उम्र में पतले होने के बावजूद हुआ फैटी लिवर, क्यों सिर्फ दुबला-पतला होना मेटाबॉलिक हेल्थ की गारंटी नहीं? डॉक्टर ने दी सारी जानकारी.

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    मैं डॉ. सप्तर्षि भट्टाचार्य हूं और अपोलो अस्पताल, दिल्ली में वरिष्ठ एंडोक्राइनोलॉजिस्ट हूं। मेरे पास अक्सर मरीज अपनी कई तरह की परेशानियां लेकर आते हैं। हाल ही में मेरे पास 44 साल का अरुण नाम का एक शख्स आया। वो एसिडिटी से बहुत परेशान था। बार-बार होने वाली एसिडिटी से परेशान होकर उसने डॉक्टर की सलाह के मुताबिक कई जांच कराई। एक दिन वो अपनी कुछ रिपोर्ट और अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट लेकर मेरे क्लिनिक पहुंचा। अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में उसके लिवर में फैट जमा होने यानी फैटी लिवर की समस्या सामने आई थी। उसने मुझसे पूछा कि मैं मोटा तो नहीं हूं फिर भी मेरा लिवर फैटी कैसे हो गया।

    उसकी बात गलत भी नहीं थी। उसका BMI यानी बॉडी मास इंडेक्स 22.6 kg/m² था, जो एशियाई वयस्कों के लिए सामान्य या लीन रेंज में आता है। वह कभी-कभार शराब पीता था और उसके लिवर एंजाइम भी हल्के बढ़े हुए थे। देखने में वह पूरी तरह स्वस्थ नजर आता था, लेकिन जब उसकी दूसरी जांचें की गईं तो तस्वीर अलग थी। उसकी कमर 93 सेंटीमीटर थी, ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ा हुआ था और HbA1c यानी पिछले लगभग तीन महीनों की औसत ब्लड शुगर प्रीडायबिटीज की रेंज में थी। पूछताछ करने पर पता लगा कि वो सिटिंग जॉब करता है जिसकी वजह से घंटों बैठता है।  वो डाइट में चावल और रिफाइंड अनाज अधिक मात्रा में खाता था, नियमित रूप से एक्सरसाइज नहीं करता था और उसके शरीर में मांसपेशियों की मात्रा भी अपेक्षाकृत कम थी।

    रूटीन ब्लड टेस्ट के आधार पर किए गए फाइब्रोसिस स्कोर का परिणाम स्पष्ट नहीं था। इसलिए लिवर इलास्टोग्राफी कराने की सलाह दी। जांच में लिवर में कई गंभीर परेशानियां सामने आई जो बाहर से नहीं दिख रही थी। आखिरकार उसे जांच में लीन मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टिएटोटिक लिवर डिजीज यानी Lean MASLD का डायग्नोज हुआ। यह मामला बताता है कि पतला होना और मेटाबॉलिक रूप से स्वस्थ होना एक ही बात नहीं है।

    मोटापा न होने पर भी हो सकता है फैटी लिवर

    MASLD फैटी लिवर की उस बीमारी का नया नाम है, जिसे पहले नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) कहा जाता था। इसमें लिवर में फैट जमा होने के साथ कम से कम एक कार्डियो मेटाबोलिक समस्या मौजूद होती है, जैसे

    • ब्लड शुगर बढ़ना
    • हाई ब्लड प्रेशर
    • ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ना
    • HDL यानी अच्छे कोलेस्ट्रॉल का कम होना
    • शरीर में अतिरिक्त चर्बी जमा होना

    किसी व्यक्ति में ये सभी समस्याएं होना जरूरी नहीं है। उदाहरण के लिए, फैटी लिवर के साथ प्रीडायबिटीज या कमर का बढ़ा हुआ साइज भी व्यक्ति को MASLD की श्रेणी में ला सकता है।

    एशियाई लोगों में BMI की सीमा अलग क्यों है?

    लीन यानी दुबले व्यक्ति की परिभाषा जातीयता और जनसंख्या के अनुसार अलग हो सकती है। एशियाई आबादी में आमतौर पर 23 kg/m² से कम BMI वाले व्यक्ति में फैटी लिवर होने को Lean MASLD माना जा सकता है। भारत और दक्षिण एशियाई देशों में यह सीमा खासतौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि दक्षिण एशियाई लोगों में पश्चिमी देशों की आबादी की तुलना में कम BMI पर ही डायबिटीज और दूसरी मेटाबॉलिक समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए अरुण कोई अपवाद नहीं था। वह ऐसे लोगों के समूह में शामिल था, जिनकी समस्या आसानी से नजरअंदाज हो सकती है, क्योंकि आमतौर पर फैटी लिवर को सिर्फ मोटापे से जोड़कर देखा जाता है।

    BMI क्या नहीं बता पाता?

    BMI शरीर के वजन और लंबाई के आधार पर निकाला जाता है, लेकिन यह नहीं बताता कि शरीर में फैट कहां जमा है और मांसपेशियों की मात्रा कितनी है। एक ही BMI वाले दो लोगों की मेटाबॉलिक हेल्थ बिल्कुल अलग हो सकती है। जब शरीर की स्किन के नीचे फैट को सुरक्षित तरीके से जमा करने की क्षमता कम पड़ जाती है, तो अतिरिक्त फैट पेट के अंदरूनी अंगों, लिवर, पैंक्रियाज और मांसपेशियों में जमा होने लगता है। इसे विसरल और एक्टोपिक फैट कहा जाता है। यह फैट इंसुलिन रेजिस्टेंस, सूजन और फैटी एसिड को लिवर तक पहुंचाने की प्रक्रिया को बढ़ावा दे सकता है। इसलिए किसी व्यक्ति के हाथ-पैर पतले हो सकते हैं, लेकिन पेट और कमर के आसपास मेटाबॉलिक रूप से नुकसानदायक फैट जमा हो सकता है।

    कमर का कितना साइज होना हो सकता है खतरे की घंटी

    दक्षिण एशियाई लोगों में पुरुषों की कमर 90 सेंटीमीटर या उससे ज्यादा होना खतरे की घंटी है।
    महिलाओं की कमर 80 सेंटीमीटर या उससे ज्यादा होना खतरे की घंटी है।
    कमर और लंबाई का अनुपात लगभग 0.5 होना भी एक उपयोगी संकेत माना जाता है।
    कई बार व्यक्ति का वजन बिल्कुल नहीं बढ़ता, लेकिन उसकी कमर धीरे-धीरे बढ़ती रहती है। इसलिए सिर्फ वजन मशीन पर दिखने वाले आंकड़े पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है।

    मांसपेशियों की कमी भी बढ़ा सकती है खतरा

    शरीर की मांसपेशियां भोजन के बाद ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मांसपेशियां कम होने पर शरीर ग्लूकोज को प्रभावी तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाता, जिससे लिवर पर मेटाबॉलिक दबाव बढ़ सकता है। इस स्थिति को अक्सर थिन-फैट” या सार्कोपेनिक फेनोटाइप कहा जाता है। बढ़ती उम्र, शारीरिक निष्क्रियता, पर्याप्त प्रोटीन न लेना और बार-बार क्रैश डाइटिंग करने से यह समस्या अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

    फैटी लिवर सिर्फ अल्ट्रासाउंड की सामान्य रिपोर्ट नहीं है

    कई बार अल्ट्रासाउंड में फैटी लिवर आने को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता। कुछ लोगों में यह स्थिति लंबे समय तक बिना गंभीर समस्या के रह सकती है। लेकिन कुछ मरीजों में लिवर में जमा फैट के साथ सूजन भी हो सकती है। इस स्थिति को मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोहेपेटाइटिस यानी MASH कहा जाता है। समय के साथ यह समस्या लिवर फाइब्रोसिस यानी लिवर में स्कारिंग,सिरोसिस और कुछ मामलों में लिवर कैंसर तक पहुंच सकती है। पतले लोगों में Lean MASLD का निदान देर से हो सकता है, क्योंकि अक्सर डॉक्टर और मरीज दोनों ही यह नहीं सोचते कि दुबले व्यक्ति को भी मेटाबॉलिक लिवर डिजीज हो सकता है। यह भी याद रखना जरूरी है कि लिवर एंजाइम सामान्य या लगभग सामान्य होने पर भी गंभीर फाइब्रोसिस की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

    पतले व्यक्ति में फैटी लिवर हो तो कौन सी जांच कराना है जरूरी

    • कमर का साइज चेक करना
    • ब्लड प्रेशर
    • ब्लड ग्लूकोज
    • HbA1c
    • ट्राइग्लिसराइड्स
    • HDL कोलेस्ट्रॉल

    इसके अलावा व्यक्ति के शराब के सेवन और दवाओं की भी समीक्षा की जानी चाहिए। लिवर में फैट या लिवर टेस्ट असामान्य होने के दूसरे कारणों, जैसे वायरल हेपेटाइटिस और जरूरत के अनुसार कुछ हार्मोनल, ऑटोइम्यून, पोषण संबंधी या आनुवंशिक स्थितियों की भी जांच की जा सकती है।

    फैटी लिवर का इलाज सिर्फ वजन कम करना नहीं

    फैटी  लिवर के इलाज को सिर्फ वजन कम करने तक सीमित नहीं करना चाहिए। आमतौर पर फैटी लिवर के मरीजों को शरीर का 7 से 10 प्रतिशत वजन कम करने की सलाह दी जाती है। लेकिन पतले व्यक्ति के लिए यह सलाह हमेशा सही नहीं हो सकती, खासकर तब जब उसकी मांसपेशियां पहले से कम हों। Lean MASLD में लक्ष्य सिर्फ वजन कम करना नहीं होना चाहिए। इस स्थिति में मरीज को जो सुधार करना है वो है

    • पेट के अंदर जमा विसरल फैट को कम करना
    • इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार करना
    • मांसपेशियों को सुरक्षित रखना या बढ़ाना

    भारतीय डाइट में क्या बदलाव करें?

    फैटी लिवर का इलाज करने के लिए डाइट में बदलाव करना जरूरी है। भारतीय खानपान में आमतौर पर कुछ फूड्स जैसे पॉलिश चावल की अधिक मात्रा, मैदा और रिफाइंड आटा,मिठाइयां,फ्रूट जूस और मीठे ड्रिंक का सेवन कंट्रोल करना चाहिए। डाइट पर कंट्रोल करने का मतलब ये नहीं है कि कार्बोहाइड्रेट को पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। कुछ फूड्स की डाइट में मात्रा बढ़ाना भी जरूरी है जैसे फाइबर से भरपूर सब्जियां,दालें और दूसरी पल्सेज। फैटी लिवर का इलाज करने के लिए सैचुरेटेड फैट और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स को सीमित करना चाहिए। शराब का सेवन कम से कम करना या क्लीनिक स्थिति के अनुसार पूरी तरह बंद करना बेहतर हो सकता है।

    बॉडी की एक्टिविटी के लिए क्या सिर्फ वॉक है जरूरी

    लिवर के फैट को कंट्रोल करने के लिए सिर्फ वॉक ही काफी नहीं है आप हफ्ते में कम से कम 150 मिनट एरोबिक एक्सरसाइज भी करें। हफ्ते में दो या उससे अधिक दिन रेजिस्टेंस या स्ट्रेंथ ट्रेनिंग भी है जरूरी। चलना सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है, लेकिन यह मांसपेशियों को बढ़ाने का पूरा कार्यक्रम नहीं है। इसलिए फैटी लिवर और कम मांसपेशियों वाले लोगों के लिए स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को भी एक्सरसाइज रूटीन का हिस्सा बनाना जरूरी है। अरुण ने रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम की, फाइबर से भरपूर सब्जियां, दालें और प्रोटीन बढ़ाया तथा डॉक्टर की निगरानी में रेजिस्टेंस एक्सरसाइज शुरू की। उसे डिस्लिपिडेमिया के लिए भी इलाज दिया गया।

    डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल को भी कंट्रोल करना जरूरी

    डायबिटीज, प्रीडायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और डिस्लिपिडेमिया का सही इलाज करना जरूरी है। लिवर एंजाइम हल्के बढ़े होने के कारण स्टेटिन जैसी कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाओं को अपने आप बंद नहीं करना चाहिए। हृदय रोग से बचाव भी बेहद महत्वपूर्ण है। दिलचस्प बात यह रही कि अरुण ने लाइफस्टाइल और डाइट में बदलाव करके अपना कमर का साइज कम किया,ब्लड शुगर कंट्रोल बेहतर हुआ। उसकी बॉडी में ताकत बढ़ी और लिवर से जुड़े मार्कर्स में सुधार हुआ। हालांकि उसका वजन कुछ खास कम नहीं हुआ। लिवर की हेल्थ में सुधार करने के लिए सिर्फ BMI पर ध्यान न दें। शरीर की वह मेटाबॉलिक सेहत जांचें, जो BMI नहीं दिखा पाता।

    डिस्क्लेमर: यह जानकारी केवल सामान्य जागरूकता के उद्देश्य से दी गई है। फैटी लिवर या किसी भी स्वास्थ्य समस्या की स्थिति में स्वयं इलाज करने के बजाय डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें। हर व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति अलग होती है, इसलिए जांच और उपचार व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार किया जाना चाहिए।

  • जब हमारी नीयत अच्छी होती है और हम ईमानदारी से कर्म करते हैं, तो ईश्वर की सहायता किसी न किसी रूप में जरूर मिलती है.

    जब हमारी नीयत अच्छी होती है और हम ईमानदारी से कर्म करते हैं, तो ईश्वर की सहायता किसी न किसी रूप में जरूर मिलती है.

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    स्वामी विवेकानंद विश्वास, मेहनत और आध्यात्मिक सोच को बहुत महत्व देते थे। वे अक्सर अपने विद्यार्थियों और लोगों को एक घटना सुनाया करते थे, जो उनके विद्यार्थी जीवन की थी। उस समय वे नरेंद्र के नाम से जाने जाते थे।

    नरेंद्र को संस्कृत पढ़ाने वाले उनके गुरु जी बहुत गरीब थे। आर्थिक परेशानियों के बावजूद उनका विश्वास ईश्वर पर अटूट था। वे हमेशा अपने विद्यार्थियों से कहते थे कि भगवान बहुत दयालु हैं और वह अपने भक्तों का ध्यान जरूर रखते हैं। गुरु जी की यह बात विद्यार्थियों के मन में गहराई से बस गई थी, क्योंकि वे इसे केवल कहते नहीं थे, बल्कि पूरे विश्वास के साथ जीते भी थे।

    एक दिन गुरु जी कक्षा में पढ़ा रहे थे। तभी एक व्यक्ति वहां आया और उसने उन्हें एक मनी ऑर्डर दिया। साथ ही एक पत्र भी सौंपा। गुरु जी ने जब पत्र पढ़ा तो उनकी आंखों में आंसू आ गए।

    कक्षा खत्म होने के बाद नरेंद्र तुरंत गुरु जी के पास पहुंचे और चिंता से पूछा, “गुरु जी, क्या बात है? सब ठीक तो है?”

    गुरु जी ने बताया कि उनके परिवार के छोटे-छोटे बच्चे कई दिनों से भूखे थे। गरीबी के कारण वे उनके भोजन की व्यवस्था नहीं कर पा रहे थे। तभी एक सज्जन व्यक्ति ने उन्हें पैसे भेजे थे। पत्र में लिखा था कि वह उन्हें जानते हैं और उनके सपने में भगवान शिव आए थे। शिव जी ने उन्हें प्रेरणा दी कि वे गुरु जी की सहायता करें, इसलिए उन्होंने यह धन भेजा है।

    नरेंद्र ने भावुक होकर कहा, “गुरु जी, अगर आप इतनी परेशानी में थे तो हमें बता देते। हम सभी मिलकर आपकी सहायता करते।”

    गुरु जी मुस्कुराए और बोले, “जब ऊपर बैठा परमात्मा मेरी चिंता कर रहा है, तो मैं नीचे वालों से क्यों मांगूं?”

    यह बात नरेंद्र के मन में हमेशा के लिए बस गई। उन्होंने समझ लिया कि सच्चा विश्वास व्यक्ति को अंदर से मजबूत बनाता है। जब नरेंद्र आगे चलकर स्वामी विवेकानंद बने, तब उन्होंने यह घटना कई लोगों को सुनाई और बताया कि जीवन में ईश्वर पर विश्वास रखना चाहिए।

    इस कहानी की सीख यह है कि व्यक्ति को अपने कर्तव्यों और मेहनत से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। प्रयास करना हमारा काम है, लेकिन विश्वास रखना भी उतना ही जरूरी है। जब हमारी नीयत अच्छी होती है और हम ईमानदारी से कर्म करते हैं, तो सहायता किसी न किसी रूप में हमारे जीवन में जरूर आती है।

    जीवन में सुख-शांति पाने के लिए ध्यान रखें ये बातें

    जीवन को बेहतर तरीके से जीने के लिए केवल सफलता हासिल करना ही जरूरी नहीं है, बल्कि मन को शांत, संतुलित और सकारात्मक रखना भी जरूरी है। अपने समय, विचारों, भावनाओं और जिम्मेदारियों को सही दिशा देने से जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण बातों को जीवन में अपनाया जा सकता है।

    • पहली बात
      – अपने लक्ष्य स्पष्ट रखें। जिस व्यक्ति को यह पता होता है कि उसे जीवन में क्या हासिल करना है, वह कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ता रहता है। छोटे-छोटे लक्ष्य बनाकर उन्हें पूरा करने की आदत आत्मविश्वास बढ़ाती है।
    • दूसरी बात
      – समय का सम्मान करें। समय जीवन की सबसे मूल्यवान संपत्ति है। जो व्यक्ति समय का सही उपयोग करता है, वह कम साधनों में भी बड़ी उपलब्धियां प्राप्त कर सकता है। आलस और टालमटोल की आदत को छोड़कर हर दिन को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए।
    • तीसरी बात
      – मेहनत के साथ विश्वास बनाए रखें। जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियां आती हैं जब रास्ते कठिन लगने लगते हैं। ऐसे समय में निराश होने की बजाय अपने प्रयासों पर भरोसा रखना चाहिए और ईश्वर पर आस्था बनाए रखनी चाहिए। विश्वास मन को शक्ति देता है और कठिन समय में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
    • चौथी बात
      – सकारात्मक सोच रखें। हमारे विचार हमारे व्यवहार और निर्णयों को प्रभावित करते हैं। नकारात्मक सोच समस्याओं को बड़ा बना देती है, जबकि सकारात्मक सोच समाधान खोजने में मदद करती है।
    • पांचवीं बात
      – अपनी जिम्मेदारियों को स्वीकार करें। जीवन में आने वाली चुनौतियों से भागने की बजाय उनका सामना करना चाहिए। गलतियों से सीख लेकर आगे बढ़ने वाला व्यक्ति ही जीवन में सफल होता है।
    • छठी बात
      – दूसरों के प्रति दयालु और सहयोगी बनें। अच्छे व्यवहार और मदद की भावना से रिश्ते मजबूत होते हैं और जीवन में संतोष बढ़ता है।
    • स्वामी विवेकानंद का संदेश यही है कि व्यक्ति को पूरी निष्ठा से कर्म करना चाहिए और परमात्मा पर विश्वास रखना चाहिए। ईश्वर पर भरोसा करने का अर्थ यह नहीं कि हम प्रयास करना छोड़ दें, बल्कि इसका अर्थ है कि पूरी मेहनत करने के बाद परिणाम को सकारात्मक भावना से स्वीकार करें। अच्छा जीवन वही है जिसमें मेहनत, विश्वास, अनुशासन और सकारात्मक सोच का संतुलन हो।
  • दुनिया का सबसे ऊंचा पहाड़ माउंट एवरेस्ट नहीं! समुद्र के नीचे छिपा है असली राज, जानें कौन है नंबर-1

    दुनिया का सबसे ऊंचा पहाड़ माउंट एवरेस्ट नहीं! समुद्र के नीचे छिपा है असली राज, जानें कौन है नंबर-1

    जब भी दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ का नाम पूछा जाता है, ज्यादातर लोगों के दिमाग में एक ही नाम आता है—माउंट एवरेस्ट। नेपाल और तिब्बत की सीमा पर खड़ा एवरेस्ट समुद्र तल से करीब 8,848.86 मीटर ऊंचा है और लंबे समय से इसे दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माना जाता है।

    लेकिन कहानी यहां थोड़ी दिलचस्प हो जाती है। अगर किसी पहाड़ की ऊंचाई उसके समुद्र तल से शिखर तक नहीं, बल्कि उसके वास्तविक आधार से चोटी तक मापी जाए, तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। इस पैमाने पर माउंट एवरेस्ट नंबर-1 नहीं रहता।

    समुद्र के अंदर छिपा है विशाल पहाड़

    दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ का खिताब इस मापदंड पर माउना केआ को मिलता है, जो अमेरिका के हवाई द्वीप पर स्थित है। यह एक विशाल और निष्क्रिय ज्वालामुखी है।

    समुद्र तल से माउना केआ की ऊंचाई करीब 4,205 मीटर है। पहली नजर में यह एवरेस्ट से काफी छोटा लगता है, लेकिन इसकी असली ऊंचाई समुद्र के नीचे छिपी हुई है।

    माउना केआ का आधार प्रशांत महासागर की गहराई में है। आधार से लेकर शिखर तक इसकी कुल ऊंचाई लगभग 10,205 मीटर बैठती है। यानी इस तरीके से मापने पर यह एवरेस्ट से करीब 1.4 किलोमीटर ज्यादा ऊंचा हो जाता है।

    दरअसल, माउना केआ का करीब 6 किलोमीटर हिस्सा समुद्र के पानी के नीचे मौजूद है। यही वजह है कि जमीन से देखने पर इसकी वास्तविक विशालता का अंदाजा लगाना मुश्किल होता है।

    नाम का मतलब भी है खास

    माउना केआ नाम हवाईयन भाषा से आया है और इसका अर्थ लगभग ‘सफेद पहाड़’ माना जाता है। इसके ऊपरी हिस्से में सर्दियों के दौरान बर्फ भी दिखाई दे सकती है।

    यह एक निष्क्रिय ज्वालामुखी है। माना जाता है कि यह हजारों वर्षों से नहीं फटा है, हालांकि वैज्ञानिक भविष्य में इसकी गतिविधि की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं करते।

    माउना केआ की एक और खासियत है। इसके शिखर पर दुनिया की कई महत्वपूर्ण खगोलीय वेधशालाएं मौजूद हैं। ऊंचाई और वातावरण की परिस्थितियों के कारण यहां से अंतरिक्ष का अध्ययन करना काफी सुविधाजनक माना जाता है।

    फिर एवरेस्ट का क्या स्थान है?

    अब सवाल उठता है कि अगर माउना केआ आधार से शिखर तक सबसे ऊंचा है, तो एवरेस्ट को दुनिया का सबसे ऊंचा पहाड़ क्यों कहा जाता है?

    इसका कारण है ऊंचाई मापने का तरीका।

    आम तौर पर पर्वत की ऊंचाई समुद्र तल से उसके शिखर तक मापी जाती है। इस पैमाने पर माउंट एवरेस्ट करीब 8,848.86 मीटर ऊंचा है और दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी बना हुआ है।

    यानी एवरेस्ट को गलत कहना भी सही नहीं होगा। वह समुद्र तल से दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है, जबकि माउना केआ अपने आधार से शिखर तक सबसे ऊंचे पहाड़ों में सबसे आगे है।

    एक और पहाड़ भी है बेहद खास

    इसी कहानी में हवाई का एक और विशाल ज्वालामुखी माउना लोआ भी आता है। आधार से शिखर तक इसकी कुल ऊंचाई लगभग 9,170 मीटर मानी जाती है। इसका बड़ा हिस्सा भी समुद्र के नीचे मौजूद है।

    लेकिन दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ों की चर्चा केवल इन दो नामों तक सीमित नहीं है। इक्वाडोर का माउंट चिम्बोराजो भी अपनी एक अनोखी वजह से बेहद खास है।

    पृथ्वी के केंद्र से सबसे दूर चिम्बोराजो

    चिम्बोराजो समुद्र तल से एवरेस्ट जितना ऊंचा नहीं है और आधार से शिखर तक भी माउना केआ से पीछे है। फिर भी इसके पास एक ऐसा रिकॉर्ड है, जिसे जानकर आप हैरान हो सकते हैं।

    पृथ्वी पूरी तरह गोल गेंद जैसी नहीं है। वह भूमध्य रेखा के आसपास थोड़ी उभरी हुई है। चिम्बोराजो भूमध्य रेखा के काफी करीब स्थित है। इसलिए इसका शिखर पृथ्वी के केंद्र से मापा जाए तो वह एवरेस्ट के शिखर से भी ज्यादा दूर निकल जाता है।

    इस तरह तीन अलग-अलग मापदंडों पर तीन अलग-अलग पहाड़ खास बन जाते हैं।

    समुद्र तल से ऊंचाई: माउंट एवरेस्ट
    आधार से शिखर तक ऊंचाई: माउना केआ
    पृथ्वी के केंद्र से सबसे दूर शिखर: माउंट चिम्बोराजो

    तो अगली बार कोई पूछे कि दुनिया का सबसे ऊंचा पहाड़ कौन सा है, तो सिर्फ एवरेस्ट बोलने से पहले यह जरूर पूछिए—किस तरीके से ऊंचाई माप रहे हैं?