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  • 100 साल पुराने आम के बाग ने दिलाया इस किसान को अवॉर्ड, इनकी खूबियां भी जान लीजिए…

    100 साल पुराने आम के बाग ने दिलाया इस किसान को अवॉर्ड, इनकी खूबियां भी जान लीजिए…

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    लखनऊ में आयोजित प्रदेश स्तरीय आम महोत्सव में सहारनपुर के मुजफ्फराबाद ब्लॉक के गांव रणडौल के किसान बसंत कुमार ने जिले का नाम पूरे प्रदेश में रोशन कर दिया. बागवानी की बेहतरीन तकनीक, दुर्लभ आम की किस्मों के संरक्षण और प्राकृतिक तरीके से बागों की देखरेख के लिए उन्हें प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें ट्रॉफी, प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया. इस उपलब्धि से पूरे जिले में खुशी का माहौल है.

    100 साल पुराने पुश्तैनी बाग की करते हैं देखभाल
    72 वर्षीय बसंत कुमार ने बताया कि वे अपने बागों की देखभाल बच्चों की तरह करते हैं. उनके पास करीब ढाई एकड़ में फैला 100 साल से भी अधिक पुराना पुश्तैनी आम का बाग है, जिसे उनके पिता ने लगाया था और जो आज भी भरपूर फल दे रहा है. उन्होंने बताया कि वे बागों में प्रतिबंधित कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करते. समय-समय पर जुताई, खरपतवार की सफाई और प्राकृतिक तरीकों से पौधों की सुरक्षा करते हैं. पुराने पेड़ों को बचाने के साथ-साथ उनकी कलम तैयार कर नई पौध भी विकसित कर रहे हैं, ताकि यह विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके.

    1984 से तैयार किए 130 बीघा में आम के बाग
    बसंत कुमार ने बताया कि वर्ष 1984 से उन्होंने खुद बाग तैयार करने का काम शुरू किया था. आज उनके हाथों से करीब 130 बीघा क्षेत्र में आम के बाग विकसित हो चुके हैं. उनके बागों में आम की 20 से अधिक प्रजातियां मौजूद हैं. लखनऊ आम महोत्सव में वे अपने भतीजे योगेश और समधी विनोद पुंडीर के साथ 16 किस्म के आम लेकर पहुंचे थे. इनमें फजली, तोतापरी, मलियागिरि, मल्लिका, रामकेला, जाफरान, मालदा, लंगड़ा, चौसा, हाथीफूल समेत कई दुर्लभ और उत्कृष्ट किस्में शामिल थीं. जिला उद्यान अधिकारी द्वारा निरीक्षण और रिपोर्ट भेजे जाने के बाद लखनऊ से आई टीम ने भी उनके बाग का दौरा किया था.

    ‘यह सम्मान पूरे जिले और गांव के किसानों का है’
    सम्मान मिलने के बाद भावुक हुए बसंत कुमार ने कहा कि सबसे बड़ी खुशी इस बात की है कि मुख्यमंत्री ने मंच से सबसे पहले उनके गांव रणडौल और सहारनपुर का नाम लिया. उन्होंने कहा कि वे खुद को एक छोटा किसान मानते हैं, लेकिन यह सम्मान पूरे जिले और गांव के किसानों का सम्मान है. मुख्यमंत्री ने उन्हें शील्ड, प्रशस्ति पत्र और एक पौधा भी भेंट किया. बसंत कुमार का कहना है कि उनकी कोशिश रहेगी कि पारंपरिक बागवानी, आम की पुरानी दुर्लभ किस्मों के संरक्षण और प्राकृतिक खेती को आगे बढ़ाते हुए नई पीढ़ी को भी इससे जोड़ा जाए.

  • भारत के इस शहर को कहा जाता है ‘इत्र की राजधानी’, जहां घर-घर से आती है इत्र की खुशबू

    भारत के इस शहर को कहा जाता है ‘इत्र की राजधानी’, जहां घर-घर से आती है इत्र की खुशबू

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    आज के दौर में जहां ज्यादातर परफ्यूम फैक्ट्रियों में मशीनों से बनते हैं, वहीं उत्तर प्रदेश का कन्नौज आज भी सदियों पुराने तरीके से प्राकृतिक अत्तर तैयार करता है. यहां हर खुशबू के पीछे पीढ़ियों का अनुभव और पारंपरिक कारीगरी छिपी है. इसी वजह से कन्नौज को भारत की ‘परफ्यूम कैपिटल’ कहा जाता है.

    कन्नौज में इत्र बनाने का काम सदियों से किया जा रहा है. यहां कई परिवार ऐसे हैं, जो अपने खास इत्र के नुस्खे और बनाने की तकनीक को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाते हैं. इन पारंपरिक तरीकों की वजह से कन्नौज के अत्तर की पहचान देश ही नहीं, विदेशों तक बनी हुई है.

    फूलों और प्राकृतिक चीजों से तैयार होता है अत्तर
    यहां बनने वाले अत्तर में गुलाब, चमेली, केवड़ा और कई तरह के सुगंधित फूलों का इस्तेमाल किया जाता है. इन प्राकृतिक सामग्री से तैयार इत्र अपनी लंबे समय तक टिकने वाली खुशबू के लिए जाना जाता है. यही वजह है कि प्राकृतिक अत्तर आज भी लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं.

    आज भी अपनाई जाती है पारंपरिक डिस्टिलेशन तकनीक
    कन्नौज के कई इत्र निर्माता आज भी पारंपरिक ‘देग-भापका’ विधि का इस्तेमाल करते हैं. इस तकनीक में तांबे के बर्तनों में फूलों और अन्य प्राकृतिक सामग्री को धीमी आंच पर पकाकर उनकी खुशबू निकाली जाती है. इसके बाद इस सुगंध को चंदन के तेल में मिलाया जाता है, जिससे इत्र की खुशबू और भी गहरी और लंबे समय तक टिकने वाली बन जाती है.

    मिट्टी का अत्तर है सबसे अनोखी पहचान
    कन्नौज की सबसे खास पहचान ‘मिट्टी का अत्तर’ है. इसे इस तरह तैयार किया जाता है कि इसमें पहली बारिश के बाद सूखी धरती से उठने वाली सोंधी खुशबू महसूस होती है. यह अनोखा अत्तर दुनियाभर में अपनी अलग पहचान रखता है.

  • रगों के प्रयोग से भी चमका सकते हैं अपनी किस्मत… लेकिन कैसे… यहां जानिए..

    रगों के प्रयोग से भी चमका सकते हैं अपनी किस्मत… लेकिन कैसे… यहां जानिए..

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    दुनिया में मुख्य रूप से दो ही शक्तियां काम करती हैं. एक रंग और दूसरा तरंग. इन्हीं शक्तियों से ही सारी सृष्टि चलती है. हर व्यक्ति, वस्तु यहां तक कि शब्दों और भावनाओं का भी रंग होता है. रंगों से ही हमारा मिलन होता है और रंग ही हमें दूर भी करते हैं. रंग के आधार पर ही सारे ग्रह, नक्षत्र और ज्योतिष काम करता है. सही और सटीक रंग हमारी किस्मत को मजबूत करते हैं और बाकी रंगों से किस्मत कमजोर होती है.

    क्या है लाल रंग की विशेषता
    अत्यंत ऊर्जा और शक्ति का रंग लाल है. ज्योतिष में इसको मंगल और सूर्य का रंग माना जाता है. अगर यह रंग शुभ हो तो आत्मविश्वास, साहस और अच्छे स्वास्थ्य की प्रप्ति होती है. इस रंग के नुकसान करने पर दुर्घटनाओं और चोट-चपेट की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. अगर मन जल्दी अशांत होता हो तो इस रंग का प्रयोग नहीं करना चाहिए.  मिथुन और कन्या राशी के लोगों को यह रंग आम तौर पर लाभ नहीं करता.

    क्या है पीला रंग की विशेषता
    पीला रंग शुभ चीज़ों और मंगल कार्यों से सम्बन्ध रखता है. ज्योतिष में इसको बृहस्पति का रंग माना जाता है. अगर यह रंग अनुकूल हो तो शिक्षा, संतान सुख और ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है. अगर यह रंग नुकसान करे तो पेट और दाम्पत्य जीवन में समस्या आ जाती है. जो लोग स्वभाव से सात्विक न हों उन्हें इस रंग का प्रयोग नहीं करना चाहिए. यह रंग वृष, तुला और मकर राशी के लिए अनुकूल नहीं होता.

    हरा रंग की विशेषता
    हरा रंग अच्छे स्वास्थ्य और मूड से सीधा सम्बन्ध रखता है. ज्योतिष में यह बुध का रंग माना जाता है. अगर यह रंग लाभदायक हो तो मन और दिमाग को अच्छा करता है, स्वास्थ्य उत्तम कर देता है. अगर यह रंग नुकसान करे तो चिंताएं बढ़ा देता है तथा त्वचा की समस्या दे सकता है. जिन लोगों को दिमाग और वाणी का ज्यादा प्रयोग करना हो ऐसे लोगों को इस रंग का प्रयोग जरूर करना चाहिए. यह रंग कर्क और वृश्चिक राशी के लिए अनुकूल नहीं होता.

    नीला रंग
    यह रंग तीव्र आध्यात्म और भाग्य से सम्बन्ध रखता है. ज्योतिष में इसको शुभ शनि का रंग माना जाता है. यह रंग लाभ दे तो व्यक्ति की बुद्धि और कार्य की क्षमता को बढाता है, अंतर्ज्ञान की क्षमता बढ़ा देता है. अगर नुकसान करे तो वाणी ख़राब करता है और करियर को रोक देता है. जिन लोगों को आध्यात्मिक और मानसिक उन्नति करनी हो उनको हल्के नीले रंग का प्रयोग जरूर करना चाहिए. यह रंग मिथुन, तुला और कुम्भ राशी के लिए अत्यंत शुभ होता है.

    सफेद रंग
    यह रंग वास्तव में सातों रंग का सटीक मिश्रण है. यह रंग चन्द्रमा और शुक्र का रंग माना जाता है. ईश्वर-आध्यात्म तथा सफलता की उच्चतम स्थिति का सम्बन्ध इस रंग से है. यह रंग जब स्वयं से अनुकूल लगने लगे या दिखने लगे तो ईश्वर की कृपा समझनी चाहिए. जिन लोगों को इस रंग का अनुभव होने लगता है, उनको जीवन में अपने व्यवहार और स्वभाव का ध्यान रखना चाहिए.

    काला रंग
    यह रंग वास्तव में कोई रंग नहीं है, जहां कोई रंग नहीं होता, वहां काला रंग होता है. यह रंग शनि के अशुभ प्रभाव को दर्शाता है. हालांकि इस रंग को नकारात्मक माना जाता है, पर आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत यहीं से होती है. यह रंग तभी ज्यादा प्रयोग करना चाहिए, जब जीवन सामान्य गति से चल रहा हो. अगर आप जिन्दगी के बुरे दौर से गुजर रहे हों तो भूल कर भी इस रंग का प्रयोग न करें.

  • गलती मानने पर इन लोगों को करें माफ, लेकिन अगर मानते हैं आचार्य चाणक्य को… तो गलती से भी इन्हें न दें माफी

    गलती मानने पर इन लोगों को करें माफ, लेकिन अगर मानते हैं आचार्य चाणक्य को… तो गलती से भी इन्हें न दें माफी

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    अक्सर लोग मानते हैं कि दूसरों को माफ करना एक क्वालिटी है, लेकिन आचार्य चाणाक्य कुछ और ही मानते हैं. आचार्य चाणक्य को भारत के सबसे महान विद्वानों में गिना जाता है. ऐसे में कई लोग उनकी बातों को मानते हैं.

    चाणक्य नीति में माफी को बहुत बड़ा गुण बताया गया है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि हर व्यक्ति को हर गलती के लिए माफ करना समझदारी नहीं होती. कई बार जरूरत से ज्यादा नरमी आपकी कमजोरी बन सकती है. इसलिए यह समझना जरूरी है कि किसे माफ करना चाहिए और किसे नहीं.

    जब अनजाने में हुई हो गलती

    अगर किसी व्यक्ति से पहली बार कोई गलती हुई है और उसका इरादा गलत नहीं था, तो उसे माफ कर देना चाहिए. इंसान से गलती होना आम बात है. अगर सामने वाला अपनी गलती स्वीकार करता है और उसे सच में पछतावा है, तो उसे सुधारने का एक मौका जरूर देना चाहिए.

    बच्चों और कमजोर लोगों की गलतियां

    चाणक्य कहते हैं, जो लोग आपसे छोटे हैं या आपके नीचे काम करते हैं, उनकी छोटी-छोटी गलतियों पर ज्यादा गुस्सा नहीं करना चाहिए. बच्चों, विद्यार्थियों या कर्मचारियों को डांटने के बजाय प्यार से समझाना ज्यादा अच्छा तरीका है.

    जब आपके पास सजा देने की ताकत हो

    चाणक्य नीति कहती है कि असली ताकत उसी की होती है जो चाहकर भी बदला लेने के बजाय सही समय पर माफ करना जानता है. अगर सामने वाला अपनी गलती मान चुका है और सच्चे मन से माफी मांग रहा है, तो उसे माफ करना आपकी कमजोरी नहीं बल्कि ताकत है.

    बुरे और धोखेबाज लोगों से रहें सावधान

    अगर कोई व्यक्ति स्वभाव से ही धोखेबाज है और हमेशा दूसरों का नुकसान करने की सोचता है, तो उसे बार-बार माफ करना सही नहीं है. ऐसे लोग आपकी अच्छाई को आपकी कमजोरी समझ लेते हैं और फिर दोबारा आपको नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं.

    जो बार-बार एक ही गलती दोहराए

    अगर कोई व्यक्ति हर बार वही गलती करता है और सिर्फ बचने के लिए माफी मांगता है, तो यह उसकी आदत बन चुकी है. ऐसे इंसान को बार-बार माफ करना आपके लिए नुकसानदायक हो सकता है.

    विश्वास तोड़ने वाले को दूसरा मौका न दें

    चाणक्य का मानना था कि विश्वास किसी भी रिश्ते की सबसे मजबूत नींव होता है. अगर कोई व्यक्ति आपका भरोसा तोड़ देता है या पीठ पीछे धोखा देता है, तो उस पर दोबारा आंख बंद करके भरोसा करना सही फैसला नहीं है.

  • इंग्लैंड की वो रहस्यमयी पहाड़ी, जहां 400 साल बाद भी ‘डायनों’ की कहानियां लोगों को डराती हैं..

    इंग्लैंड की वो रहस्यमयी पहाड़ी, जहां 400 साल बाद भी ‘डायनों’ की कहानियां लोगों को डराती हैं..

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    • 17वीं सदी की डायनों की कहानी

    • कई लोगों पर जादू-टोना करने का आरोप

    दुनिया में कई ऐसी जगहें हैं, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ रहस्यमयी कहानियों के लिए भी मशहूर हैं. भूत-प्रेत, काला जादू और रहस्यमयी मौतों से जुड़ी घटनाएं लोगों को हमेशा आकर्षित करती रही हैं. हालांकि, जब ऐसी कहानियों का संबंध किसी वास्तविक जगह से जुड़ जाता है, तो रोमांच की जगह डर हावी होने लगता है.

    आमतौर पर पहाड़ और हिल स्टेशन सुकून और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाने जाते हैं, लेकिन कुछ जगहें ऐसी भी हैं जिनका नाम सुनते ही लोगों के मन में खौफ पैदा हो जाता है. इंग्लैंड के लैंकाशायर (Lancashire) स्थित पेंडल हिल (Pendle Hill) ऐसी ही एक जगह है. यह पहाड़ी अपने खूबसूरत नजारों के साथ-साथ सदियों पुराने डरावने इतिहास के लिए भी दुनिया भर में मशहूर है.

    17वीं सदी की डायनों की कहानी
    पेंडल हिल का नाम सबसे ज्यादा वर्ष 1612 के पेंडल विच ट्रायल (Pendle Witch Trials) से जुड़ा हुआ है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, उस समय इस इलाके में कुछ महिलाएं रहती थीं, जिन पर काला जादू और तंत्र-मंत्र करने के आरोप लगाए गए थे. माना जाता है कि ये महिलाएं लोगों को अपने वश में करने और उन पर जादुई शक्तियों का इस्तेमाल करने में माहिर थीं. इसी दौरान इलाके में कई लोगों और मवेशियों की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौतें होने लगीं. लगातार हो रही इन घटनाओं से पूरे क्षेत्र में दहशत फैल गई और लोगों ने इन मौतों के पीछे काला जादू होने की आशंका जताई.

    कई लोगों पर जादू-टोना करने का आरोप
    रहस्यमयी मौतों की बढ़ती घटनाओं के बाद स्थानीय मजिस्ट्रेट ने मामले की जांच शुरू कराई. ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, जांच के दौरान कई लोगों पर जादू-टोना करने और हत्या के आरोप लगाए गए. उस समय अदालत में चली सुनवाई के बाद 12 आरोपियों पर मुकदमा चला, जिनमें से 10 लोगों को दोषी ठहराकर फांसी दे दी गई, जबकि एक आरोपी जेल में ही मर गया और एक को बरी कर दिया गया. हालांकि, आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि इन मामलों में अंधविश्वास, सामाजिक परिस्थितियां और धार्मिक मान्यताएं भी बड़ी वजह थीं.

    आज भी क्यों डरते हैं लोग?
    सैकड़ों साल बीत जाने के बावजूद पेंडल हिल को लेकर कई डरावनी कहानियां आज भी सुनने को मिलती हैं. स्थानीय लोगों का दावा है कि इस इलाके में कई लोगों ने अजीब आवाजें, रहस्यमयी परछाइयां और असामान्य घटनाएं महसूस की हैं. यही वजह है कि कुछ लोग आज भी इस पहाड़ी पर अकेले जाने से बचते हैं. हालांकि, हर कोई इन दावों पर विश्वास नहीं करता.

  • क्या होता है LED Face Mask? बढ़ रहा क्रेज, जानिए क्या हैं इसके फायदे, किसे करना चाहिए इस्तेमाल और सही तरीका

    क्या होता है LED Face Mask? बढ़ रहा क्रेज, जानिए क्या हैं इसके फायदे, किसे करना चाहिए इस्तेमाल और सही तरीका

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    खूबसूरत और हेल्दी स्किन पाने के लिए लोग तरह-तरह के स्किन केयर प्रोडक्ट्स और ट्रीटमेंट अपनाते हैं. इन दिनों LED Face Mask भी काफी चर्चा में है. पहले यह सुविधा सिर्फ स्किन क्लीनिक में मिलती थी, लेकिन अब घर पर इस्तेमाल करने वाले LED Face Mask भी आसानी से उपलब्ध हैं. कई सेलिब्रिटी और ब्यूटी इन्फ्लुएंसर भी इसे अपनी स्किन केयर रूटीन का हिस्सा बना चुके हैं. ऐसे में अगर आप भी इसे खरीदने की सोच रहे हैं, तो पहले जान लें कि यह क्या है, कैसे काम करता है और इसका सही इस्तेमाल क्या है.


    LED Face Mask एक खास स्किनकेयर डिवाइस है. इसमें अलग-अलग रंगों की LED लाइट लगी होती हैं, जो त्वचा की ऊपरी परत पर काम करती हैं. हर रंग की लाइट का अपना अलग फायदा होता है. यह बिना दर्द वाला स्किन ट्रीटमेंट माना जाता है, जिसे घर पर भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है.


    रेड लाइट: अगर आप बढ़ती उम्र के असर जैसे झुर्रियां और फाइन लाइन्स कम करना चाहते हैं, तो रेड लाइट मददगार मानी जाती है.
    ब्लू लाइट: यह मुंहासे पैदा करने वाले बैक्टीरिया पर काम करती है. इसलिए एक्ने वाली स्किन के लिए इसे अच्छा माना जाता है.
    ग्रीन लाइट: अगर चेहरे पर पिगमेंटेशन, दाग-धब्बे या स्किन टोन असमान है, तो ग्रीन लाइट उससे जुड़ी समस्याओं में मदद कर सकती है.


    घर पर इस्तेमाल होने वाले LED Face Mask को हफ्ते में 3 से 5 बार इस्तेमाल करना काफी है. इसे रोज लगाने की जरूरत नहीं होती. कई लोग सोचते हैं कि रोज इस्तेमाल करने से जल्दी फायदा मिलेगा, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है.


    LED Face Mask खरीदने से पहले अपनी स्किन की जरूरत को समझें. अगर आपकी त्वचा बहुत संवेदनशील है या किसी स्किन बीमारी का इलाज चल रहा है, तो इसे इस्तेमाल करने से पहले स्किन एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें. साथ ही, हमेशा अच्छी क्वालिटी का LED Mask ही खरीदें और उसके साथ दिए गए निर्देशों का पालन करें. सही तरीके से इस्तेमाल करने पर ही इसका बेहतर फायदा मिल सकता है.

  • मृत्यु के बाद क्या होता है आत्मा के साथ… क्यों 13 दिनों तक आत्मा अपने ही घर में रहती है… जानें क्या कहता है गरुड़ पुराण..?

    मृत्यु के बाद क्या होता है आत्मा के साथ… क्यों 13 दिनों तक आत्मा अपने ही घर में रहती है… जानें क्या कहता है गरुड़ पुराण..?

    हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है कि भले ही किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है लेकिन आत्मा अमर है. किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के बाद आत्मा का नया सफर शुरू हो जाता है. गरुड़ पुराण में बताया गया है कि आत्मा का क्या होता है. अधिकांश लोग यह सोचते हैं कि किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के बाद आत्मा तुरंत स्वर्ग या नर्क चली जाती है लेकिन गरुण पुराण के मुताबिक ऐसा नहीं होता है. किसी व्यक्ति की मौत के बाद आत्मा शरीर से बाहर निकलकर 13 दिनों तक अपने ही घर में अपने परिवार वालों के बीच रहती है.

    यमलोक से यमदूत आते हैं आत्मा को लेने
    गरुड़ पुराण के मुताबिक किसी व्यक्ति की मौत के बाद तुरंत यमलोक से दो यमदूत आत्मा को लेने के लिए आ जाते हैं. यमदूत आत्मा को अपने संग लेकर यमलोक चले जाते हैं. गरुण पुराण के मुताबिक आत्मा को यमलोक ले जाने का उद्देश्य महज इतना ही होता है कि उसे उसके जीवनभर के अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब-किताब दिखाया जा सके. यमराज के दरबार में आत्मा को उसके कर्मों की झलक दिखाई जाती है. इसके बाद यमदूत आत्मा को वापस उसी के घर पर छोड़ देते हैं, जहां वह रहती थी. आत्मा को यमलोक ले जाने और उसके कर्मों की झलक दिखाने में लगभग 24 घंटे यानी एक दिन का समय लग जाता है. आत्मा को इसके बाद अगले 13 दिनों तक अपने परिवार के बीच रहना पड़ता है.

    अपनो के बीच घर में क्या करती है आत्मा
    गरुड़ पुराण के मुताबिक आत्मा जब यमलोक से अपने घर आती है तो उसे अपने परिवार और अपनी चीजों से लगाव अधिक महसूस होने लगता है. वह दूर से अपने मृत पड़े शरीर को देखती है और घरवालों को भी रोते हुए पाती है. इससे आत्मा परेशान हो जाती है. वह अपने घरवालों को चुप कराने की कोशिश करती है, उनसे बात करना चाहती है और उन्हें आवाज भी देती है. हालांकि वह पूरी तरह से हवा जैसी एनर्जी बन चुकी होती है. ऐसे में कोई भी आत्मा को देख या फिर सुन नहीं सकता है. कई बार आत्मा अपने पुराने शरीर के अंदर घुसने की कोशिश भी करती है, लेकिन नियमों की वजह से वह अपने शरीर में वापस नहीं जा पाती.

    ऐसे आत्मा की भूख और प्यास होती है शांत
    शरीर से निकलने के बाद आत्मा खुद को बहुत कमजोर महसूस करती है. उसे भूख और प्यास भी लगती है. गरुड़ पुराण के मुताबिक मौत के बाद के पहले 10 दिनों तक घर के लोग जो पिंडदान यानी चावल या जौ के आटे से बने गोल लड्डू का दान करते हैं, वह आत्मा के लिए काफी जरूरी होता है. रोज पिंडदान किया जाता है, उससे आत्मा की भूख व प्यास शांत होती है. इसी पिंडदान की ताकत से आत्मा को एक नया अदृश्य शरीर मिलता है, ताकि वह आगे का सफर तय कर सके. रोज के पिंडदान से इस नए शरीर के अलग-अलग हिस्से बनते हैं, जिससे आत्मा को आगे की यात्रा के लिए ताकत मिलती है.

    आत्मा के नए अदृश्य शरीर को मिलती है ताकत
    किसी व्यक्ति के मरने के 11वें और 12वें दिन घर में जो खास पूजा-पाठ और पिंडदान किए जाते हैं, वे आत्मा के अदृश्य शरीर को मजबूत और स्थिर बनाते हैं. इन दो दिनों में परिवार के लोग जो प्रार्थना करते हैं, उससे आत्मा को बहुत शांति मिलती है. आत्मा को यह अहसास हो जाता है कि अब उसका इस दुनिया का सफर पूरी तरह से खत्म हो चुका है और उसे आगे बढ़ना ही होगा. इन दिनों की पूजा से आत्मा को वह ताकत मिलती है जिससे वह पृथ्वी लोक को छोड़कर यमलोक के कठिन रास्ते पर आसानी से चल सके.

    इस तरह से आत्मा की होती है अंतिम विदाई
    आत्मा के लिए 13वां दिन विशेष होता है. इस दिन को तेरहवीं भी कहते हैं. तेरहवीं के दिन घर पर विशेष पूजा-पाठ होती है, पंडितों को भोजन कराया जाता है और गरीबों को दान दिया जाता है. गरुड़ पुराण के मुताबिक तेरहवीं के दिन जो भी चीजें दान की जाती हैं, उनका फायदा सीधे तौर पर आत्मा को यमलोक के सफर में भोजन, पानी और रास्ते की सुख-सुविधाओं के रूप में प्राप्त होता है. तेरहवीं की पूरी प्रक्रिया पूरी होते ही यमदूत दोबारा आते हैं. गरुण पुराण के मुताबिक इसके बाद आत्मा का धरती और अपने परिवार से नाता हमेशा के लिए टूट जाता है. आत्मा यमलोक की यात्रा पर निकल पड़ती है. इस यात्रा को पूरा करने में आत्मा को लगभग एक साल का समय लग जाता है.

  • भविष्य से लौटने का दावा कर रहा शख्स! 274 साल आगे की दुनिया को लेकर किए चौंकाने वाले खुलासे..​​​​

    भविष्य से लौटने का दावा कर रहा शख्स! 274 साल आगे की दुनिया को लेकर किए चौंकाने वाले खुलासे..​​​​

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    मॉस्को. भविष्य की दुनिया कैसी दिखेगी और आने वाले 200 सालों में इंसानियत का क्या होगा, इसे जानने को लेकर लोगों के मन में हमेशा से ही उत्सुकता बनी रहती है. इंटरनेट पर अक्सर ऐसे दावे सामने आते रहते हैं, जो इंसान की सोच को चुनौती देते हैं. ऐसा ही एक मामला फिर सुर्खियों में है, जहां रोमन नाम के एक शख्स ने दावा किया है कि वह साल 2300 से टाइम ट्रैवल करके वर्तमान समय में वापस लौटा है. साइबेरिया के एक अज्ञात गुप्त ठिकाने से बात करते हुए इस शख्स ने भविष्य को लेकर एक ऐसा खौफनाक मंजर बयां किया है, जिसे सुनकर किसी के भी होश उड़ जाएंगे. पैरा-नॉर्मल और रहस्यमयी घटनाओं पर शोध करने वाले यूट्यूब चैनल ‘एपेक्स’ से बातचीत में रोमन ने कहा कि वह ओक्लो नामक एक ऐसे संगठन के लिए काम करता था, जो अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की तरह सीक्रेट ऑपरेशन्स चलाती है.

    रोमन के अनुसार, इस संगठन ने टाइम ट्रैवल के लिए स्पाइडर नाम की एक जटिल और विशालकाय मशीन बनाई थी. इस मशीन के केंद्र में मुख्य इंजन था और इसके चारों ओर 8 बड़े कॉलम खड़े थे, जो 45 हजार केबल लाइनों से जुड़े हुए थे. रोमन का दावा है कि अमेरिका, रूस, चीन और जर्मनी समेत दुनिया के 8 सबसे शक्तिशाली देशों ने मिलकर एक संधि की थी. इस समझौते के तहत भूतकाल में जाने पर सख्त पाबंदी थी, ताकि कोई इतिहास न बदल सके. यही वजह थी कि उन्हें सिर्फ भविष्य में जाने की इजाजत थी. रोमन ने साल 2300 की अपनी यात्रा को जिंदगी का सबसे डरावना और चौंकाने वाला अनुभव बताया. उसने दावा किया कि 200 साल बाद की दुनिया पूरी तरह से हाई-टेक्नोलॉजी और रोबोट्स से घिरी हुई है.

    भविष्य में उड़ने वाली कारें और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस आम बात बन चुके हैं, लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि वहां की इमारतें, सड़कें और गाड़ियां सभी हरी-भरी घास से ढकी हुई थीं. हालांकि, असली खौफ तब शुरू हुआ जब अचानक उन्हें एक भयानक और गूंजती हुई दहाड़ सुनाई दी. रोमन के मुताबिक, जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो उनके होश उड़ गए. उनके सामने 100 मीटर से भी ज्यादा लंबा एक विशालकाय डायनासोर खड़ा था, जिसके हर कदम से धरती कांप रही थी. जान बचाने के लिए जब वे पेड़ों के पीछे छिपे, तो उन्होंने देखा कि वहां ऐसे कई छोटे-बड़े डायनासोरों का झुंड घूम रहा था. रोमन का कहना है कि उस वक्त उन्हें लगा कि अब उनकी मौत तय है और भविष्य की इस दुनिया में उन्हें अपनी कब्र तक नसीब नहीं होगी.

    हालांकि, वे किसी तरह अपनी जान बचाकर वापस लौटने में कामयाब रहे. सोशल मीडिया पर जैसे ही यह वीडियो शेयर हुआ, वैसे ही वायरल हो गया. ज्यादातर लोगों ने इसे एक बनावटी कहानी, पब्लिसिटी स्टंट और फर्जीवाड़ा करार दिया है. वहीं, भौतिक विज्ञान के जानकारों का भी कहना है कि इस तरह की समय यात्रा व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है. मोंटाना स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विलियम हिसकॉक के अनुसार, अल्बर्ट आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत में गणितीय रूप से समय यात्रा के कुछ हल जरूर दिखते हैं, लेकिन वास्तविक भौतिक ब्रह्मांड में ऐसा होना और भूत या भविष्य में यात्रा करना पूरी तरह से असंभव और अव्यावहारिक है.

  • सोने से भी ज्यादा चमकदार नजारा! जमीन की खुदाई करते ही दिखते हैं चमकते पत्थर, जानें कहां है ये जगह​​​​

    सोने से भी ज्यादा चमकदार नजारा! जमीन की खुदाई करते ही दिखते हैं चमकते पत्थर, जानें कहां है ये जगह​​​​

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    दुनिया की हर जगह की अपनी एक अलग पहचान होती है. कहीं प्रकृति ने हरी-भरी वादियां बिछाई हैं तो कहीं बर्फीली चोटियां मन मोह लेती हैं. कुछ स्थान अपने खान-पान की विविधता से प्रसिद्ध हैं तो कुछ अपनी ऐतिहासिक इमारतों के कारण. झारखंड राज्य का कोडरमा जिला अपनी धरती की चमक से पहचाना जाता है. यहां जमीन की खुदाई करते ही आंखें चौंधिया जाती हैं क्योंकि नीचे चमकदार अभ्रक यानी माइका के पत्थर भरे पड़े हैं.

    इन चमकीले पत्थरों को दुनिया भर में भेजा जाता था और आज भी कोडरमा की पहचान इन्हीं से जुड़ी हुई है. कोडरमा को कभी भारत की अभ्रक राजधानी या अब्रख नगरी कहा जाता था. यह जिला छोटा नागपुर पठार का हिस्सा है और यहां की भूगर्भीय संरचना में अभ्रक की प्रचुर मात्रा पाई जाती है. अभ्रक एक खास तरह का खनिज है जो परतदार और चमकदार होता है. इसे आसानी से पतली चादरों में अलग किया जा सकता है. इसकी चमक इतनी तेज होती है कि धूप में या रोशनी में देखने पर आंखें चकाचौंध हो जाती हैं. स्थानीय लोग इसे अब्रख कहते हैं. इस जिले का इतिहास भी उतना ही दिलचस्प है जितना इसका खनिज भंडार.

    चमकीला है इतिहास
    ब्रिटिश काल में उन्नीसवीं सदी के मध्य में यहां वैज्ञानिक तरीके से अभ्रक खनन की शुरुआत हुई थी. 1843 के आसपास कोडरमा गवर्नमेंट एस्टेट में संगठित खनन शुरू हुआ. यूरोपीय उद्यमी एफएफ क्रिस्टियन ने यहां विस्फोटकों का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर निकालना शुरू किया. उन्होंने देखा कि अभ्रक की इंसुलेशन क्वालिटी एस्बेस्टस से भी बेहतर है. लंदन में सैंपल भेजने के बाद इसकी कीमत आसमान छूने लगी. धीरे-धीरे स्थानीय व्यापारियों ने भी इस कारोबार में कदम रखा. वैश्य बंधु छठू राम और होरील राम जैसे लोगों ने दो विश्व युद्धों के बीच विशाल खनन और निर्यात का नेटवर्क खड़ा कर दिया. बीसवीं सदी के मध्य तक भारत दुनिया के अभ्रक बाजार पर लगभग राज करता था. 1940 और 1950 के दशक में भारत विश्व की मांग का बड़ा हिस्सा पूरा करता था. कोडरमा, गिरिडीह, हजारीबाग और आसपास के इलाके मिलकर ग्रेट माइका बेल्ट बनाते थे जो करीब 160 किलोमीटर लंबा और 25 से 40 किलोमीटर चौड़ा था. कोडरमा क्षेत्र इसमें सबसे महत्वपूर्ण था.

    उच्च क्वालिटी का माल
    कोडरमा में उच्च गुणवत्ता वाला रूबी माइका मिलता था जो इलेक्ट्रॉनिक्स और विद्युत उद्योग के लिए बेहद कीमती माना जाता था. अभ्रक के उपयोग कई क्षेत्रों में होते हैं. यह बिजली का अच्छा कुचालक है इसलिए पुराने समय में रेडियो, टीवी, हीटर, माइक्रोवेव और अन्य उपकरणों में इंसुलेटर के रूप में इस्तेमाल होता था. आज भी कॉस्मेटिक्स में चमक पैदा करने, पेंट्स, प्लास्टिक और कुछ विशेष औद्योगिक अनुप्रयोगों में इसकी मांग बनी हुई है. इसकी रासायनिक स्थिरता और गर्मी सहन करने की क्षमता इसे खास बनाती है. 1970 और 1980 के दशक में कोडरमा में सैकड़ों खदानें सक्रिय थीं. दिबौर घाटी और नीरू पहाड़ी जैसे इलाके प्रमुख केंद्र थे. हजारों मजदूर इन खदानों में काम करते थे. क्लियर माइका की कीमत उस समय प्रति किलो 15 रुपये से लेकर हजारों रुपये तक पहुंच जाती थी. झुमरी तिलैया कस्बा अभ्रक व्यापार का बड़ा केंद्र बन गया था. निर्यात से अच्छी आमदनी होती थी और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत थी. लेकिन 1980 में वन संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद स्थिति बदल गई. अधिकांश खदानें घने जंगलों और बाद में घोषित वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्रों में स्थित थीं. पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनी खनन बंद कर दिया गया. आधिकारिक रूप से बड़े पैमाने का औद्योगिक खनन रुक गया. इसके बाद उत्पादन में भारी गिरावट आई. आज आधिकारिक आंकड़ों में झारखंड से अभ्रक उत्पादन लगभग ना के बराबर दर्ज होता है जबकि आंध्र प्रदेश और राजस्थान आधिकारिक उत्पादन में आगे हैं. फिर भी कोडरमा की धरती में अभ्रक की उपस्थिति बनी हुई है. कुछ क्षेत्रों में छोटे पैमाने पर संग्रहण की गतिविधियां चलती रही हैं.

     

     
  • उम्र बड़ी, चेहरा बच्चे जैसा! लोग उड़ाते थे मजाक, फिर दाढ़ी के लिए खर्च कर दिए ₹10 लाख..​​​​

    उम्र बड़ी, चेहरा बच्चे जैसा! लोग उड़ाते थे मजाक, फिर दाढ़ी के लिए खर्च कर दिए ₹10 लाख..​​​​

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    कहते हैं जो दिखताहै वो बिकता है… अगर आपका चेहरा उम्र से बहुत छोटा दिखे, तो कईबार लोग आपको सीरियस नहीं लेते हैं. एक शख्स के साथ कुछ ऐसा ही हुआ. उसे लगा कि उसकी काबिलियत नहीं, बल्कि बेबी फेस लोगों की नजर में उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गया है. फिर क्या था… उसने करीब 10 लाख रुपए खर्च कर दाढ़ी उगवा ली. अब उसका दावा है कि दाढ़ी आते ही ऑफिस में लोग उसे ज्यादा गंभीरता से लेने लगे, सम्मान बढ़ गया और आत्मविश्वास भी पहले से कहीं ज्यादा हो गया.

    दाढ़ी न आने की वजह से लोग गंभीरता से नहीं लेते थे
    मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक युवक प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल सेक्टर में काम करता है. उसने बताया कि उसका चेहरा उम्र से काफी कम दिखता था. इसी वजह से कई बार मीटिंग में उसकी राय को नजरअंदाज कर दिया जाता था. उसे लगता था कि लोग उसे फ्रेशर समझते हैं और बड़े फैसलों के लिए उस पर भरोसा नहीं करते.

    युवक का कहना है कि कई बार उसे ऐसे पदों के लिए भी मौका नहीं मिला, जिनके लिए वह पूरी तरह योग्य था. हालांकि किसी ने सीधे तौर पर यह नहीं कहा कि उसकी शक्ल इसकी वजह है, लेकिन लगातार मिलने वाले इशारे और मजाक उसके मन में असुरक्षा की भावना पैदा करने लगे.

    दाढ़ी उगाने की हर कोशिश हुई नाकाम
    बेहतर लुक पाने के लिए उसने पहले प्राकृतिक तरीके अपनाए. उसने दाढ़ी बढ़ाने वाले तेल, विटामिन और बाल उगाने वाली दवा मिनॉक्सिडिल का भी इस्तेमाल किया. लेकिन महीनों की कोशिश के बाद भी मनचाही दाढ़ी नहीं आई. जब सभी उपाय बेअसर रहे, तब उसने दाढ़ी ट्रांसप्लांट कराने का फैसला लिया. इस प्रक्रिया में सिर के पीछे के हिस्से से बाल निकालकर चेहरे के उन हिस्सों में लगाए गए, जहां दाढ़ी कम थी.

    5 घंटे चली सर्जरी, 10 दिन में ठीक हुआ चेहरा
    युवक के अनुसार पूरी सर्जरी करीब पांच घंटे तक चली. ऑपरेशन के बाद करीब 10 दिनों तक चेहरे पर छोटे-छोटे निशान और पपड़ी बनी रही. धीरे-धीरे नई दाढ़ी उगने लगी और कुछ समय बाद उसका चेहरा पूरी तरह बदल गया.

    दाढ़ी आने के बाद बदल गया लोगों का नजरिया
    युवक का दावा है कि दाढ़ी आने के बाद ऑफिस में किसी ने उसके कम उम्र के लुक का मजाक नहीं उड़ाया. सहकर्मी उसकी बातों को पहले से ज्यादा गंभीरता से सुनने लगे. कई लोगों ने उससे कहा कि अब वह पहले की तुलना में ज्यादा परिपक्व और आत्मविश्वासी दिखता है. उसके मुताबिक इस बदलाव का असर उसकी प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ दोनों पर पड़ा.

    दाढ़ी ट्रांसप्लांट पर करीब 10 हजार डॉलर खर्च करने के बावजूद युवक को इस फैसले का कोई पछतावा नहीं है. उसका कहना है कि यह रकम भले ही बड़ी थी, लेकिन इससे उसका आत्मविश्वास लौटा और खुद को लेकर जो असुरक्षा थी, वह काफी हद तक खत्म हो गई.