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  • 5 साल पहले का वो दर्द बना तबाही की वजह! पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुला मानस, दिव्या और बहन की मौत का खौफनाक सच..

    5 साल पहले का वो दर्द बना तबाही की वजह! पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुला मानस, दिव्या और बहन की मौत का खौफनाक सच..

    5 साल पहले का वो दर्द बना तबाही की वजह! पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुला मानस, दिव्या और बहन की मौत का खौफनाक सच

    उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके गोमती नगर में हुए चर्चित ट्रिपल मर्डर व सुसाइड केस में पोस्टमार्टम रिपोर्ट और पुलिस जांच से कई रोंगटे खड़े कर देने वाले खुलासे हुए हैं. इस तिहरे हत्याकांड और आत्महत्या के पीछे 5 साल पुराना एक गहरा मानसिक तनाव और मनमुटाव सामने आया है. दरअसल, एसबीआई में कार्यरत मानस बाजपेयी ने अपनी पत्नी दिव्या मिश्रा और बहन तूलिका की गोली मारकर हत्या कर दी थी. फिर खुद को गोली मार ली थी. जिसके बाद राजधानी में हड़कंप मच गया है. तीनों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई है.

    पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, तीनों की मौत सिर में गोली लगने (Gunshot Injury) से हुई है. मानस ने अपनी पत्नी दिव्या के माथे के पास गोली मारी थी, जो उसके सिर के अंदर ही फंसी मिली. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दिव्या के सिर में गोली लगने से मौत की पुष्टि हुई है. दिव्या के चेहरे और सिर पर चोट के 6 निशान भी मिले हैं. बहन तूलिका के सिर में भी गोली फंसी थी. जबकि, मानस के सिर से गोली आरपार हो गई थी. तीनों का विसरा जांच के लिए सुरक्षित रखा गया है.

    गर्भपात बना रिश्तों में दरार की वजह पुलिस की शुरुआती जांच में सामने आया है कि मानस और दिव्या के हंसते-खेलते परिवार में 5 साल पहले एक दुखद मोड़ आया था. उस वक्त घर में किलकारी गूंजने वाली थी, लेकिन अचानक दिव्या का गर्भपात हो गया. इस घटना ने दोनों को मानसिक रूप से झकझोर कर रख दिया. इसके बाद से दोनों गुमसुम रहने लगे और उनके रिश्तों में तनाव व कड़वाहट बढ़ती चली गई. यही आपसी तनाव धीरे-धीरे इस कदर बढ़ा कि मानस ने पूरे परिवार को खत्म करने का आत्मघाती कदम उठा लिया. गन पॉइंट पर लिया ऑटो चालक, चौराहे पर छोड़ भागा पुलिस की जांच में सामने आया है कि पत्नी और बहन की हत्या करने के बाद आत्महत्या करने वाला मानस बाजपेयी परिचित ऑटो चालक को लेकर आईसीआईसीआई बैंक के बाहर पहुंचा था. वारदात के बाद उसने चालक को गन पॉइंट पर लिया और घर के पास छोड़ने के लिए कहा. पुलिस की छानबीन में पता चला है कि ऑटो चालक मुकेश कुमार सरोज 15 सालों से हुसड़िया चौराहे पर ही रहकर ऑटो चला रहा है. उसे हिरासत में लेकर पूछताछ की गई.

    अक्सर मुकेश की ऑटो बुक करता था मानस पुलिस की छानबीन में पता चला है कि मानस ने मिठाई वाला चौराहे के पास स्थित बैंक के बाहर दिव्या के साथ मारपीट शुरू की तो उसने उन्हें रोकने की कोशिश की. इस पर मानस ने असलहा तान दिया. मदद के लिए बढ़े बैंककर्मियों को भी असलहा दिखाकर धमकाया और फिर दिव्या को गोली मार दी. यह देख मुकेश भागने लगा तो मानस ने उसे रोका और गन पॉइंट पर लेकर ऑटो चलाने के लिए कहा. मुकेश ने मानस को हुसड़िया चौराहे पर घर के पास उतार दिया और भाग निकला. मुकेश ने पुलिस को बताया कि मानस अक्सर उससे ऑटो बुक करवाता था.

  • झारखंड का रहस्यमयी शिव धाम! खुद मां गंगा करती हैं जलाभिषेक, 1925 में जमीन के नीचे मिला था ये मंदिर..

    झारखंड का रहस्यमयी शिव धाम! खुद मां गंगा करती हैं जलाभिषेक, 1925 में जमीन के नीचे मिला था ये मंदिर..

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     हिंदू धर्म में भगवान शिव की भक्ति का विशेष महत्व माना जाता है. झारखंड के रामगढ़ में एक ऐसा प्राचीन शिव मंदिर है, जहां शिवलिंग पर वर्षभर प्राकृतिक जलधारा गिरती रहती है. हिंदू धर्म की मान्यताओं में इस जलाभिषेक को पवित्र माना जाता है. बताया जाता है कि मंदिर के भीतर मां गंगा की प्रतिमा से जल निकलकर शिवलिंग पर गिरता है. यही अनोखी घटना इस धाम को आस्था, चमत्कार और रहस्य से जुड़ा धार्मिक स्थल बनाती है. रामगढ़ का यह शिव मंदिर अपनी अनोखी विशेषताओं के कारण लंबे समय से श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है. यहां सबसे बड़ा आकर्षण शिवलिंग पर होने वाला प्राकृतिक जलाभिषेक है. मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, यह जलधारा किसी श्रद्धालु द्वारा नहीं चढ़ाई जाती, बल्कि अपने आप लगातार शिवलिंग तक पहुंचती है.

    खुदाई में सामने आया था प्राचीन मंदिर

    बताया जाता है कि इस मंदिर का इतिहास वर्ष 1925 से जुड़ा है. उस समय इलाके में पानी की तलाश में खुदाई का काम चल रहा था. इसी दौरान जमीन के नीचे गुंबद जैसी संरचना दिखाई दी. आगे खुदाई होने पर वहां एक पूरा प्राचीन मंदिर सामने आया. मंदिर के भीतर भगवान शिव का शिवलिंग स्थापित था. इसके ठीक ऊपर मां गंगा की सफेद रंग की प्रतिमा मिली. सबसे हैरान करने वाली बात प्रतिमा से जुड़ी जलधारा को लेकर बताई जाती है, जो नाभि के हिस्से से निकलकर नीचे शिवलिंग तक पहुंचती है.

    मां गंगा की प्रतिमा से निकलता है जल

    स्थानीय मान्यता के अनुसार, मां गंगा की प्रतिमा से निकलने वाला जल दोनों हथेलियों से होकर शिवलिंग पर गिरता है. इस तरह भगवान शिव का लगातार जलाभिषेक होता रहता है. यही कारण है कि श्रद्धालु इस स्थान को बेहद पवित्र मानते हैं. इस प्राकृतिक जलधारा का वास्तविक स्रोत कहां है, इसे लेकर आज भी लोगों के मन में सवाल हैं. जल के स्रोत को समझने के लिए जांच किए जाने की बातें भी सामने आती रही हैं, लेकिन श्रद्धालुओं के लिए इसका धार्मिक महत्व सबसे बड़ा है.

    बिना चलाए पानी देते हैं हैंडपंप

    इस झारखंड मंदिर का रहस्य केवल शिवलिंग तक सीमित नहीं बताया जाता. मंदिर परिसर में लगे दो हैंडपंप भी लोगों का ध्यान खींचते हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार, इनसे बिना चलाए भी पानी निकलता रहता है. इससे जुड़े दावे खास तौर पर तब चर्चा में आते हैं, जब आसपास के जलस्रोतों में पानी कम हो जाता है. यही वजह है कि मंदिर में आने वाले लोग इसे भगवान शिव की कृपा और प्राकृतिक चमत्कार से जोड़कर देखते हैं.

    श्रद्धालुओं के लिए क्यों खास है यह धाम?

    इस मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं इसे सामान्य शिव मंदिरों से अलग पहचान देती हैं. श्रद्धालु यहां होने वाले प्राकृतिक जलाभिषेक को भगवान शिव का विशेष आशीर्वाद मानते हैं. मान्यता है कि सच्चे मन से यहां प्रार्थना करने पर मनोकामना पूरी होती है. इसी विश्वास के कारण दूर-दराज से लोग दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं.

    इस धाम की प्रमुख विशेषताएं

    • शिवलिंग पर लगातार प्राकृतिक जलाभिषेक.
    • मां गंगा की प्रतिमा से जलधारा निकलने की मान्यता.
    • वर्ष 1925 में खुदाई के दौरान मंदिर मिलने की कहानी.
    • मंदिर परिसर में लगातार पानी देने वाले हैंडपंप.
    • जलधारा के वास्तविक स्रोत को लेकर आज भी रहस्य.

    हिंदू धर्म, भगवान शिव, मां गंगा और प्राकृतिक जलाभिषेक से जुड़ी इन मान्यताओं के कारण रामगढ़ का यह प्राचीन धाम श्रद्धालुओं के लिए आस्था का विशेष केंद्र बना हुआ है. मंदिर का रहस्य लोगों की जिज्ञासा बढ़ाता है, जबकि यहां की धार्मिक मान्यताएं इसे झारखंड के चर्चित शिव धामों में अलग पहचान देती हैं.

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  • क्या आज भी धरती पर भटक रहे हैं महाभारत के अश्वत्थामा? जानें पूरा रहस्य..

    क्या आज भी धरती पर भटक रहे हैं महाभारत के अश्वत्थामा? जानें पूरा रहस्य..

    क्या अश्वत्थामा आज भी इस धरती पर मौजूद हैं या फिर उनकी अमरता की कहानी केवल एक प्राचीन लोककथा है? महाभारत के इस योद्धा को लेकर सदियों से तरह-तरह के दावे किए जाते रहे हैं. कहीं उन्हें जंगलों में देखे जाने की बात कही जाती है, तो कहीं मंदिरों में रात के समय उनके आने के किस्से सुनाए जाते हैं. कुछ कथाओं में उनके माथे के घाव और तेल मांगने का भी जिक्र मिलता है. लेकिन सवाल यह है कि इन दावों में कितनी सच्चाई है? क्या वाकई कोई व्यक्ति हजारों वर्षों से जीवित रह सकता है या फिर इसके पीछे धार्मिक आस्था, लोककथाएं और मानवीय कल्पना का मेल है? आइए जानते हैं अश्वत्थामा से जुड़े रहस्य.

    कौन थे अश्वत्थामा और क्यों मिला था उन्हें श्राप?

    महाभारत में अश्वत्थामा को गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र बताया गया है. वे कौरवों की ओर से युद्ध करने वाले प्रमुख योद्धाओं में शामिल थे. युद्ध समाप्त होने के बाद भी उनके भीतर बदले की आग शांत नहीं हुई.

    कथाओं के अनुसार, रात के समय अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में प्रवेश किया था और वहां सो रहे द्रौपदी के पांच पुत्रों का वध कर दिया था. इसके बाद उन्होंने पांडव वंश को समाप्त करने के उद्देश्य से ब्रह्मास्त्र का प्रयोग भी किया था. यही घटना उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ मानी जाती है. धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने अश्वत्थामा को उनके कर्मों के लिए श्राप दिया. उनकी मस्तक पर स्थित दिव्य मणि भी उनसे ले ली गई और उन्हें लंबे समय तक धरती पर भटकते रहने का श्राप मिला था.

    मान्यता है कि इस श्राप के कारण अश्वत्थामा को न मृत्यु मिलेगी और न ही सामान्य जीवन की तरह उन्हें मुक्ति प्राप्त होगी. उनके माथे का घाव कभी नहीं भरेगा और वे अपने कर्मों का परिणाम भुगतते रहेंगे. यहीं से शुरू होती है अश्वत्थामा के अमर होने की वह कहानी, जिसने हजारों वर्षों से लोगों की कल्पना और आस्था को अपने साथ जोड़े रखा है.

    असीरगढ़ का किला और अश्वत्थामा से जुड़ा रहस्य

    मध्य प्रदेश के बुरहानपुर के पास स्थित असीरगढ़ किले का नाम अश्वत्थामा से जुड़ी कहानियों में अक्सर सामने आता है. स्थानीय लोककथाओं में दावा किया जाता है कि अश्वत्थामा आज भी इस क्षेत्र में आते हैं. किले के आसपास मौजूद प्राचीन धार्मिक स्थलों को लेकर भी कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं. कहा जाता है कि अश्वत्थामा रात के समय भगवान शिव की पूजा करने के लिए किसी मंदिर में पहुंचते हैं.

    कुछ स्थानीय लोगों और पुजारियों द्वारा यह दावा किया गया है कि सुबह मंदिर के कपाट खुलने पर शिवलिंग पर ताजे फूल या चंदन चढ़ा हुआ मिलता है. इसके बाद यह सवाल उठता रहा है कि आखिर रात में पूजा कौन करता है? इन दावों को अश्वत्थामा की कथा से जोड़ दिया जाता है. हालांकि, ऐसी घटनाओं का कोई ऐसा वैज्ञानिक प्रमाण सामने नहीं आया है, जिससे यह निश्चित रूप से साबित हो सके कि मंदिर में पूजा करने वाला व्यक्ति अश्वत्थामा ही है. फिर भी असीरगढ़ का नाम इस रहस्य से इतनी मजबूती से जुड़ चुका है कि आज भी लोग इस कहानी को बड़े उत्सुकता से सुनते और सुनाते हैं.

    माथे के घाव से लेकर तेल मांगने तक, क्या हैं ये दावे?

    अश्वत्थामा को लेकर सबसे चर्चित लोककथाओं में उनके माथे के घाव का जिक्र मिलता है. मान्यता है कि भगवान कृष्ण के श्राप के बाद उनके माथे का घाव कभी ठीक नहीं हुआ. इसी कहानी से जुड़ा एक और दावा है कि अश्वत्थामा अलग-अलग जगहों पर साधुओं या ग्रामीणों के सामने प्रकट होते हैं और उनसे तेल मांगते हैं. कहा जाता है कि माथे के घाव में होने वाली जलन को कम करने के लिए उन्हें तेल की आवश्यकता होती है.

    नर्मदा नदी के आसपास के इलाकों में भी इस तरह की लोककथाएं सुनने को मिलती हैं. कुछ साधु और स्थानीय लोग दावा करते रहे हैं कि उन्होंने एक बेहद लंबे और रहस्यमय व्यक्ति को देखा, जो कभी-कभी तेल मांगता था और फिर अचानक वहां से गायब हो जाता था. इन कथाओं में व्यक्ति का हुलिया भी कई बार एक जैसा बताया गया है जैसे लंबा कद, शरीर पर असामान्य निशान और माथे पर गहरा घाव.

    लेकिन इन घटनाओं को प्रमाणित करने वाला कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक या ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है. इसलिए इन्हें अश्वत्थामा के अस्तित्व का प्रमाण मानने के बजाय लोकविश्वास और कथाओं के रूप में देखना अधिक उचित है.

    पृथ्वीराज चौहान से मुलाकात की कहानी कितनी सच?

    अश्वत्थामा को लेकर एक और बेहद दिलचस्प कहानी पृथ्वीराज चौहान से जुड़ी है. लोककथाओं में कहा जाता है कि शिकार के दौरान पृथ्वीराज चौहान की मुलाकात एक रहस्यमय व्यक्ति से हुई थी. उस व्यक्ति के माथे पर गहरा घाव था और वह सामान्य मनुष्य से अलग दिखाई देता था. कथा के अनुसार, पृथ्वीराज चौहान ने उस घाव को ठीक करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली.

    कई दिनों तक उपचार के बाद भी जब घाव ठीक नहीं हुआ, तब उस रहस्यमय व्यक्ति की पहचान को लेकर संदेह पैदा हुआ. आगे की कथा में दावा किया जाता है कि उसने स्वयं को अश्वत्थामा बताया. हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि इस कहानी का आधार मजबूत समकालीन ऐतिहासिक प्रमाण नहीं माना जाता. पृथ्वीराज रासो में कई घटनाओं का वर्णन मिलता है, लेकिन इसकी रचना और ऐतिहासिक विश्वसनीयता को लेकर इतिहासकारों के बीच लंबे समय से बहस रही है.

    इसलिए पृथ्वीराज चौहान और अश्वत्थामा की कथित मुलाकात को इतिहास की प्रमाणित घटना कहना सही नहीं होगा. इसे अश्वत्थामा से जुड़ी प्रचलित लोककथाओं के हिस्से के रूप में देखा जाता है.

    गुजरात के जंगलों से नर्मदा तक, कहां-कहां दिखने का दावा?

    अश्वत्थामा को लेकर सिर्फ मध्य प्रदेश या नर्मदा क्षेत्र में ही कहानियां नहीं मिलतीं. देश के अलग-अलग हिस्सों में समय-समय पर लोगों ने एक रहस्यमय और असामान्य रूप से लंबे व्यक्ति को देखने का दावा किया है. गुजरात के डांग क्षेत्र से भी ऐसी ही एक पुरानी कहानी सामने आती है. कहा जाता है कि जंगल के पास काम कर रहे एक व्यक्ति ने रात के समय एक विशालकाय आकृति को रेलवे ट्रैक के पास देखा था.

    उसने जब रोशनी डालकर देखने की कोशिश की, तो उसे एक थका हुआ और विचित्र चेहरा नजर आया. कुछ ही क्षणों में वह आकृति जंगल की तरफ चली गई और फिर दिखाई नहीं दी. बाद में इस घटना को भी अश्वत्थामा से जोड़कर देखा जाने लगा. हालांकि, ऐसी घटनाओं में प्रत्यक्षदर्शी की धारणा, अंधेरा, दूरी और डर जैसी परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. यही वजह है कि किसी व्यक्ति को कुछ सेकंड के लिए देखने भर से उसकी पहचान हजारों साल पुराने किसी पात्र के रूप में तय नहीं की जा सकती.

    क्या कलयुग के अंत तक धरती पर रहेंगे अश्वत्थामा?

    अश्वत्थामा की कहानी का सबसे रहस्यमय हिस्सा उनका भविष्य है. हिंदू धार्मिक परंपराओं में उन्हें चिरंजीवी माना जाता है. चिरंजीवियों को लेकर मान्यता है कि वे लंबे समय तक धरती पर मौजूद रहेंगे. कुछ धार्मिक कथाओं में यह भी कहा जाता है कि भविष्य में जब भगवान कल्कि का अवतार होगा, तब अश्वत्थामा की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी. उन्हें भविष्य के एक बड़े धार्मिक परिवर्तन से जोड़कर देखा जाता है.

    यही विश्वास उनकी कहानी को सिर्फ अतीत तक सीमित नहीं रहने देता. उनके बारे में कहा जाता है कि उनका प्रायश्चित अभी पूरा नहीं हुआ है और वे अपने श्राप के कारण कलियुग के अंत तक भटकते रहेंगे. लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि आज सचमुच अश्वत्थामा हमारे बीच जीवित हैं?

    अश्वत्थामा की कहानी को अगर केवल डर की नजर से देखें तो यह एक श्रापित योद्धा की कहानी लगती है. लेकिन अगर इसे कर्म और उसके परिणाम के रूप में समझें, तो इसका संदेश और भी गहरा हो जाता है. हो सकता है अश्वत्थामा का अस्तित्व केवल धार्मिक मान्यता में हो, या फिर सदियों पुरानी इन कथाओं के पीछे कोई ऐसी कहानी हो, जिसे हम आज तक पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं.

    लेकिन एक बात तय है कि अश्वत्थामा की कथा केवल उनके जीवित होने के सवाल तक सीमित नहीं है. यह हमें कर्म, क्रोध, प्रतिशोध और प्रायश्चित की ऐसी कहानी सुनाती है, जिसका असर महाभारत के युग से लेकर आज तक दिखाई देता है. शायद इसी वजह से अश्वत्थामा आज भी सिर्फ एक पात्र नहीं, बल्कि भारतीय लोकस्मृति का एक ऐसा रहस्य हैं, जिसका जवाब लोग सदियों से तलाश रहे हैं.

  • झोलाछाप डॉक्टर की करतूत, पुलिस पहुंची तो क्लिनिक मिला बंद,डॉक्टर फरार..

    झोलाछाप डॉक्टर की करतूत, पुलिस पहुंची तो क्लिनिक मिला बंद,डॉक्टर फरार..

    नवादा जिले के हिसुआ थाना क्षेत्र में शराब की लत छुड़ाने के नाम पर चल रहे कथित इलाज के दौरान एक 17 वर्षीय युवक की मौत का मामला सामने आया है। परिजनों ने एक झोलाछाप डॉक्टर पर इलाज में लापरवाही और पैसे ऐंठने का गंभीर आरोप लगाया है। घटना के बाद आरोपी डॉक्टर अपनी क्लिनिक बंद कर फरार हो गया। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और पूरे मामले की तफ्तीश शुरू कर दी है।मृतक की पहचान 17 वर्षीय प्रिंस कुमार के रूप में हुई है। वह दिनेश पांडेय के पुत्र थे। परिवार मूल रूप से बिहारशरीफ के लिचरगंज का रहने वाला बताया गया है और फिलहाल राजगीर की तुलसी गली में रह रहा है।

    मृतक के पिता दिनेश पांडेय के अनुसार, प्रिंस पिछले कुछ समय से नशे की लत से परेशान था। परिवार उसे इस आदत से बाहर निकालना चाहता था। इसी दौरान एक कथित दलाल के माध्यम से परिजनों को हिसुआ स्थित नौशाद आलम की क्लिनिक के बारे में जानकारी मिली। परिवार का दावा है कि वहां नशा मुक्ति का इलाज किए जाने की बात कही गई थी।परिजनों के मुताबिक, इलाज के नाम पर डॉक्टर ने 50 हजार रुपये की मांग की थी। परिवार ने कथित तौर पर 40 हजार रुपये अग्रिम के रूप में दे दिए और प्रिंस को क्लिनिक में भर्ती करा दिया गया।

    परिवार का आरोप है कि क्लिनिक में इलाज के दौरान पिछले करीब तीन दिनों से प्रिंस को सांस लेने में परेशानी हो रही थी। इसके बावजूद डॉक्टर की ओर से लगातार उसके ठीक होने का भरोसा दिया जाता रहा।रात में अचानक उसकी हालत ज्यादा बिगड़ गई। स्थिति गंभीर होने पर डॉक्टर ने कथित तौर पर ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं होने की बात कहते हुए परिजनों को उसे किसी दूसरे अस्पताल ले जाने की सलाह दी।परिजन प्रिंस को लेकर अस्पताल पहुंचे, लेकिन वहां डॉक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया। इसके बाद परिवार में कोहराम मच गया।

    घटना की सूचना मिलने के बाद हिसुआ थाना पुलिस भी सक्रिय हुई। थाना अध्यक्ष के निर्देश पर पुलिस बल कथित क्लिनिक पर पहुंचा, लेकिन तब तक आरोपी डॉक्टर क्लिनिक बंद कर मौके से फरार हो चुका था।पुलिस ने मृतक के शव को कब्जे में लेकर पंचनामा तैयार किया और पोस्टमार्टम के लिए नवादा सदर अस्पताल भेज दिया है। पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मौत की वास्तविक वजह सामने आने में मदद मिलेगी।

    परिजनों ने डॉक्टर पर इलाज में लापरवाही बरतने के साथ-साथ पैसे ऐंठने का भी आरोप लगाया है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।पुलिस फिलहाल फरार डॉक्टर और संबंधित क्लिनिक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया में जुटी है। जांच के दौरान यह भी पता लगाया जाएगा कि आरोपी डॉक्टर के पास इलाज करने की वैध योग्यता और जरूरी अनुमति थी या नहीं।17 वर्षीय युवक की मौत ने नशा मुक्ति के नाम पर चल रहे कथित निजी इलाज केंद्रों की निगरानी और व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। अब पुलिस की जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्पष्ट होगा कि प्रिंस की मौत की वास्तविक वजह क्या थी और इस मामले में किसकी जिम्मेदारी तय होती है।

  • दिल्ली से जयपुर के लिए बुक की कैब, तंगी से जूझ रहे सवारियों ने ड्राइवर की हत्या कर कार लूट ली..

    दिल्ली से जयपुर के लिए बुक की कैब, तंगी से जूझ रहे सवारियों ने ड्राइवर की हत्या कर कार लूट ली..

    एक टैक्सी चालक को जयपुर ले जाने के नाम पर बुकिंग देना कितना खतरनाक साबित हो सकता है, इसका भयावह उदाहरण दिल्ली और राजस्थान से सामने आया है. 22 वर्षीय टैक्सी चालक आशीष पाल को कुछ युवकों ने ऑफलाइन बुकिंग के बहाने अपने जाल में फंसाया और फिर कथित तौर पर उसकी हत्या कर दी. आरोप है कि रास्ते में किराए को लेकर विवाद हुआ, जिसके बाद चालक की पिटाई की गई और गला दबाकर उसकी हत्या कर दी गई. इसके बाद शव को कार में छिपाकर राजस्थान ले जाया गया और एक जंगल क्षेत्र में फेंक दिया गया. पुलिस जांच में सामने आया कि आरोपी वाहन लूटने की योजना बनाकर निकले थे और आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे.

    ऑफलाइन बुकिंग बन गई मौत का सफर

    दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी जसबीर सिंह के अनुसार मृतक की पहचान उत्तर प्रदेश के औरैया निवासी 22 वर्षीय आशीष पाल के रूप में हुई है. आशीष एक टैक्सी चालक था और 20 जुलाई को उसने दिल्ली के सरिता विहार से जयपुर के लिए एक ऑफलाइन बुकिंग स्वीकार की थी. शुरुआत में मामला राजस्थान के जयपुर ग्रामीण जिले के मोखमपुरा थाने में जीरो एफआईआर के रूप में दर्ज किया गया. बाद में जांच के लिए केस दिल्ली के सरिता विहार थाने को स्थानांतरित किया गया, जहां नियमित एफआईआर दर्ज की गई.

    रास्ते में हुआ विवाद, फिर कर दी हत्या

    जांच में सामने आया कि यात्रा के दौरान किराए को लेकर चालक और यात्रियों के बीच कहासुनी हो गई. आरोप है कि विवाद बढ़ने पर आरोपियों ने आशीष के साथ मारपीट की. पुलिस के मुताबिक इसके बाद चालक का गला दबाकर उसकी हत्या कर दी गई. हत्या के बाद शव को वाहन के भीतर छिपाकर रखा गया ताकि किसी को शक न हो.

    राजस्थान के जंगल में फेंका शव

    हत्या के बाद आरोपी वाहन लेकर राजस्थान पहुंचे. वहां मोखमपुरा क्षेत्र के एक वन इलाके में शव को फेंक दिया गया. इसके बाद आरोपी टैक्सी लेकर अलग-अलग स्थानों पर घूमते रहे और पुलिस से बचने की कोशिश करते रहे. जांच के दौरान पुलिस ने मृतक का शव भी बरामद कर लिया, जिसकी पहचान परिजनों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर की गई.

    सीसीटीवी और तकनीकी जांच से खुला राज

    मामले की जांच के लिए विशेष टीम बनाई गई. पुलिस ने टैक्सी बुकिंग स्थल, हाईवे, टोल प्लाजा और अन्य स्थानों के सीसीटीवी फुटेज खंगाले. तकनीकी निगरानी के जरिए वाहन की मूवमेंट को ट्रैक किया गया. दिल्ली पुलिस ने राजस्थान पुलिस के साथ भी समन्वय स्थापित किया और कई महत्वपूर्ण सबूत जुटाए.

    नाबालिग समेत छह आरोपी गिरफ्तार

    जांच के बाद पुलिस ने 16 वर्षीय एक नाबालिग को हिरासत में लिया. इसके अलावा अनिल जाट, कालूराम, सुमित, मंगल दीप उर्फ सानू और अर्जुन रिनवा को गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने चोरी की गई टैक्सी राजस्थान से बरामद कर ली. वाहन अनिल जाट और कालूराम के कब्जे से मिला.

    पहले से थी लूट की साजिश

    पूछताछ में पता चला कि आरोपी कथित तौर पर पैसों की कमी से जूझ रहे थे और किसी वाहन को लूटने की योजना बना रहे थे. इसी मकसद से उन्होंने टैक्सी बुक कर चालक को निशाना बनाया. हत्या के बाद आरोपियों ने आशीष का मोबाइल फोन और नकदी भी इस्तेमाल की. पुलिस के अनुसार उन्होंने एटीएम कार्ड के जरिए पैसे निकालने की भी कोशिश की.

    पहचान छिपाने का प्रयास

    जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों ने वाहन की नंबर प्लेट हटाने की कोशिश की और कुछ समय अजमेर में भी रुके. बाद में नागौर पहुंचने पर उन्होंने अपने एक परिचित को घटना की जानकारी दी और क्षेत्र छोड़ने की योजना बनाई. पुलिस ने बताया कि एक आरोपी को जयपुर रेलवे स्टेशन से पकड़ा गया. अब सभी आरोपियों की भूमिकाओं की पुष्टि सीसीटीवी फुटेज, तकनीकी साक्ष्य, गवाहों के बयान और अन्य सबूतों के आधार पर की जा रही है.

  • गाड़ी में अब सो नहीं पाएंगे ड्राइवर, हिलने लगेगी कार की सीट, IIT मद्रास ने बनाई खास ‘इंटेलिसीट’, ऐसे बचाएगी जान..?

    गाड़ी में अब सो नहीं पाएंगे ड्राइवर, हिलने लगेगी कार की सीट, IIT मद्रास ने बनाई खास ‘इंटेलिसीट’, ऐसे बचाएगी जान..?

    गाड़ी में अब सो नहीं पाएंगे ड्राइवर, हिलने लगेगी कार की सीट, IIT मद्रास ने बनाई खास 'इंटेलिसीट', ऐसे बचाएगी जान!

    हाईवे पर देर रात एक छोटी सी झपकी के कारण बहुत लोगों की जान चली जाती है. इस तरह के हादसों को रोकने के लिए IIT मद्रास ने कमाल की इंटेलिसीट विकसित की है.

    भारत की सड़कें दुनिया की सबसे खतरनाक सड़कों में से एक हैं और ज्यादातर हादसों की वजह गाड़ियों की खराबी नहीं, बल्कि इंसानी गलतियां होती हैं. रात के सन्नाटे में अक्सर नींद के कारण आंखें भारी होने लगती हैं और फिर कुछ ही सेकंड की लापरवाही के कारण बड़ा हादसा हो जाता है. भारत के हाईवे पर होने वाले जानलेवा हादसों में एक बड़ी वजह ड्राइवर्स की नींद होती है. इसी समस्या को दूर करने के लिए एक इनोवेटिव और स्वदेशी समान खोज निकाला है IIT मद्रास के वैज्ञानिकों ने.

    IIT मद्रास के रिहैबिलिटेशन बायोइंजीनियरिंग ग्रुप ने एक ऐसी स्मार्ट सीट तैयार कर ली है, जो ड्राइवर के सोने से ठीक पहले ही उसकी थकान को भांप लेती है और जोरदार अलर्ट देकर एक्सीडेंट होने से बचा लेती है. सबसे कमाल की बात है कि यह बिना कैमरे और तार के काम करती है. तो आइए जानते हैं आखिर क्या है यह इंटेलिसीट टेक्नोलॉजी और यह किस तरह बिना किसी कैमरे या तार के काम करती है.

    आईआईटी मद्रास के रिहैबिलिटेशन बायोइंजीनियरिंग ग्रुप ने सीटिंग कंपनी हरिता के साथ मिलकर इस सीट को तैयार किया है, इसका नाम इंटेलिसीट दिया गया है. यह स्मार्ट सीट ड्राइवर के सोने से ठीक पहले ही उसकी थकान को पहचान लेती है और किसी हादसे होने से पहले ही अलर्ट कर देती है. देखने में यह एक नार्मल कार सीट की तरह दिखाई देती है, लेकिन इसके अंदर एडवांस सेंसर लगाए गए हैं.

    बिना कैमरा और तार के करेगी काम

    मार्केट में मौजूद दूसरी इस तरह की सीटे ड्राइवर पर नजर रखने के लिए कैमरे, सिर पर पट्टी या शरीर पर इलेक्ट्रोड यानी तार का इस्तेमाल करती हैं. वहीं इंटेलिसीट पूरी तरह से नॉन-इंट्रूसिव है. यानी ड्राइवर को शरीर पर कुछ भी पहनने की जरूरत नहीं है.

    तो कैसे करती है पहचान

    अब आपके मन में यह सवाल आ रहा होगा कि जब कैमरा, सिर पर पट्टी और तार भी नहीं है, तो सीट कैसे ड्राइवर के सोने का पहचान कैसे करती है. इसका जवाब है कि सीट के बैकरेस्ट और बेस में लगे सेंसर, जो ड्राइवर के बैठने के तरीके, उसकी स्थिति और थकान के कारण शरीर में होने वाली हल्की हलचलों को महसूस करते हैं.

    सर्फेस इलेक्ट्रोमायोग्राफी मांसपेशियों की थकान मापने के लिए यह सीट शरीर से निकलने वाले हल्के इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स को समझने का प्रयास करती है. इससे पता चलता है कि पीठ और कंधों की मांसपेशियां कब थकान महसूस कर रही है.

    खतरे के हिसाब से 3 लेवल पर अलर्ट

    यह सीट ड्राइवर की थकान को तीन चरणों में भांपकर एक्शन में आती है-

    हल्की थकान डैशबोर्ड पर एक छोटी सी लाइट जलती है, जो सिर्फ ड्राइवर को सावधान करती है.

    थकान लाइट के साथ-साथ एक बीप यानी अलर्ट मिलता है.

    ज्यादा थकाम जब स्थिति ज्यादा खतरनाक होती है, तो सीट खुद कांपने लगती है. इसके साथ ही गाड़ी के मालिक को मोबाइल ऐप पर तुरंत नोटिफिकेशन पहुंच जाता है.

    पुरानी गाड़ियों में भी आसानी से होगी फिट

    इस सीट की यह खास बात है कि इसे पुरानी गाड़ियों में भी आसानी से फिट किया जा सकता है. इंटेलिसीट को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसे किसी भी मौजूदा ट्रक, बस या कार में आसानी से फिट किया जा सकता है. इसके लिए गाड़ी में ज्यादा टेक्निकल बदलाव करने की भी जरूरत नहीं पड़ती है. फिट करने के बाद चाबी ऑन करते ही यह काम करना शुरू कर देती है और मोबाइल ऐप के जरिए रियर-टाइम डेटा भेजती रहती है.

    भारत में सड़क हादसों और थके हुए ड्राइवरों की वजह से जाने वाली जानों को बचाने में यह स्वदेशी इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) टेक्नोलॉजी एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकती है.

  • गरुड़ पुराण:  मृत्यु के कितने दिनों बाद आत्मा यमलोक पहुंचती है, रास्ते में क्या-क्या पड़ता है..?

    गरुड़ पुराण: मृत्यु के कितने दिनों बाद आत्मा यमलोक पहुंचती है, रास्ते में क्या-क्या पड़ता है..?

    मृत्यु को अटल सत्य कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जो आया है उसे जाना भी होगा। गरुड़ पुराण में लाइफ के हर रहस्य के बारे में लिखा है। व्यक्ति के मरने के बाद आत्मा 13 दिन तक घर में रहती है, फिर 47 दिन बात यमलोक जाती है। यमलोक जाने पर क्या-क्या मिलता है। इस 47 जिन की यात्रा के लिए आत्मा को किन चीजों से जूझना पड़ता है, इसके बारे में यमलोक में बताया गया है। वहां जाने के बाद होता है आपके कर्मों का हिसाब। आपने क्या अच्छा किया और क्या गलत किया इन सभी का हिसाब होता है। आइए जानें यमलोक कैसे जाते हैं रास्ते में कौन सी नदी पड़ती है और आत्मा कैसे यमलोक पहुंचती है।

    मृत्यु से पहले दिखते हैं यमराज

    जिसकी मृत्यु होने वाली होती है, उसे यमराज दिखते हैं। यमराज अंगूठे के बराबर आत्मा को अपने साथ ले जाते हैं, लेकिन फिर आत्मा वापस शरीर में जाने के लिए कहती है, यमराज उसे बांधे रखते हैं। इसके बाद 13 दिन तक आत्मा घर में रहती है और फिर 1 3 दिन बाद यमलोक के लिए जाती है। इसलिए 13वें दिन आत्मा के साथ चप्पल, छतरी, टॉर्च, बिस्तर आदि रख कर देते हैं।

    पिंड-दान अगर ना किया जाए

    अगर किसी व्यक्ति का पिंडदान या अंतिम संस्कार ना किया जाए तो आत्मा भटकने लगती है। अगर दाह संस्कार हो जाता है और विधि विधान से सभी कार्य होते हैं तो आत्मा यमलोक की यात्रा पर निकलती है। यमलोक 99 योजन दूर है। रास्त में कई दिक्कतें झेलनी पड़ती है, वहां बहुत गर्म होता है, रास्ते में खाना और पानी भी नहीं मिलता। यमराज के सामने प्रस्तुत करते हैं। यमराज उस आत्मा को उसके द्वारा किए गए पापों के अनुसार सजा देते हैं>

    10 दिन तक पिंडदान

    गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद 13 दिन तक आत्मा घर में ही रहती है, लेकिन जब लगातार पिंडदान होते हैं तो पिंडदान से आत्मा का शरीर बनने लगता है। 13 दिन बात आत्मा घर से चली जाती है।

    वैतरणी नदी यमलोक के जाने वाले रास्ते में मिलती है। इसे पारकरके ही यमलोक पहुंचा जा सकता है। यह रास्त उनके लिए कठिन हो जाता है, जिन्होंने पाप किए हैं, उनके लिए कई परेशानियां आती हैं। कहा जाता है कि यमलोक तक पहुंचने के लिए 16 पुरियों को पार करना होता है।

  • दौड़ते समय कितना पानी पीना चाहिए? एक्सपर्ट से जानें ‘85% हाइपर स्वेटिंग रूल’ और हाइड्रेशन का सही तरीका..

    दौड़ते समय कितना पानी पीना चाहिए? एक्सपर्ट से जानें ‘85% हाइपर स्वेटिंग रूल’ और हाइड्रेशन का सही तरीका..

    दौड़ते समय कितना पानी पीना चाहिए? एक्सपर्ट से जानें ‘85% हाइपर स्वेटिंग रूल’ और हाइड्रेशन का सही तरीका

    क्या आप भी सुबह उठकर लंबी दौड़ लगाने निकलते हैं। दौड़ते-दौड़ते कई बार आपको प्यास भी लगती होगी और आप गले को तर करने के लिए पानी भी पीते होंगे। उस समय शरीर से पसीना भी निकलता होगा। खासकर गर्म और उमस भरे मौसम में रनर्स के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि दौड़ के दौरान कितना पानी पीना चाहिए और कब इलेक्ट्रोलाइट्स की जरूरत पड़ती है। इसी को लेकर हाई-परफॉर्मेंस कोच और फिटनेस एक्सपर्ट शिवेंद्र प्रताप सिंह कंवर ने अपने एक वीडियो में हाइड्रेशन रूटीन साझा किया है। इसमें उन्होंने ‘85% हाइपर स्वेटिंग रूल’ की जानकारी दी है।

    कंवर के मुताबिक, लंबी दौड़ के दौरान वह हर 5 किलोमीटर पर करीब 250 से 300 मिलीलीटर पानी पीते हैं। इसके साथ वह कार्बोहाइड्रेट और इलेक्ट्रोलाइट्स वाले रनिंग जेल भी लेते हैं।

    लेकिन क्या हर रनर को इसी फॉर्मूले को फॉलो करना चाहिए? इस बारे में जब इंडियन एक्सप्रेस की टीम ने Wockhardt Hospitals के सीनियर कंसल्टेंट और स्पोर्ट्स मेडिसिन स्पेशलिस्ट डॉ. गजनफर पटेल से बात की तो उन्होंने बताया कि हाइड्रेशन की जरूरत हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है।

    क्या ज्यादा पानी पीने से पसीना कम आता है?

    डॉ. पटेल के अनुसार, पसीना आना शरीर का नेचुरली कूलिंग सिस्टम है। जब शरीर का तापमान बढ़ता है तो पसीना शरीर को ठंडा करने में मदद करता है। इसलिए पानी पीने का मतलब यह नहीं है कि आपको कम पसीना आएगा।

    दरअसल, किसी व्यक्ति को कितना पसीना आएगा, यह कई बातों पर निर्भर करता है। जैसे दौड़ने की स्पीड, शरीर का आकार, फिटनेस लेवल, तापमान और हवा में नमी। यही वजह है कि एक ही दूरी दौड़ने वाले दो लोगों के शरीर से निकलने वाले पसीने की मात्रा अलग-अलग हो सकती है।

    हर 5 किलोमीटर पर 200 से 300 मिलीलीटर पानी पीना कुछ लोगों के लिए ठीक हो सकता है, लेकिन इसे हर किसी के लिए एक तय नियम नहीं मानना चाहिए। लंबी दौड़ के दौरान प्यास और अपने शरीर की जरूरत को समझकर पानी पीना ज्यादा बेहतर तरीका हो सकता है।

    दौड़ते समय कब चाहिए इलेक्ट्रोलाइट्स?

    अगर आप करीब एक घंटे तक दौड़ रहे हैं, मौसम बहुत गर्म नहीं है और आपने सामान्य तरीके से खाना खाया है, तो ज्यादातर लोगों के लिए सिर्फ पानी ही काफी हो सकता है।

    लेकिन अगर रन 60 से 90 मिनट से ज्यादा लंबी हो, बहुत ज्यादा पसीना आ रहा हो या बाहर तेज गर्मी हो, तो इलेक्ट्रोलाइट्स की जरूरत बढ़ सकती है। पसीने के साथ शरीर से सोडियम भी निकलता है, इसलिए लंबे समय तक दौड़ने वालों के लिए सोडियम की पूर्ति जरूरी हो सकती है।

    डॉ. पटेल के अनुसार, लंबे रन के दौरान लगभग 300 से 600 मिलीग्राम सोडियम प्रति घंटे एक सामान्य रेंज हो सकती है। हालांकि, जिन्हें बहुत ज्यादा पसीना आता है या जिनके पसीने में नमक की मात्रा अधिक होती है, उनकी जरूरत अलग हो सकती है।

    गर्मी और उमस में रखें इन बातों का ध्यान

    गर्म और उमस भरे मौसम में दौड़ने से पहले शरीर का हाइड्रेटेड होना जरूरी है। दौड़ के दौरान एक साथ बहुत ज्यादा पानी पीने के बजाय जरूरत और प्यास के अनुसार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पानी लेते रहना बेहतर हो सकता है।

    लंबी दौड़ में पानी के साथ सोडियम और कार्बोहाइड्रेट वाले ड्रिंक्स या रनिंग जेल भी कुछ लोगों के लिए मददगार हो सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दौड़ते समय शरीर से निकले पसीने की हर बूंद की भरपाई तुरंत करनी है।

    डिहाइड्रेशन के इन संकेतों को न करें नजरअंदाज

    दौड़ते समय शरीर में पानी की कमी होने पर कुछ संकेत दिखाई दे सकते हैं, जैसे—

    बहुत ज्यादा प्यास लगनामुंह सूखनाचक्कर आनासिरदर्द होनाअसामान्य रूप से थकान महसूस होनादौड़ने की क्षमता या परफॉर्मेंस में अचानक कमी आना

    खासकर गर्म मौसम में इन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    जरूरत से ज्यादा पानी पीना भी हो सकता है नुकसानदायक

    सिर्फ पानी की कमी ही नहीं, जरूरत से ज्यादा पानी पीना भी समस्या पैदा कर सकता है। अगर दौड़ते समय मितली, पेट फूला हुआ महसूस हो, सिरदर्द, भ्रम या शरीर में सूजन जैसे लक्षण नजर आएं, तो इसे भी हल्के में नहीं लेना चाहिए।

    कुल मिलाकर, दौड़ते समय हाइड्रेशन का कोई एक नियम हर व्यक्ति पर लागू नहीं होता। दौड़ की दूरी, उसकी अवधि, मौसम, पसीने की मात्रा और आपकी फिटनेस—सभी बातें मायने रखती हैं। छोटी दौड़ के लिए पानी पर्याप्त हो सकता है, जबकि लंबी और ज्यादा मेहनत वाली दौड़ में पानी के साथ इलेक्ट्रोलाइट्स और कार्बोहाइड्रेट की जरूरत पड़ सकती है।

    Disclaimer: यह लेख पब्लिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी और विशेषज्ञ से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी नई एक्सरसाइज या फिटनेस रूटीन को अपनाने से पहले अपने हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह जरूर लें।

  • क्यों अशुभ है पूजा के दौरान दीपक का बुझना? क्या बुझी हुई बाती को फिर से जलाएं या नहीं..?

    क्यों अशुभ है पूजा के दौरान दीपक का बुझना? क्या बुझी हुई बाती को फिर से जलाएं या नहीं..?

    Puja Path Niyam: हिंदू धर्म में पूजा के दौरान दीप प्रज्वलन किया जाता है. दीपक जलाने को हिंदू संस्कृति में शुभता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक मानते हैं. किसी भी देवी-देवता की पूजा से पहले दीपक अवश्य जलाते हैं. ऐसा माना जाता है कि, पूजा के दौरान दीपक जलाने से एकाग्रता बढ़ती है. कई बार पूजा के दौरान दीपक बुझ जाता है. दीपक का बुझना अशुभ माना जाता है. दीपक के बुझने को अपशकुन क्यों मानते हैं और इससे क्या संकेत मिलते हैं. आइये जानते हैं.

    क्यों अशुभ है दीपक का बुझना?

    हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपक का बुझना अशुभ मानते हैं. अगर पूजा के दौरान अचानक दीपक बुझ जाता है, तो यह भगवान के नाराज होने का संकेत माना जाता है. यह जीवन में बाधाओं के आने और पूजा में एकाग्रता की कमी होने की ओर इशारा करता है. हालांकि, सामान्य तौर पर दीपक का बुझना लापरवाही और महज संयोग माना जाता है. इसको लेकर परंपरा से जुड़े विश्वास और सामान्य मत अलग-अलग हैं.

    दीपक बुझने से मिलते हैं कई संकेत

    काम में बाधा – अगर पूजा के दौरान दीपक बुझ जाता है, तो यह अशुभ होता है. इसका अर्थ है कि, आपको भविष्य में काम में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है.

    ध्यान का भटकना – दीपक का बुझना पूजा के दौरान एकाग्रता की कमी और ध्यान के भटकने का संकेत होता है. आपको पूजा के दौरान एकाग्र रहना चाहिए.

    नकारात्मक ऊर्जा – अगर आसपास नकारात्मक ऊर्जा होती है या वास्तु दोष होता है, इसके कारण भी दीपक बुझ सकता है. कई बार दीपक बुझना देवताओं के नाराज होने का संकेत होता है.

    पितरों की नाराजगी – कई लोग दीपक के बुझने को पितरों की नाराजगी से जोड़कर देखते हैं. अगर पूजा के दौरान दीपक बुझ जाता है, तो भगवान और इष्ट देव से क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए.

    क्या फिर से जलाएं बुझी हुई बाती?

    पूजा के दौरान दीपक के बुझ जाने पर इसे फिर से जला सकते हैं. हालांकि, जली हुई बाती को दोबारा जलाने से परहेज करना चाहिए. आप दीपक को फिर से जलाने से पहले दीपक के तेल या घी की मात्रा को देख लें. अगर बाती छोटी या मोटी हो तो इसे फिर से सही से बनाएं. इसके बाद इष्ट देव से माफी मांगने के बाद दीपक जला सकते हैं. दीपक जलाने के दौरान दीप प्रज्वलन मंत्र का जाप करना चाहिए.

    ‘शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपदाम्।
    शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥’

  • बलगम, खांसी और नज़ले का दुश्मन है ये मसाला, हाजमे के साथ दिमाग के लिए भी है असरदार,आयुर्वेदिक एक्सपर्ट से जानिए..?

    बलगम, खांसी और नज़ले का दुश्मन है ये मसाला, हाजमे के साथ दिमाग के लिए भी है असरदार,आयुर्वेदिक एक्सपर्ट से जानिए..?

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    Health Benefits of Kali Mirch: मौसम में होने वाला बदलाव बॉडी में कई तरह की बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा सकता है। मौसम बदलते ही खांसी, जुकाम, गले में खराश और बलगम जमने की समस्या बेहद आम हो जाती है। कई बार दवाइयों का सेवन करने के बाद भी छाती में जकड़न और नजला लंबे समय तक बना रहता है। ऐसे में भारतीय रसोई में मौजूद ‘मसालों की रानी’ कही जाने वाली काली मिर्च (Black Pepper) का इस्तेमाल सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है। आयुर्वेद में काली मिर्च को इसके तीखे स्वाद और गर्म तासीर के कारण कफ और वात को संतुलित करने वाला माना गया है।

    यूनानी डॉक्टर हकीम सुलेमान खान के अनुसार, काली मिर्च एक ऐसा मसाला है जिसे भारत के साथ-साथ दूसरे देशों में भी खूब पसंद किया जाता है। अंग्रेज भी इस भारतीय मसाले के मुरीद रहे हैं। इसकी लोकप्रियता सिर्फ इसके तीखे स्वाद की वजह से नहीं, बल्कि इसके पारंपरिक स्वास्थ्य लाभों के कारण भी है। यह मसाला खाने का स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचा सकता है। बलगम, खांसी और नज़ले का इलाज करने में ये मसाला बेहद असरदार साबित होता है। अक्सर लोग काली मिर्च का सेवन पाउडर बनाकर खाने के ऊपर छिड़ककर करते हैं। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि बदलते मौसम में काली मिर्च का सेवन किस तरह सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है।

    काली मिर्च के पोषक तत्व

    आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के अनुसार, काली मिर्च में ‘पाइपेरिन’ (Piperine) नाम का एक प्रमुख एक्टिव कंपाउंड पाया जाता है। पाइपेरिन में एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं, जो शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन को कम करने में भूमिका निभा सकते हैं। इसके अलावा, पाइपेरिन शरीर में कुछ पोषक तत्वों और दूसरे कंपाउंड् के अवशोषण को बेहतर करने के लिए भी जाना जाता है। यही वजह है कि काली मिर्च को पारंपरिक रूप से सेहत के लिए उपयोगी मसाला माना जाता है। हकीम सुलेमान के मुताबिक काली मिर्च का सेवन सही मात्रा में सही कॉम्बिनेशन के साथ किया जाए तो तो यह मौसमी संक्रमणों से बचाव में अद्भुत असर दिखाती है।

    काली मिर्च क्यों मानी जाती है फायदेमंद?

    काली मिर्च सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाने वाला मसाला नहीं है, बल्कि इसे कई सारे फायदों  के लिए भी जाना जाता है। सही मात्रा और सही तरीके से इसका सेवन करने पर यह पाचन, मौसमी बदलाव के दौरान होने वाली परेशानियों से राहत दिलाने में मददगार हो सकती है। हकीम सुलेमान ने बताया ये एक ऐसा मसाला है जो गर्म मिजाज़ का है। ये मसाला कफ का इलाज है। बदलते मौसम में इसे काढ़े या गर्म पेय में भी शामिल किया जाता है। माना जाता है कि काली मिर्च का सेवन सर्दी-खांसी, बलगम और जुकाम जैसी मौसमी परेशानियों में राहत देने में मदद कर सकता है। इसका सेवन पाचन से लेकर बॉडी से जुड़ी और भी कई परेशानियों में असरदार साबित होता है। मौसम बदलने के दौरान खानपान और दिनचर्या में बदलाव के कारण कई लोगों को अपच, गैस, पेट फूलने या कब्ज जैसी पाचन संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। ऐसे में इसका संतुलित मात्रा में सेवन पाचन तंत्र को सपोर्ट कर सकता है।

    पाचन तंत्र को बेहतर रखने में कैसे मददगार है?

    यह मसाला पाचन तंत्र को बेहतर रखने में मदद कर सकता है। इसमें मौजूद फाइबर और अन्य प्राकृतिक पोषक तत्व आंतों की गतिविधि को बेहतर रखने, मल त्याग को आसान बनाने और कब्ज जैसी समस्या से बचाव में मदद कर सकते हैं। पर्याप्त मात्रा में पानी के साथ इसका सेवन करने से पाचन प्रक्रिया को और बेहतर सपोर्ट मिल सकता है।

    मौसमी बीमारियों से करती है बचाव

    मौसम बदलने पर सर्दी-जुकाम, गले में खराश और वायरल संक्रमण जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसमें मौजूद विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट शरीर की इम्यूनिटी को सपोर्ट करने में मदद कर सकते हैं। नियमित रूप से संतुलित डाइट का हिस्सा बनाकर इसका सेवन शरीर को संक्रमणों से लड़ने के लिए जरूरी पोषक तत्व मुहैया करा सकता है। हालांकि, इसे किसी मौसमी बीमारी का इलाज या उससे पूरी तरह बचाव की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।

    आंखों की रोशनी बढ़ाने में मददगार

    इसमें मौजूद कुछ पोषक तत्व और एंटीऑक्सीडेंट आंखों के स्वास्थ्य को सपोर्ट कर सकते हैं। ये ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से होने वाले नुकसान से कोशिकाओं की सुरक्षा में मदद करते हैं। आंखों को हेल्दी रखने के लिए सीमित मात्रा में इस मसाले का सेवन असरदार साबित होता है।

    दिमाग तेज करने में कैसे मददगार

    इसमें मौजूद पोषक तत्व और एंटीऑक्सीडेंट मस्तिष्क की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने और सामान्य ब्रेन फंक्शन को सपोर्ट करने में भूमिका निभा सकते हैं। संतुलित डाइट के हिस्से के रूप में इसका सेवन याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है।

    हाजमा दुरुस्त करने में मददगार

    काली मिर्च में मौजूद फाइबर और अन्य बायोएक्टिव कंपाउंड पाचन तंत्र को सपोर्ट कर सकते हैं। पर्याप्त मात्रा में सेवन करने पर यह आंतों की सामान्य गतिविधि बनाए रखने, मल त्याग को बेहतर करने और कब्ज जैसी समस्या से बचाव में मदद कर सकता है।

    आयुर्वेद के मुताबिक काली मिर्च का कितना सेवन पर्याप्त है

    आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के अनुसार हेल्दी इंसान भोजन में रोजाना लगभग 1–2 ग्राम यानी करीब ½–1 चम्मच काली मिर्च का पाउडर खा सकता है। हालांकि, यह मात्रा व्यक्ति की प्रकृति और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार बदल सकती है। ज्यादा मात्रा में काली मिर्च लेने से कुछ लोगों में एसिडिटी, सीने में जलन या पेट में परेशानी हो सकती है।

    डिस्क्लेमर: यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी और आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के परामर्श पर आधारित है। यह किसी भी तरह से योग्य मेडिकल राय का विकल्प नहीं है। यदि आपको पेट में अल्सर, अत्यधिक एसिडिटी या कोई अन्य गंभीर बीमारी है, तो इसका सेवन शुरू करने से पहले अपने चिकित्सक या आयुर्वेदिक डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।